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प्रिय स्वयं को
प्रिय के लिए संवारता है
उसकी प्रसन्नता खातिर
खुद को सिद्ध करता है

ये कैसा प्रयास है
ये कैसा एहसास है
प्रिय का प्रेम पर अधिकार है
यह दावा करता वो बार बार है

प्रिय प्रेम के रहस्य को
क्या समझ पाता है? या
अनंत रहस्य के गहरे सागर में
खुद को डूबा पाता है

वो स्वतंत्रत है
प्रिय को प्रेम देने को
लेकिन उसे अधिकार नहीं
प्रेम का एक बूंद पाने को

प्रेम एक उपहार है
सिर्फ दिया जा सकता है
और प्रतीक्षा कर सकता है
उसे स्वीकारे जाने को

अश्विनी राय ‘अरुण’

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