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आधी अधूरी आजादी

​— विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​हिंद सिसक-सिसक कहता है,

क्या ये जश्न इतना जरूरी है।

सपने कहां हुए हैं अपने,

आजादी अभी आधी अधूरी है॥

 

​इसको पाने को गिरे जो कटकर,

उनको आओ आज याद करें।

आज़ादी किस कीमत पर आई थी,

उसका भी कुछ हिसाब करें॥

 

​जहां कभी धरती आसमां मिलते थे,

वो जगह आज हमें नहीं दिखती।

भारत खंडे, खंड-खंड हुआ,

जंबू द्वीप आज कहां है बसता॥

 

​चिथड़ी हुई थी जब अस्मिता,

कहते हो आजादी की बात करें।

चौबीस टुकड़े हो गए जिसके,

उसके हृदय पर क्या आघात करें॥

 

​मेरी बात पर गर विश्वास नहीं तो,

और सुनने पर जीव घबराता है।

तो खोदो माटी उससे पूछो, कैसे,

इतिहास से पन्ना फाड़ा जाता है॥

 

​गर विश्वास हो हम पर तो,

मैं माटी खोद कर लाया हूँ।

जो खंड-खंड हो गए,

उसे अखंड बोलने आया हूँ॥

 

​जम्बूद्वीप में बसता था भारतवर्ष,

भारतवर्ष में बसता था आर्यावर्त।

आज कहां है जम्बूद्वीप और

भारतवर्ष या विलक्षण आर्यावर्त॥

 

​आज कहते हो हम आजाद हैं,

भारत, इंडिया या हिन्दुस्तान हैं।

सच मानो तो इसमें आधा,

बांग्लादेश और आधा पाकिस्तान हैं॥

 

​आओ सच्ची आजादी खातिर,

कमर कसें और ईमान रखें।

जो पाया है वो खो ना जाए,

जो खोया है पाने का संधान करें॥

 

 

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