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​डॉ. लक्ष्मण वासुदेव परांजपे: संघ के प्रथम ‘कार्यवाहक’ सरसंघचालक और अनन्य राष्ट्र-साधक

 

​भारतीय स्वाधीनता संग्राम और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने पृष्ठभूमि में रहकर संगठन की नींव को मजबूती प्रदान की। डॉ. लक्ष्मण वासुदेव परांजपे एक ऐसा ही नाम है, जिनकी निष्ठा और सेवा भाव ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उसके शुरुआती कठिन दिनों में संबल प्रदान किया। डॉ. हेडगेवार के अभिन्न मित्र और विश्वसनीय सहयोगी के रूप में उनका योगदान अविस्मरणीय है।

 

​जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

​डॉ. परांजपे का परिवार मूलतः कोंकण क्षेत्र के ‘आड़ा’ गांव का निवासी था, किंतु उनका जन्म २० नवम्बर, १८७७ को नागपुर में हुआ। उनका बचपन वर्धा की गलियों में बीता, जहाँ उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। आगे की पढ़ाई के लिए वे पुनः नागपुर आए और नीलसिटी हाईस्कूल से शिक्षा पूर्ण की। चिकित्सा के क्षेत्र में उनकी रुचि उन्हें मुंबई ले गई, जहाँ ‘ग्रांट मेडिकल कॉलेज’ से एल.एम.एंड.एस. (LM&S) की उपाधि प्राप्त कर उन्होंने वर्ष १९०४ में नागपुर में अपनी चिकित्सकीय सेवा प्रारंभ की।

 

​मित्रता की नींव और व्यायाम के प्रति अनुराग

​डॉ. परांजपे बचपन से ही व्यायाम और शारीरिक सौष्ठव के प्रति बेहद सजग थे। प्रतिदिन अखाड़े जाना और मित्रों के साथ मल्ल-युद्ध का अभ्यास करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। यही वह अनुशासन था जिसने उन्हें आगे चलकर कठिन संघर्षों के लिए तैयार किया। वर्ष १९२० में नागपुर में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन के दौरान उनकी भेंट डॉ. हेडगेवार से हुई। व्यवस्थापक के रूप में कार्य करते हुए दोनों के बीच जो प्रगाढ़ मित्रता विकसित हुई, वह अंततः राष्ट्र सेवा का एक बड़ा माध्यम बनी।

 

​जंगल सत्याग्रह और सरसंघचालक का दायित्व

​वर्ष १९३०-३१ का समय संघ के लिए परीक्षा की घड़ी थी। डॉ. हेडगेवार जी ‘जंगल सत्याग्रह’ में भाग लेने के लिए तत्पर थे, किंतु उन्हें चिंता थी कि उनके जेल जाने से नव-निर्मित संघ कार्य बाधित न हो जाए। ऐसे में उन्होंने अपने सबसे कर्मठ साथी डॉ. परांजपे पर भरोसा जताया और उन्हें ‘सरसंघचालक’ की जिम्मेदारी सौंपी।

डॉ. परांजपे ने न केवल इस पद की गरिमा रखी, बल्कि डॉ. साहब की अनुपस्थिति में कार्यकर्ताओं को ‘शाखाओं की संख्या दोगुनी’ करने का लक्ष्य दिया। जब डॉ. हेडगेवार कारावास से मुक्त होकर आए, तो डॉ. परांजपे ने पूरी विनम्रता के साथ वह दायित्व पुनः उन्हें सौंप दिया।

 

​धार्मिक अस्मिता और हिंदू महासभा

​वर्ष १९२३ की एक घटना ने डॉ. परांजपे के भीतर हिंदुत्व की चेतना को और प्रखर किया। नागपुर में धार्मिक जुलूसों को मस्जिद के सामने रोके जाने के विरोध में उन्होंने ‘दिण्डी’ भजन पद्धति से सत्याग्रह की शुरुआत की। इस आंदोलन में राजे लक्ष्मणराव भोंसले भी उनके साथ थे। इसी संघर्ष की कोख से नागपुर में ‘हिंदू महासभा’ का उदय हुआ, जिसका नेतृत्व श्रीमंत राजे लक्ष्मणराव भोंसले ने किया। १९२५ में संघ की स्थापना के बाद डॉ. परांजपे इसके स्तंभ बन गए।

 

​जीवन का अंतिम समय

​डॉ. परांजपे केवल कागजी नेता नहीं थे। वे संघ के कार्यक्रमों में पूर्ण गणवेश (यूनिफॉर्म) पहनकर शामिल होते थे। प्रथम संघ शिक्षा वर्ग में चिकित्सा व्यवस्था संभालने से लेकर हैदराबाद (भाग्यनगर) के स्वाधीनता सत्याग्रह तक, उनकी सक्रियता देखते ही बनती थी। राष्ट्र और देव-कार्य के प्रति समर्पित रहते हुए २२ फरवरी, १९५८ को वे अनंत पथ पर अग्रसर हो गए।

 

​अश्विनी राय ‘अरुण’ की भावांजलि

​”डॉ. परांजपे जैसे व्यक्तित्वों का जीवन हमें सिखाता है कि नेतृत्व केवल पद पाने का नाम नहीं, बल्कि उत्तरदायित्वों को आत्मीयता से निभाने का संस्कार है। संघ के इतिहास में उनका नाम एक ऐसे ‘निःस्वार्थ सारथी’ के रूप में सदैव जीवित रहेगा, जिसने युद्ध की घड़ी में रथ की कमान संभाली।”

 

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