images (67)

गणित के ऋषि: श्रीनिवास रामानुजन – शून्य से अनंत तक की यात्रा

​अक्सर कहा जाता है कि गणित केवल मस्तिष्क का विषय है, परंतु श्रीनिवास रामानुजन के जीवन को देखकर यह प्रतीत होता है कि गणित ‘हृदय और आत्मा’ का मिलन भी हो सकता है। लैंडॉ-रामानुजन स्थिरांक, रामानुजन अभाज्य और ‘मॉक थीटा फंक्शन’ जैसे जटिल शब्द शायद एक साधारण व्यक्ति की समझ से परे हों, लेकिन इन सूत्रों के सूत्रधार का जीवन संघर्ष हर भारतीय के लिए जानना अनिवार्य है।

 

​विलक्षण बचपन और जिज्ञासा की उड़ान

​श्रीनिवास रामानुजन का जन्म २२ दिसंबर, १८८७ को तमिलनाडु के ईरोड में एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। पिता श्रीनिवास अय्यंगर और माता कोमलताम्मल के इस पुत्र का बचपन सामान्य बालकों जैसा नहीं था। तीन वर्ष की आयु तक वे मूक रहे, जिससे परिवार उनके भविष्य को लेकर आशंकित था। परंतु जब उनकी वाणी फूटी, तो वह सामान्य संवाद नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय जिज्ञासाओं का पिटारा थी। उनके अटपटे प्रश्न—”संसार का प्रथम पुरुष कौन था?” या “आकाश और बादलों के बीच की दूरी कितनी है?”—उनकी उस सूक्ष्म दृष्टि का संकेत थे जो स्थूल से परे देखना चाहती थी।

 

​शिक्षा का द्वंद्व: गणित का प्रेम और अन्य विषयों का त्याग

​रामानुजन की प्रतिभा स्कूल में ही दिखने लगी थी। मात्र १० वर्ष की आयु में उन्होंने प्राथमिक परीक्षा में पूरे जिले में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। उनकी गणितीय मेधा का यह आलम था कि वे हाईस्कूल के समय ही कॉलेज स्तर के प्रमेयों को हल कर लेते थे। परंतु उनकी यही एकाग्रता उनके लिए बाधा भी बनी।

​वे इतिहास की क्लास में बीजगणित लगाते और भूगोल के मानचित्रों में ज्यामिति ढूँढते। परिणामतः, गणित को छोड़कर वे अन्य सभी विषयों में अनुत्तीर्ण हो गए। छात्रवृत्ति बंद हो गई और औपचारिक शिक्षा का अंत हो गया। लेकिन जिसकी शिक्षा स्वयं विधाता ने लिखी हो, उसे सांसारिक डिग्रियों की क्या आवश्यकता?

 

​संघर्ष के पाँच वर्ष और कुलदेवी की कृपा

​स्कूल छूटने के बाद के पाँच वर्ष उनके जीवन के सबसे अंधकारमय और हताशा भरे वर्ष थे। भीषण गरीबी, सिर पर विवाह (जानकी देवी से) की ज़िम्मेदारी और हाथ में कोई पक्की नौकरी नहीं। पर इस मरुस्थल में भी उनकी ‘कुलदेवी नामगिरी’ के प्रति आस्था ने उन्हें जीवित रखा। वे स्लेट पर अपनी साधना करते रहे। उनके लिए गणित केवल अंकों का जोड़-घटाव नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विचार का ही एक अंग था। वे कहते थे—”मेरे लिए गणित के उस सूत्र का कोई मतलब नहीं, जिससे मुझे ईश्वर का विचार न प्राप्त हो।”

 

​मद्रास पोर्ट ट्रस्ट से कैम्ब्रिज की राह

​नौकरी की तलाश में वे कई विद्वानों से मिले। अंततः डिप्टी कलेक्टर श्री वी. रामास्वामी अय्यर ने उनकी मेधा को पहचाना और उनके लिए छात्रवृत्ति का प्रबंध किया। मद्रास पोर्ट ट्रस्ट की क्लर्क की नौकरी के दौरान उन्होंने रात-रात भर जागकर गणित के वे शोध पत्र लिखे, जिन्होंने आगे चलकर दुनिया को हिला दिया।

​उनके शुभचिंतकों के माध्यम से उनके सूत्र लंदन के महान गणितज्ञ प्रोफेसर जी.एच. हार्डी तक पहुँचे। हार्डी, जो स्वयं एक सख्त अनुशासन प्रिय गणितज्ञ थे, रामानुजन के पत्रों को देखकर स्तब्ध रह गए। उन्होंने स्वीकार किया कि रामानुजन द्वारा भेजे गए कुछ प्रमेय उन्हें पहली बार में समझ ही नहीं आए थे। हार्डी ने रामानुजन को १०० में से १०० अंक दिए और उन्हें कैम्ब्रिज आने का आमंत्रण दिया।

 

​सात समंदर पार और रॉयल सोसाइटी का गौरव

​तमाम सामाजिक संकोचों और धन की कमी के बाद भी रामानुजन कैम्ब्रिज पहुँचे। प्रोफेसर हार्डी और रामानुजन की यह जोड़ी गणित के इतिहास की सबसे प्रसिद्ध ‘जुगलबंदी’ बनी। हार्डी उनके लिए एक गुरु और मित्र दोनों थे।

​रामानुजन का स्वास्थ्य इंग्लैंड की जलवायु और सात्विक आहार की कमी के कारण गिरने लगा। उन्हें क्षय रोग (टीबी) ने घेर लिया। पर रोग की शैया पर भी वे गणित की कल्पनाओं में खोए रहे। इसी दौरान वे रॉयल सोसाइटी के फेलो (FRS) बनने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति बने और ट्रिनिटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी।

 

​अंतिम समय और ‘अबूझ’ विरासत

​खराब स्वास्थ्य के कारण वे भारत लौटे। अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व भी, पीड़ा की स्थिति में, उन्होंने ‘मॉक थीटा फंक्शन’ पर काम किया। यह एक ऐसा कार्य है जिसे आज कैंसर और ब्लैक होल जैसे रहस्यों को समझने के लिए चिकित्सा और भौतिक विज्ञान में प्रयोग किया जा रहा है।

​२६ अप्रैल, १९२० को मात्र ३३ वर्ष की अल्प आयु में गणित का यह सूर्य अस्त हो गया। वे अपने पीछे अपना वह प्रसिद्ध ‘रजिस्टर’ छोड़ गए, जो १९७६ में कैम्ब्रिज के पुस्तकालय में मिला। इसे आज ‘रामानुजन की नोट बुक’ कहा जाता है, जिसमें दर्ज ३,८८४ प्रमेयों में से कई आज भी वैज्ञानिकों के लिए किसी पहेली से कम नहीं हैं।

 

निष्कर्ष

रामानुजन का जीवन यह सिद्ध करता है कि प्रतिभा किसी सुख-सुविधा की मोहताज नहीं होती। उनकी कुलदेवी की कृपा और गणित के प्रति अगाध श्रद्धा ने उन्हें उस मुकाम पर पहुँचाया जहाँ आज भी आधुनिक विज्ञान उनकी मेधा को नमन करता है।

वे सदा कहा करते थे कि “मेरे लिए गणित के उस सूत्र का कोई मतलब नहीं है जिससे मुझे आध्यात्मिक विचार न मिलते हों।”

 

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *