February 24, 2024

श्रीमां जब कामारपुकुर छोड़कर कलकत्ता आईं तो उनके और उनके पति भगवान रामकृष्ण परमहंस के प्रिय शिष्य शरतचन्द्र चक्रवर्ती, जो कालांतर में स्वामी सारदानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए, ने उनके रहने के लिए कलकत्ता में उद्वोधन भवन का निर्माण करवाया। आइए आज हम आपको इन्हीं स्वामी सारदानन्द जी के बारे में बताते हैं…

परिचय…

स्वामी सारदानन्द का जन्म २३ दिसंबर, १८६५ को कलकत्ता में हुआ था। वे रामकृष्ण परमहंस के संन्यासी शिष्यों में से एक थे। जब रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानन्द जी ने की (स्वामीजी स्वयं वर्ष १८९७ से वर्ष १९०१ तक रामकृष्ण मिशन के महाध्यक्ष पद पर रहे, उसके बाद वर्ष १९०१ से महाध्यक्ष के स्थान पर केवल अध्यक्ष कर दिया गया।) तब इसके प्रथम संपादक स्वामी सारदानन्द जी बने और १९ अगस्त, १९२७ अपने मृत्यु तक इस पद पर बने रहे। उन्होंने बांग्ला पत्रिका उद्बोधन का प्रकाशन किया। सारदानन्द जी ने श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग नामक विख्यात पुस्तक की रचना की।

रचना…

स्वामी सारदानन्द ने रामकृष्ण की प्रामाणिक जीवनी ग्रंथ “श्रीरामकृष्ण लीलाप्रसंग” की रचना की। पाँच खंडों में रचित यह ग्रंथ रामकृष्ण की जीवनियों में सर्वश्रेष्ठ हैँ। इसके अतिरिक्त वे ‘भारत में शक्तिपूजा’ और ‘गीतातत्व’ नामक दो और पुस्तकों का लेखन किया।

कथन…

“Through selfless work the mind gets purified. And when the mind becomes pure, there arise knowledge and devotion in it.”

तात्पर्य :- निस्वार्थ कार्य से मन शुद्ध होता है। और जब मन पवित्र हो जाता है, तो उसमें ज्ञान और भक्ति पैदा होती है।

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