April 4, 2025

आज हम बात करने वाले हैं उड़िया साहित्य के पितामह फकीर मोहन सेनापति के बारे में, जिनका जन्म १३ जनवरी, १८४३ (कहीं कहीं १४ जनवरी, १८४७) को उड़ीसा के तट पर ‘बालेश्वर नगर’ में हुआ था। उनके जन्म के दिन मकर संक्रान्ति का दिन था, इसीलिए शायद १३ और १४ तारीख को लेकर जानकारों के मध्य मतभेद है। इसके अलावा एक विचित्र संयोग की बात है कि इनका जब देहान्त हुआ था, उस दिन की तारीख १४ जून, १९१८ थी, यानी रज–संक्रान्ति का दिन।इनका आविर्भाव हुआ था संक्रान्ति में और तिरोभाव भी संक्रान्ति में। इसी कारण उड़िया साहित्य-जगत् में फकीर मोहन ‘संक्रान्ति-पुरुष’ के रूप में चर्चित हुए। इस संक्रान्ति के कारण ही संभवतः इनकी लेखनी से साहित्य-क्षेत्र में एक विशेष क्रान्ति आई और एक नव्य युग का सूत्रपात हुआ। अब विस्तार से…

परिचय…

फकीर मोहन सेनापति एक संपन्न व्यापारी पिता के एकमात्र संतान थे। परन्तु जब वे मात्र डेढ़ वर्ष के थे, तभी उनके माता-पिता दोनों का देहांत हो गया। फकीर मोहन सेनापति की संपूर्ण पैत्रिक संपत्ति अंग्रेजों ने हथिया ली और बालक को दर-दर की ठोकर खानी पड़ी। उनका लालन पालन उनकी दादी द्वारा किया गया। उन्होंने बाल्य काल में इनका नाम रखा था, ब्रजमोहन। परन्तु शोक-संतप्ता दादी ने अपने पौत्र को फकीर वेश में सजाकर पालती रहीं। इसीलिए ब्रजमोहन सेनापति ‘फकीरमोहन सेनापति’ के नाम से प्रसिद्ध हो गए। बचपन माता पिता के बिना गुजरा, जवानी पत्नी के और बुढ़ापा पुत्र से बिच्छिन्न होकर गुजरा। परंतु वे भगवान को बड़ा मानते थे, शायद इसी का इतना प्रभाव था कि वे असाधारण प्रतिभा के अधिकारी थे।

शिक्षा और कार्य…

गाँव की पाठशाला में पढ़कर उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अध्ययन को जारी रखा। कालांतर में बालेश्वर मिशन्‌ स्कूल में वे प्रधान शिक्षक बने। धीरे धीरे उनकी सारस्वत साधना रंग दिखाने लगी उनका प्रकाश चहुं ओर फैलने लगा। मातृभाषा उड़िया की सुरक्षा की दृष्टि से उन्होंने साहित्य में एक विप्लवात्मक पदक्षेप लिया। उस समय तक उड़ीसा में पुस्तकें छापने का छापाखाना नहीं था। फकीर मोहन ने पहला छापाखाना स्थापित किया और एक ‘पत्रिका’ का संपादन और प्रकाशन करने लगे। अब उनकी योग्यता की ख्याति देशी रियासतों में भी फैली और कुछ ने उन्हें ‘दीवान’ के पद पर नियुक्त किया। कुछ दरबारों में साहित्य-सेवा के कारण उन्हें उच्च स्थान प्राप्त हुआ। फकीर मोहन सेनापति ने अनेक कहानियों और उपन्यासों की रचना की।

लेखन कार्य…

फकीर मोहन सेनापति के दो उपन्यास ‘छह माण आठ गुंठ’ और ‘लछमा’ विशेष प्रसिद्ध हुए। उन्होंने मूल संस्कृत से रामायण, महाभारत, उपनिषद, हरिवंश पुराण और गीता का उड़िया भाषा में अनुवाद किया। वे आज भी उड़िया लेखकों के प्रेरणास्त्रोत माने जाते हैं। बालेश्वर में उनका गृह-उद्यान “शान्ति-कानन” आज भी साहित्यप्रेमी जनों के लिए एक पवित्र स्थल के रूप में दर्शनीय है।

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