April 4, 2025

आज हम बात करने वाले हैं विजयनगर साम्राज्य के सर्वाधिक कीर्तिवान राजा श्री कृष्णदेव राय के बारे में, वे स्वयं एक महान कवि तो थे ही साथ ही वे कवियों के संरक्षक भी थे। तेलुगु भाषा में उनका काव्य अमुक्तमाल्यद साहित्य का एक अमूल्य रत्न है। इनकी भारत के प्राचीन इतिहास पर आधारित पुस्तक वंशचरितावली तेलुगू के साथ—साथ संस्कृत में भी उपलब्ध है। संभवत ऐसा हो की तेलुगू का अनुवाद ही संस्कृत में हुआ हो, जो ज्यादा प्रासंगिक लगता है। प्रख्यात इतिहासकार तेजपाल सिंह धामा ने हिन्दी में इनके जीवन पर प्रामाणिक उपन्यास आंध्रभोज लिखा है, जिनके अनुसार तेलुगु भाषा के आठ प्रसिद्ध कवि इनके दरबार में थे जो अष्टदिग्गज के नाम से प्रसिद्ध थे।

परिचय…

राजा कृष्णदेव राय का जन्म १६ फ़रवरी, १४७१ को हुआ था। वे तुलुव वंश के वीर राजा श्री नरसिंह जी के अनुज थे, तथा उनके बाद ८ अगस्त, १५०९ को विजयनगर साम्राज्य के सिंहासन पर बैठे। उनके शासन काल में विजयनगर साम्राज्य एश्वर्य एवं शक्ति के दृष्टिकोण से अपने चरमोत्कर्ष पर था। राजा कृष्णदेव राय जितने बड़े कवि थे उससे कहीं ज्यादा बड़े वे योद्धा थे, उन्होंने अपने सफल सैनिक अभियानों के अन्तर्गत १५०९-१५१० में बीदर के सुल्तान महमूद शाह को अदोनी के समीप हराया। वर्ष १५१० में उन्होंने उम्मूतूर के विद्रोही सामन्त को पराजित किया। वर्ष १५११२ में राजा कृष्णदेव राय ने बीजापुर के शासक यूसुफ़ आदिल ख़ाँ को परास्त कर रायचूर पर अधिकार किया। तत्पश्चात् गुलबर्गा के क़िले पर अधिकार कर लिया। उन्होंने बीदर पर पुनः आक्रमण कर वहाँ के बहमनी सुल्तान महमूद शाह को बरीद के क़ब्ज़े से छुड़ाकर पुनः सिंहासन पर बैठाया और साथ ही यवन राज स्थापनाचार्य की उपाधि धारण की।

विजय व नीति…

वर्ष १५१३-१५१८ के मध्य राजा कृष्णदेव राय ने उड़ीसा के गजपति शासक प्रतापरुद्र देव से चार बार युद्ध किया और उसे हर बार पराजित किया। चार बार की पराजय से निराश प्रतापरुद्र देव ने राजा कृष्णदेव राय से संधि की तथा उनके साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। गोलकुण्डा के सुल्तान कुली कुतुबशाह को राजा कृष्णदेव राय ने सालुव तिम्म को सहयोग देकर परास्त करवाया। कृष्णदेव राय का अन्तिम सैनिक अभियान बीजापुर के सुल्तान इस्माइल आदिलशाह के विरुद्ध था। उसने आदिल को परास्त कर गुलबर्गा के प्रसिद्ध क़िले को ध्वस्त कर दिया। वर्ष १५२० तक कृष्णदेव राय ने अपने समस्त शत्रुओ को परास्त कर अपने पराक्रम का परिचय दिया।

पुर्तग़ालियों से मित्रता…

अरब एवं फ़ारस से होने वाले घोड़ों के व्यापार, जिस पर पुर्तग़ालियों का पूर्ण अधिकार था, को बिना रुकावट के चलाने के लिए कृष्णदेव राय को पुर्तग़ाली शासक अल्बुकर्क से मित्रता करनी पड़ी। पुर्तग़ालियों की विजयनगर के साथ सन्धि के अनुसार वे केवल विजयनगर को ही घोड़े बेचने के लिए बाध्य थे। कृष्णदेव राय ने पुर्तग़ालियों को भटकल में किला बनाने के लिए अनुमति इस शर्त पर प्रदान की, कि वे मुसलमानों से गोवा छीन लेंगे।

“शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चिन्ता प्रवत्र्तते”

कन्नड़ में लोकोक्ति है कि राजा नींद में भी सीमाओं को देखा करता है। दक्षिण की विजय में ही राजा कृष्णदेव राय ने ‘शिवसमुद्रम’ के युद्ध में कावेरी नदी के प्रवाह को परिवर्तित करके अपूर्व रण-कौशल का परिचय दिया और उस अजेय जल दुर्ग को जीत लिया था। कृष्णदेव राय ने वीर नृसिंह राय को उनकी मृत्यु शैया पर वचन दिया था कि वे रायचूर, कोण्डविड और उड़ीसा को अपने अधीन कर लेंगे। उस समय गजपति प्रताप रुद्र का राज्य विजयवाड़ा से बंगाल तक फैला था। गजपति के उदयगिरि किले की घाटी अत्यंत संकरी थी, अत: एक अन्य पहाड़ी पर मार्ग बनाया गया और चकमा देकर राजा कृष्णदेव राय की सेना ने किला जीत लिया था। इसी तरह कोण्डविड के किले में गजपति की विशाल सेना थी और किले के नीचे से ऊपर चढ़ना असंभव था। राजा कृष्णदेव राय ने वहाँ पहुंचकर मचान बनवाए ताकि किले के समान ही धरातल से बाण वर्षा हो सके। इस किले में प्रतापरुद्र की पत्नी और राज परिवार के कई सदस्य बन्दी बना लिए गए थे। अंत में सलुआ तिम्मा की कूटनीति से गजपति को भ्रम हो गया कि उसके महापात्र १६ सेनापति कृष्णदेव राय से मिले हुए हैं। अत: उन्होंने कृष्णदेव राय से सन्धि कर ली और अपनी पुत्री जगन्मोहिनी का विवाह उनसे कर दिया। इस तरह मदुरै से कटक तक के सभी किले हिन्दू साम्राज्य में आ गए थे। पश्चिमी तट पर भी कालीकट से गुजरात तक के राजागण सम्राट कृष्णदेव राय को कर देते थे।

सुल्तानों के प्रति रणनीति…

बहमनी के सुल्तानों की प्रचण्ड शक्ति के समक्ष अधिक धैर्य और कूटनीति की आवश्यकता थी। गोलकुण्डा का सुल्तान कुली कुतुबशाह क्रूर सेनापति और निर्मम शासक था। वह जहाँ भी विजयी होता था, वहाँ हिन्दुओं का कत्लेआम करवा देता। राजा कृष्णदेव राय की रणनीति के कारण बीजापुर के आदिलशाह ने कुतुबशाह पर अप्रत्याशित आक्रमण कर दिया। सुल्तान कुली कुतुबशाह युद्ध में घायल होकर भागा। बाद में आदिलशाह भी बुखार में मर गया और उसका पुत्र मलू ख़ाँ विजयनगर साम्राज्य के संरक्षण में गोलकुण्डा का सुल्तान बना। गुलबर्गा के अमीर बरीद और बेगम बुबू ख़ानम को कमाल ख़ाँ बन्दी बनाकर ले गया। कमाल ख़ाँ फ़ारस का था। खुरासानी सरदारों ने उसका विरोध किया। तब राजा कृष्णदेव राय ने बीजापुर में बहमनी के तीन शाहजादों को कमाल ख़ाँ से छुड़ाया और मुहम्मद शाह को दक्षिण का सुल्तान बनाया। शेष दो की जीविका बांध दी गई। वहाँ उनको यवनराज्य स्थापनाचार्यव् की उपाधि भी मिली। बीजापुर विजय के पश्चात् कृष्णदेव राय कुछ समय वहाँ रहे, परंतु सेना के लिए पानी की समस्या को देखते हुए वे सूबेदारों की नियुक्ति कर चले आए।

तालीकोट का युद्ध…

एक समय कई सुल्तानों ने मिलकर कृष्णदेव राय के विरुद्ध जिहाद बोल दिया। यह युद्ध ‘दीवानी’ नामक स्थान पर हुआ। मलिक अहमद बाहरी, नूरी ख़ान ख़्वाजा-ए-जहाँ, आदिलशाह, कुतुब उल-मुल्क, तमादुल मुल्क, दस्तूरी ममालिक, मिर्ज़ा लुत्फुल्लाह, इन सभी ने मिलकर हमला बोला। इसमें बीदर का सुल्तान महमूद शाह द्वितीय घायल होकर घोड़े से गिर पड़ा। किंतु जब घायल सुल्तान महमूद शाह को सेनापति रामराज तिम्मा ने बचाकर मिर्ज़ा लुत्फुल्लाह के खेमे में पहुँचाया और यूसुफ़ आदिल ख़ाँ मार डाला गया। इसे पक्षपात मानकर भ्रम हो गया और सुल्तानों में अविश्वास के कारण जिहाद असफल हो गया। इस लड़ाई में सुल्तानों को भारी क्षति उठानी पड़ी। परंतु दूरदर्शिता की कमी कहें या क्षमाशीलता उन्हें समूल नष्ट नहीं करना कालांतर में विजयनगर साम्राज्य को बहुत मंहगा पड़ा। सभी मुस्लिम रियासतें राजा कृष्णदेव राय के विरुद्ध एक बार फिर से तालीकोट के युद्ध में पुन: संगठित हो गयीं।

रायचूर की विजय…

विभिन्न युद्धों में लगातार विजय के कारण अपने जीवन काल में ही राजा कृष्णदेव राय लोक कथाओं के नायक हो गए थे। उन्हें अवतार कहा जाने लगा था और उनके पराक्रम की कहानियाँ प्रचलित हो गयी थीं। रायचूर विजय ने सचमुच उन्हें विश्व का महानतम सेनानायक बना दिया था। सबसे कठिन और भारतवर्ष का सबसे विशाल युद्ध रायचूर के किले के लिए हुआ था। कृष्णदेव राय ने वीर नरसिंह राय को वचन दिया था कि वे रायचूर का क़िला भी जीतकर विजयनगर साम्राज्य में मिला लेंगे। यह अवसर भी अनायास ही राजा कृष्णदेव राय के हाथ आया। घटनाक्रम के अनुसार राजा कृष्णदेव राय ने एक मुस्लिम दरबारी सीडे मरीकर को ५०,००० सिक्के देकर घोड़े खरीदने के लिए गोवा भेजा था। किंतु वह अली आदिलशाह प्रथम के यहाँ भाग गया। सुल्तान आदिलशाह ने उसे वापस भेजना अस्वीकार कर दिया। तब राजा कृष्णदेव राय ने युद्ध की घोषणा कर दी और बीदर, बरार, गोलकुण्डा के सुल्तानों को भी सूचना भेज दी। सभी सुल्तानों ने राजा का समर्थन किया। ११ अनी और ५५० हाथियों की सेना ने चढ़ाई कर दी। मुख्य सेना में १० लाख सैनिक थे। राजा कृष्णदेव राय के नेतृत्व में ६,००० घुड़सवार, ४,००० पैदल और ३०० हाथी अलग थे। यह सेना कृष्णा नदी तक पहुंच गयी थी। १९ मई, १५२० को युद्ध प्रारंभ हुआ और आदिलशाही की फौज को पराजय की सामना करना पड़ा। लेकिन उसने तोपखाना आगे किया और विजयनगर की सेना को पीछे हटना पड़ा।

अली आदिलशाह प्रथम को शराब पीने की आदत थी। एक रात्रि वह पीकर नाच देख रहा था, तभी वह अचानक उठा, नशे के जोश में हाथी मंगाया और नदी पार कर विजयनगर की सेना पर हमला करने चल दिया। उसका सिपहसालार सलाबत ख़ाँ भी दूसरे हाथी पर कुछ अन्य हाथियों को लेकर चला। राजा कृष्णदेव राय के सजग सैनिकों ने हमले का करारा जवाब दिया और नशा काफूर होते ही आदिलशाह भागा। प्रात:काल होने तक उसके सिपाही और हाथी कृष्णा नदी में डूब गए या बह गए। ऐसी रणनीति ने उसके सिपाहियों और सेनापतियों का यकीन डिगा दिया। दूसरी ओर राजा कृष्णदेव राय तब तक रणभूमि नहीं छोड़ते थे, जब तक आखिरी घायल सैनिक की चिकित्सा न हो जाए। अत: जब तोपखाने के सामने उनकी सेना पीछे हट गयी तो राजा ने केसरिया बाना धारण कर लिया। अपनी मुद्रा सेवकों को दे दीं ताकि रानियाँ सती हो सकें और स्वयं घोड़े पर सवार होकर नई व्यूह रचना बनाकर ऐसा आक्रमण किया कि सुल्तानी सेना घबरा गयी और पराजित होकर तितर-बितर हो गयी। सुल्तान आदिलशाह भाग गया और रायचूर किले पर विजयनगर साम्राज्य का अधिकार हो गया। आस-पास के अन्य सुल्तानों ने राजा की इस विजय का भयभीत होकर अभिनन्दन किया। जब आदिलशाह का दूत क्षमा याचना के लिए आया तो राजा का उत्तर था कि, “स्वयं आदिलशाह आकर उसके पैर चूमे।”

विद्वान् व संरक्षक…

राजा कृष्णदेव राय तेलगु साहित्य के महान् विद्वान् थे। उसने तेलगु के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अमुक्त माल्यद’ या ‘विस्वुवितीय’ की रचना की। उनकी यह रचना तेलगु के पाँच महाकाव्यों में से एक है। इसमें आलवार ‘विष्णुचित्त’ के जीवन, वैष्णव दर्शन पर उसकी व्याख्या और उनकी गोद ली हुई बेटी ‘गोदा’ और ‘भगवान रंगनाथ’ के बीच प्रेम का वर्णन है। कवि कृष्णदेव राय ने इस ग्रन्थ में राजस्व के विनियोजन एवं अर्थव्यवस्था के विकास पर विशेष बल देते हुए लिखा है कि, “राजा को तलाबों व सिंचाई के अन्य साधनों तथा अन्य कल्याणकारी कार्यों के द्वारा प्रजा को संतुष्ट रखना चाहिए।” कृष्णदेव राय महान् प्रशासक होने के साथ-साथ एक महान् विद्वान, विद्या प्रेमी और विद्वानों का उदार संरक्षक भी थे, जिसके कारण वह ‘अभिनव भोज’ या ‘आंध्र भोज’ के रूप में प्रसिद्ध थे।

भवन निर्माता…

राजा कृष्णदेव राय के कई महान गुणों में से एक गुण यह भी था कि वे महान् भवन निर्माता भी थे। उन्होंने विजयनगर के पास एक नया शहर बनवाया और बहुत बड़ा तालाब खुदवाया, जो सिंचाई के काम भी आता था। वे तेलगु और संस्कृत के महान विद्वान् थे। उनकी बहुत-सी रचनाओं में से तेलगु में लिखी राजनीति पर एक पुस्तक और एक संस्कृत नाटक आज भी उपलब्ध है। उनके राज्यकाल में तेलगु साहित्य का नया युग प्रारम्भ हुआ, जबकि संस्कृत से अनुवाद की अपेक्षा तेलगु में मौलिक साहित्य लिखा जाने लगा। वे तेलगु के साथ-साथ कन्नड़ और तमिल विद्वानों की भी सहायता करता थे। ‘बरबोसा’, ‘पाएस’ और ‘नूनिज’ जैसे विदेशी यात्रियों ने उसके श्रेष्ठ प्रशासन और उसके शासन काल में साम्राज्य की समृद्धि की चर्चाएँ की हैं।

सहिष्णुता की भावना…

महाराजा कृष्णदेव राय की सबसे बड़ी उपलब्धी उनके शासन काल में साम्राज में पनपी सहिष्णुता की भावना थी। बरबोसा कहता है कि, “राजा इतनी स्वतंत्रता देता है कि कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से आ जा सकता है। बिना किसी परेशानी के या इस पूछताछ के कि वह ईसाई है या यहूदी या मूर है अथवा नास्तिक है, अपने धार्मिक आचार के अनुसार रह सकता है।” बरबोसा ने कृष्णदेव की प्रशंसा उसके राज्य में प्राप्त न्याय और समानता के कारण भी की है।

अष्टदिग्गज…

अष्टदिग्गज राजा कृष्णदेव राय के दरबार में विभूषित आठ कवियों के लिये प्रयुक्त शब्द है। कहा जाता है कि इस काल में तेलगु साहित्य अपनी पराकाष्ठा तक पहुंच गया था। राजा कृष्णदेव के दरबार में ये कवि साहित्य सभा के आठ स्तम्भ माने जाते थे। इस काल (वर्ष १५४० से वर्ष १६००) को तेलुगू कविता के सन्दर्भ में ‘प्रबन्ध काल’ भी कहा जाता है।

अष्टदिग्गजो के नाम :

१. अल्लसानि पेदन्न,
२. नन्दि तिम्मन,
३. धूर्जटि,
४. मादय्यगारि मल्लन
५. अय्यलराजु रामभध्रुडु
६. पिंगळि सूरन
७. रामराजभूषणुडु (भट्टुमूर्ति)
८. पंडित तेनालि रामकृष्णा

इन अष्टदिग्गजो के अलावा राजा कृष्णदेव राय स्वयं तेलगु और संस्कृत के अच्छे विद्वान् थे। उनकी बहुत-सी रचनाओं में से राजनीति पर तेलगु में लिखी एक पुस्तक और एक संस्कृत नाटक ही उपलब्ध है।

मृत्यु…

राजा कृष्णदेव राय की मृत्यु वर्ष १५२९ में हो गई। मुगल शासक बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ में राजा कृष्णदेव राय को भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक बताया है। राजा कृष्णदेव राय की मृत्यु के पश्चात् उसके रिश्तदारों में आपस में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष हुआ, क्योंकि राजा के इकलौते पुत्र तिरुमल राय की एक षड्यंत्र के तहत हत्या हो गयी थी। अंततः वर्ष १५४३ में सदाशिव राय गद्दी पर बैठे और उन्होंने वर्ष १५६७ तक राज्य किया।

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