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छत्रपति शिवाजी महाराज: हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक और कुशल प्रशासक

 

भूमिका

भारतीय इतिहास के क्षितिज पर छत्रपति शिवाजी महाराज एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने न केवल एक साम्राज्य की स्थापना की, बल्कि सुशासन और राष्ट्रीय अस्मिता का नया प्रतिमान स्थापित किया। १९ फरवरी, १६३० को शिवनेरी दुर्ग में माता जिजाऊ की कोख से जन्मे इस महानायक ने बचपन से ही राजनीति, कूटनीति और युद्ध कौशल की शिक्षा प्राप्त की। शाहजी भोंसले के पुत्र शिवाजी का व्यक्तित्व उनकी माता के मार्गदर्शन में एक ऐसे धर्मरक्षक के रूप में निखरा, जिसने आगे चलकर ‘हिंदवी स्वराज्य’ का स्वप्न साकार किया।

 

स्वराज्य की स्थापना और संघर्ष

सन १६४६ में मात्र १६ वर्ष की अल्पायु में तोरण दुर्ग पर अधिकार कर उन्होंने अपने विजय अभियान का शंखनाद किया। १६५६ में जावली की विजय और १६५९ में अफजल खान का वध उनके अदम्य साहस और रणनीतिक कौशल के जीवंत प्रमाण हैं। मुगलों और औरंगजेब की सत्ता को चुनौती देते हुए उन्होंने १६७४ ई. में रायगढ़ दुर्ग में अपना राज्याभिषेक करवाया और ‘छत्रपति’ की पदवी धारण की।

 

प्रशासनिक कुशलता और अष्टप्रधान परिषद

शिवाजी महाराज केवल एक विजेता ही नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी सम्राट थे। उन्होंने प्राचीन हिंदू राजनीतिक प्रथाओं को पुनर्जीवित किया। शासन की बागडोर सुचारू रूप से चलाने के लिए उन्होंने ‘अष्टप्रधान’ परिषद का गठन किया, जिसका विवरण निम्नलिखित है:

पेशवा (मुख्य प्रधान): राजा के बाद सर्वोच्च अधिकारी, जो प्रशासन की देखरेख करते थे।

अमात्य: वित्त और राजस्व कार्यों के प्रमुख।

मंत्री: राजा की व्यक्तिगत सुरक्षा और दैनिक कार्यों के प्रबंधक।

सचिव: शाही मुहर और संधि पत्रों का आलेख तैयार करने वाले।

सुमंत: विदेश विभाग के प्रमुख।

सेनापति: सैन्य संचालन के प्रधान।

पंडितराव: धार्मिक और दान संबंधी मामलों के प्रमुख।

न्यायाधीश: न्याय व्यवस्था के सर्वोच्च अधिकारी।

 

राजस्व एवं न्याय व्यवस्था

मराठा साम्राज्य प्रशासनिक दृष्टि से तीन या चार विभागों में विभक्त था, जिसका प्रमुख ‘सूबेदार’ (प्रांतपति) होता था। न्याय का आधार शुक्रनीति, कौटिल्य के अर्थशास्त्र और धर्मशास्त्रों को बनाया गया था। राजस्व के लिए भूमि कर के अतिरिक्त ‘चौथ’ (पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा गारंटी कर) और ‘सरदेशमुखी’ (१०% अतिरिक्त कर) की व्यवस्था थी।

 

भाषाई स्वाभिमान: राज्यव्यवहारकोश

शिवाजी महाराज ने फारसी के स्थान पर संस्कृत और मराठी को राजकाज की भाषा बनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया। उनके निर्देश पर रामचंद्र अमात्य ने विद्वान धुन्धिराज के सहयोग से **’राज्यव्यवहारकोश’** निर्मित किया, जिसमें १३८० फारसी शब्दों के स्थान पर उपयुक्त संस्कृत शब्द गढ़े गए। इस संबंध में कहा गया है:

 कृते म्लेच्छोच्छेदे भुवि निरवशेषं रविकुला-

 वतंसेनात्यर्थं यवनवचनैर्लुप्तसरणीम्।

नृपव्याहारार्थं स तु विबुधभाषां वितनितुम्।

नियुक्तोऽभूद्विद्वान्नृपवर शिवच्छत्रपतिना ॥

 

ऐतिहासिक घटनाक्रम: एक दृष्टि में

 

१९ फरवरी, १६३० : शिवनेरी दुर्ग में जन्म 

१४ मई, १६४० : साईबाई के साथ विवाह 

१६४६ : तोरण दुर्ग पर विजय (प्रथम सैन्य सफलता)

१० नवंबर, १६५९ : प्रतापगढ़ के युद्ध में अफजल खान का वध 

१६६५ : मिर्जा राजा जयसिंह के साथ पुरंदर की संधि

१६६६ : आगरा के मुगल कारावास से ऐतिहासिक पलायन

१६७० : सूरत पर द्वितीय आक्रमण और विजय

१६७४ : रायगढ़ में राज्याभिषेक और ‘छत्रपति’ की उपाधि 

१६८० : रायगढ़ में महाप्रयाण

 

लेखक की विशेष टिप्पणी:

छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन और उनकी युद्ध नीति आज भी वैश्विक सैन्य संस्थानों के लिए शोध का विषय है। ‘हिंदवी स्वराज्य’ की यह यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि उनके द्वारा जलाई गई लौ ने आगे चलकर पूरे भारत को प्रभावित किया।

 

क्रमशः 

 

शिवाजी महाराज : अंतिम हिंदू सम्राट

 

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