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दत्तात्रेय रामचंद्र बेंद्रे: लोक-चेतना और परा-वाणी के कालजयी मनीषी

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​भूमिका: कन्नड़ काव्य को नव-उत्कर्ष देने वाले युगद्रष्टा

​भारतीय साहित्य के आकाश में दत्तात्रेय रामचंद्र बेंद्रे एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने कन्नड़ काव्य-धारा को आधुनिकता और सम्मानजनक ऊँचाइयों तक पहुँचाने में युगांतरकारी योगदान दिया। वे कन्नड़ नवोदय आंदोलन (कन्नड़ साहित्य का पुनर्जागरण काल) के प्रणेता और सर्वोत्कृष्ट कवियों में गिने जाते हैं। बेंद्रे जी की काव्य-प्रतिभा का वैशिष्ट्य यह था कि उनका प्रथम कविता संग्रह व्यावसायिक रूप से प्रकाशित होने से पूर्व ही, जनमानस और प्रबुद्ध समाज ने उन्हें एक सिद्ध कवि के रूप में सहर्ष अंगीकार कर लिया था। वे अपने युग की चेतना के जीवंत संवाहक थे, जिन्होंने साहित्य को बौद्धिक विलासिता से निकालकर लोक-संस्कृति के आंगन में प्रतिष्ठित किया।

 

​प्राकट्य, बाल्यकाल एवं संघर्षमयी शिक्षा

​इस महान मनीषी का प्राकट्य १३ जनवरी, १८९६ को कर्नाटक के धारवाड़ में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बेंद्रे जी का बाल्यकाल अत्यधिक अभावों, विसंगतियों और आर्थिक संकटों के बीच व्यतीत हुआ। जब वे मात्र बारह वर्ष के थे, तभी उनके पिता का असमय निधन हो गया। यद्यपि भौतिक रूप से उनका बचपन दरिद्रता में बीता, परंतु वैचारिक और आध्यात्मिक रूप से वे अत्यंत समृद्ध पृष्ठभूमि से थे; उनके पिता और पितामह (दादा) दोनों ही संस्कृत साहित्य के प्रकांड विद्वान थे।

​पिता के अवसान के पश्चात बेंद्रे जी की प्रारंभिक शिक्षा धारवाड़ में ही उनके चाचा के संरक्षण और सहयोग से संपन्न हुई। उन्होंने सन १९१३ में अपनी हाई स्कूल की परीक्षा अत्यंत मेधा के साथ उत्तीर्ण की और इसके पश्चात अपनी उच्च शिक्षा (बी.ए. और एम.ए.) पूरी कर ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर हुए।

 

​व्यावसायिक जीवन और ज्ञान-साधना

​बेंद्रे जी ने अपने व्यावसायिक जीवन का शुभारंभ धारवाड़ के ‘विक्टोरिया हाई स्कूल’ में एक शिक्षक के रूप में किया, जहाँ उन्होंने युवाओं के भीतर राष्ट्रवाद और साहित्य की अलख जगाई। अध्यापन उनके लिए मात्र आजीविका नहीं, अपितु राष्ट्र-निर्माण का एक पावन उपक्रम था। सन १९४४ से १९५६ तक उन्होंने शोलापुर स्थित ‘डी.ए.वी. कॉलेज’ में हिंदी और कन्नड़ साहित्य के प्रोफेसर (प्राध्यापक) के रूप में अपनी अमूल्य सेवाएं दीं। शिक्षा जगत से सेवानिवृत्त होने के बाद, वे धारवाड़ में ‘ऑल इंडिया रेडियो’ (आकाशवाणी) के मानद सलाहकार भी बने, जहाँ उन्होंने लोक-कलाओं और साहित्यिक कार्यक्रमों को जन-जन तक पहुँचाया।

 

​पैतृक संपदाएँ: ‘संस्कारिता’ और ‘विद्याप्रेम’

​दत्तात्रेय रामचंद्र बेंद्रे को उत्तराधिकार में भौतिक धन-दौलत के स्थान पर दो अमूल्य पैतृक संपदाएँ मिली थीं—’संस्कारिता’ और ‘विद्याप्रेम’। उनकी एक प्रसिद्ध कविता है—’बालकांड’। इस कविता में उन्होंने अपने बाल्यकाल की उन स्मृतियों और जीवंत छवियों को उकेरा है, जिसने उनके भीतर के कवि को गढ़ा था। उनके आस-पास का परिवेश भले ही विपन्न था, किसी भी घर में भौतिक संपन्नता न थी, फिर भी वहाँ एक अद्भुत आत्मिक जीवंतता और सामूहिक उल्लास था। वहाँ के लोग प्रकृति के हास-रुदन, ऋतु-परिवर्तनों और सांस्कृतिक पर्वों के साथ गहरे जुड़े थे; उनका संपूर्ण जीवन प्रकृति की लयों के साथ तालबद्ध था।

​उस दौर में ब्रज की भांति धारवाड़ में भी सामाजिक या पारिवारिक हर अनुष्ठान के साथ लोकगीत जुड़े रहते थे। भक्त, भिक्षुक, नर्तक, स्वांगी (बहुरूपिये) और फेरी वाले जब अपनी-अपनी अनूठी लयों में गीत गाते हुए आते, तो उन गीतों की रंगारंग देशज भाषा और लयों की विविधता बालक दत्तात्रेय के अचेतन मन पर अमिट छाप छोड़ जाती। यही कारण था कि सन १९३२ में उनका प्रथम आधिकारिक कविता संग्रह प्रकाशित होने से बहुत पहले ही ब्रज और कर्नाटक के लोक-समाज ने उन्हें ‘जन-कवि’ के रूप में सिर आँखों पर बिठा लिया था।

 

​काव्य-दर्शन: बौद्धिक प्रगीत और रहस्यवाद का अद्वैत

​बेंद्रे जी आधुनिक भारतीय वाङ्मय के सर्वाधिक प्रबुद्ध और बहुआयामी लेखकों में से एक हैं। उनके सम्मुख प्रारंभ से ही यह गहन रचनात्मक चुनौती थी कि लोक-समाज के सहज मनोभावों को अपनी व्यक्तिगत बौद्धिक और आध्यात्मिक अनुभूतियों के साथ किस प्रकार समरस किया जाए। उन्होंने चिंतन और भावानुभूति, वस्तुपरक (Objective) और आत्मपरक (Subjective) विषयों का अपनी रचनाओं में ऐसा अद्भुत समायोजन किया कि समकालीन आलोचकों ने उनके काव्य को ‘बौद्धिक काव्य’ (Intellectual Poetry) की संज्ञा दी।

​यह निर्विवाद सत्य है कि उनकी अनेक रचनाएँ उच्च कोटि के बौद्धिक प्रगीत हैं, जबकि अन्यान्य कविताओं के विषय विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक, दार्शनिक और रहस्यवादी हैं। किंतु बेंद्रे जी न तो केवल कोरे रोमांसवादी (Romantic) थे और न ही किसी संकीर्ण विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता के कवि। वे एक ‘संपूर्ण कवि’ (Total Poet) थे, जिन्होंने समूचे युग की समष्टिगत चेतना के साथ स्वयं को एकाकार किया था। भाषा, व्याकरण और अभिव्यक्ति पर उनका ऐसा असाधारण अधिकार था कि वे अत्यंत जटिल विचार-बोध, दार्शनिक सिद्धांतों और सूक्ष्मतम अनुभूतियों को भी सहज शब्दों में प्रत्यक्ष कर देते थे।

 

​’नाकुतंती’ (चार तार): काव्य-शिल्प की पराकाष्ठा

​’नाकुतंती’ (जिसका शाब्दिक अर्थ है—’चार तार’) बेंद्रे जी का वह कालजयी कविता संग्रह है, जिसने उन्हें भारतीय साहित्य के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया। इस संग्रह में कुल ४४ सारगर्भित कविताएँ संकलित हैं। इनमें से छह कविताओं का सीधा संबंध समकालीन रचनाकारों के प्रति उनके आत्मीय संबंधों और जनतंत्र (लोकतंत्र) के वास्तविक, व्यापक अभिप्रायों से है। शेष कविताओं में मानवीय चिंतन और उदात्त भावनाओं का एक ऐसा विलक्षण समन्वय देखने को मिलता है, जो पाठक को चमत्कृत कर देता है।

 

​काव्य के चतुष्पाद तत्त्व और वाक्-शक्ति का विमर्श

​बेंद्रे जी की सौंदर्यपरक और दार्शनिक दृष्टि में ‘चार’ के अंक का एक विशेष तात्विक महत्त्व था, जिसे वे सृष्टि और समष्टि का आधार स्तंभ मानते थे:

​व्यक्तित्व का चौहरा ढांचा: ‘नाकुतंती’ कविता में उन्होंने मानव व्यक्तित्व के चार पक्षों का निरूपण किया है—’मैं’ (अहं), ‘तुम’ (त्वं), ‘वह’ (तत्) और इन सबको जोड़ने वाली ‘कल्पनाशील आत्मसत्ता’। कवि ने चार के इसी मूलभूत तत्व को अपनी अनुभूति के सभी आध्यात्मिक और सौंदर्यात्मक क्षेत्रों में रेखांकित किया है।

​कविता के चार मूल तत्त्व: कविता की सृजन-प्रक्रिया पर लिखे गए अपने छह प्रसिद्ध सॉनेटों (Sonnets) में बेंद्रे जी ने काव्य के चार अनिवार्य तत्व गिनाए हैं—’शब्द’, ‘अर्थ’, ‘लय’ और उन सबको आत्मसात करने वाला ‘सहृदय’ (भावुक पाठक/श्रोता)।

​वाक्-शक्ति के चार रूप: संग्रह की एक अन्य विशिष्ट कविता में उन्होंने अत्यंत प्रभावपूर्ण बिंबों के माध्यम से भारतीय दर्शन में वर्णित वाक्-शक्ति (वाणी) के चारों सूक्ष्म रूपों का काव्यात्मक प्रकटीकरण किया है—’परा’, ‘पश्यंती’, ‘मध्यमा’ और ‘वैखरी’।

​सौंदर्य के चार आयाम: बेंद्रे जी की सौंदर्यपरक परिकल्पना भी चार स्तंभों पर टिकी है—इंद्रियगत (Sensory), कल्पनागत (Imaginative), बुद्धिगत (Intellectual) और आदर्श (Ideal)। ये चारों पक्ष उनकी कविताओं में यथास्थान अपनी पूरी आभा के साथ प्रस्फुटित होते हैं।

 

​कालजयी प्रमुख कृतियाँ

​काव्य-विधा के अतिरिक्त दत्तात्रेय रामचंद्र बेंद्रे ने नाटक, गद्य-शिल्प और आलोचना के क्षेत्र में भी कई अमर कृतियाँ रचीं, जो उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण हैं:

​(क) काव्य संग्रह

​१. कृष्णाकुमारी (प्रारंभिक ओजस्वी रचना)

२. हाडु-पाडु (लोक-लय से ओतप्रोत)

३. गंगावतरण (दार्शनिक गहराई युक्त)

४. हृदय समुद्र

५. मुगिल मल्लिगे

६. नाकुतंती (युगप्रवर्तक कृति)

७. मत्ते श्रावण बंतु

​(ख) नाट्य साहित्य

​१. हुच्चतगलु (पागलपन के सामाजिक आयामों पर चोट)

२. होस संसार (आधुनिक पारिवारिक विमर्श)

​(ग) कथा-साहित्य

​१. निराभरण सुंदरी

​(घ) आलोचना एवं विचार साहित्य

​१. मत्तु विमर्श

२. साहित्य संशोधन (गहन शोधपरक ग्रंथ)

३. विचार मंजरी

 

​राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार

​साहित्य के क्षेत्र में उनकी तपस्या और असाधारण साधना को देखते हुए उन्हें समय-समय पर देश के सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया गया:

​साहित्य अकादमी पुरस्कार (१९५८): उनकी उत्कृष्ट साहित्यिक सेवाओं के लिए।

​केलकर सम्मान (१९६५): वैचारिक और दार्शनिक लेखन हेतु।

​पद्मश्री (१९६८): भारत सरकार द्वारा राष्ट्र की सांस्कृतिक और साहित्यिक सेवा के लिए दिया गया नागरिक सम्मान।

​ज्ञानपीठ पुरस्कार (१९७३): उनके महान कविता संग्रह ‘नाकुतंती’ के लिए उन्हें साहित्य के इस सर्वोच्च भारतीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

 

​महाप्रयाण: एक युग का अवसान

​कन्नड़ भाषा को वैश्विक गौरव दिलाने के साथ-साथ मराठी, संस्कृत और हिंदी जैसी अन्यान्य भारतीय भाषाओं के प्रति भी अपना अमूल्य वैचारिक अवदान देने वाले इस महान मनीषी का २६ अक्टूबर, १९८१ को महाराष्ट्र (मुंबई) के एक अस्पताल में महाप्रयाण (निधन) हो गया। भले ही भौतिक रूप से वे इस नश्वर संसार में नहीं हैं, परंतु उनका ‘शब्द, अर्थ, लय और सहृदय’ का दर्शन संपूर्ण भारतीय वाङ्मय का मार्गदर्शन करता रहेगा।

 

 

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