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विश्व विजयी तिरंगा प्यारा: पिंगली वेंकैया और हमारे राष्ट्रीय ध्वज के विकास की गौरव-गाथा

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: स्वतंत्रता और राष्ट्रीय अस्मिता का सर्वोच्च प्रतीक

​”झंडा ऊँचा रहे हमारा… विश्व विजयी तिरंगा प्यारा…”

​यह केवल एक गीत की पंक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि यह १४० करोड़ भारतवासियों के स्पंदन, त्याग और राष्ट्रीय अस्मिता की सामूहिक हुंकार है। २०वीं सदी में जब हमारा देश ब्रिटिश हुकूमत की बेड़ियों से मुक्ति पाने के लिए लहू बहा रहा था, तब देश के स्वतंत्रता सेनानियों को एक ऐसे ध्वज की तीव्र आवश्यकता महसूस हुई जो संपूर्ण भारत को एक सूत्र में पिरो सके; क्योंकि ध्वज केवल कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि संप्रभुता और स्वतंत्रता की पहली और अंतिम अभिव्यक्ति का प्रतीक होता है। १५ अगस्त १९४७ को तिरंगा हमारी आज़ादी का आधिकारिक गवाह बना, परंतु इस मुकाम तक पहुँचने का इतिहास अत्यंत रोचक, उतार-चढ़ाव भरा और प्रेरणादायी है।

शुरुआती प्रयास: सिस्टर निवेदिता से भीकाजी कामा तक

​हमारे राष्ट्रीय ध्वज की विकास यात्रा की शुरुआत सन १९०४ में हुई। स्वामी विवेकानंद की परम शिष्या सिस्टर निवेदिता ने पहली बार एक राष्ट्रीय ध्वज की अभिकल्पना की, जिसे इतिहास में ‘सिस्टर निवेदिता ध्वज’ के नाम से जाना गया। वज्र के चिह्न से सुशोभित यह ध्वज मुख्य रूप से लाल और पीले रंग से निर्मित था।

​इसके पश्चात, तीन रंगों वाले ध्वज का प्रारंभिक स्वरूप सन १९०६ में देखने को मिला, जब बंगाल के विभाजन के विरोध में निकाले गए एक विशाल जुलूस में शचीन्द्र कुमार बोस एक नया ध्वज लेकर सामने आए। इस ध्वज में सबसे ऊपर केसरिया, बीच में पीला और सबसे नीचे हरा रंग उपयोग किया गया था। इसके केसरिया भाग पर आठ अधखिले सफ़ेद कमल के फूल अंकित थे, जो भारत के तत्कालीन आठ प्रांतों के प्रतीक थे। नीचे की हरी पट्टी पर सूर्य और चंद्रमा की आकृतियाँ थीं, तथा बीच की पीली पट्टी पर देवनागरी लिपि में ‘वंदेमातरम’ उकेरा गया था।

​क्रांति की यह लौ जब सात समंदर पार पहुँची, तो सन १९०८ में महान क्रांतिकारी मैडम भीकाजी कामा ने जर्मनी के स्टटगार्ट में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में भारत का तिरंगा झंडा लहराकर तहलका मचा दिया। इस ध्वज को मैडम कामा, वीर सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा ने मिलकर संयुक्त रूप से तैयार किया था। धार्मिक एकता को रेखांकित करते हुए इसमें सबसे ऊपर इस्लाम का प्रतीक हरा रंग, बीच में ईसाइयत व बौद्ध धर्म का प्रतीक सफ़ेद (कुछ इतिहासकारों के अनुसार पीला) और सबसे नीचे हिंदुओं का प्रतीक केसरिया/लाल रंग रखा गया था। इस पर भी आठ कमल और बीच में ‘वंदेमातरम’ अंकित था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान पेरिस और बर्लिन में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों द्वारा अपनाए जाने के कारण इसे बाद में ‘बर्लिन कमेटी ध्वज’ भी कहा गया।

 

​पिंगली वेंकैया का आगमन और नेशनल फ़्लैग मिशन

​सन १९१६ में आंध्र प्रदेश के भू-विज्ञानी और प्रखर राष्ट्रभक्त पिंगली वेंकैया ने एक ऐसे ध्वज की कल्पना की, जो भौगोलिक और धार्मिक विविधताओं से भरे भारत के हर नागरिक को एक मंच पर ला सके। उनकी इस राष्ट्रव्यापी पहल को एस.बी. बोमान जी और उमर सोमानी जी का सुदृढ़ साथ मिला। इन तीनों राष्ट्रभक्तों ने मिलकर ‘नेशनल फ़्लैग मिशन’ का गठन किया।

​पिंगली वेंकैया जी ने राष्ट्रीय ध्वज की मूल रूपरेखा तैयार करने के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से विमर्श किया। गांधी जी ने देश की प्रगति और स्वावलंबन को प्रदर्शित करने के लिए इस ध्वज के केंद्र में ‘चरखा’ (अशोक चक्र का प्रारंभिक स्वरूप) रखने की सलाह दी। वेंकैया जी शुरुआत में लाल और हरे रंग की पृष्ठभूमि पर चरखा बनाकर लाए थे, जो क्रमशः हिंदू और मुस्लिम आबादी का प्रतिनिधित्व करता था। परंतु गांधी जी को लगा कि यह ध्वज भारत की अन्य अल्पसंख्यक संस्कृतियों और संपूर्ण भूभाग का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करता।

​रंगों और प्रतीकों को लेकर देश में लंबे समय तक गहन विमर्श और वाद-विवाद चलते रहे। सन १९२४ में ‘अखिल भारतीय संस्कृत कांग्रेस’ ने ध्वज में पूर्णतः केसरिया रंग रखने और बीच में ‘गदा’ डालने का प्रस्ताव इस तर्क के साथ दिया कि यह शौर्य और हिंदुओं का प्राचीन प्रतीक है। इसी क्रम में कुछ विद्वानों ने ‘गेरुआ’ रंग अपनाने का विचार रखा, जो हिंदू, मुसलमान और सिख तीनों ही संप्रदायों के संन्यास व त्याग की भावना को एक समान व्यक्त करता था।

 

​सन १९३१ की ऐतिहासिक सहमति और आज़ादी का संग्राम

​जब तमाम तर्कों और वितर्कों के बाद भी कोई एक सर्वसम्मत रूप तय नहीं हो पाया, तो सन १९३१ में अखिल भारतीय कांग्रेस ने राष्ट्रीय ध्वज को अंतिम मूर्त रूप देने के लिए एक विशेष ७ सदस्यीय ध्वज समिति का गठन किया। इसी वर्ष कराची में आयोजित कांग्रेस कमेटी की ऐतिहासिक बैठक में पिंगली वेंकैया द्वारा परिमार्जित किए गए ध्वज को आधिकारिक सहमति मिल गई। इस ध्वज में शीर्ष पर केसरिया, मध्य में श्वेत और आधार में हरे रंग की पट्टियों के साथ केंद्र में प्रगति का सूचक ‘चरखा’ स्थापित था। इसी तिरंगे की छांव तले आज़ादी के मतवालों ने भारत छोड़ो आंदोलन सहित कई ऐतिहासिक संग्राम लड़े और अंततः सन १९४७ में ब्रिटिश हुकूमत को भारत छोड़ने पर विवश कर दिया।

संविधान सभा की स्वीकृति और तिरंगे का आधुनिक स्वरूप

​आज़ादी की आधिकारिक घोषणा से कुछ ही दिन पूर्व, देश के नीति-नियंताओं के सामने यह यक्ष प्रश्न पुनः खड़ा हुआ कि स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अंतिम स्वरूप क्या होना चाहिए। इसके समाधान के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय तदर्थ (Ad-hoc) कमेटी बनाई गई। व्यापक विमर्श के ठीक तीन सप्ताह बाद, इस कमेटी ने अखिल भारतीय कांग्रेस के ध्वज को ही थोड़े से बदलाव के साथ राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार करने की पुरज़ोर सिफ़ारिश की।

​तदनुसार, २२ जुलाई, १९४७ को आयोजित भारतीय संविधान-सभा की विशेष बैठक में इस ध्वज को स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज के रूप में सर्वसम्मति से अपना लिया गया। संशोधनों के तहत केंद्र में स्थित चरखे के स्थान पर सम्राट अशोक के धर्मचक्र को स्थान दिया गया।

हमारे तिरंगे की वर्तमान बनावट और नियम

​वर्तमान में हमारा राष्ट्रीय ध्वज तीन समान चौड़ाई की क्षैतिज पट्टियों से सुशोभित है, जिनकी अपनी विशिष्ट व्याख्या है:

​सबसे ऊपर केसरिया रंग: जो देश के शौर्य, साहस और त्याग का प्रतीक है।

​बीच में श्वेत रंग: जो शांति, सत्य और शुचिता का संवाहक है।

​सबसे नीचे गहरा हरा रंग: जो देश की हरियाली, संपन्नता और विश्वास का सूचक है।

​ध्वज की लंबाई एवं चौड़ाई का मानक अनुपात सदैव ३:२ होता है। श्वेत पट्टी के ठीक मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र सुशोभित है, जिसमें २४ आरे (तीलियाँ) होती हैं। यह चक्र चौबीसों घंटे देश की निरंतर प्रगति और न्याय का संदेश देता है। इस चक्र का व्यास लगभग श्वेत पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसका रूप सारनाथ में स्थित सम्राट अशोक के सिंह स्तंभ के शीर्षफलक पर बने चक्र से लिया गया है।

 

​उपसंहार: अनंत आकाश में लहराता स्वाभिमान

​१५ अगस्त १९४७ की मध्यरात्रि को जब दुनिया सो रही थी, तब भारत का यह तिरंगा स्वतंत्र गगन में पहली बार लहराकर हमारे नए बिहान की घोषणा कर रहा था। पिंगली वेंकैया जी की दूरदर्शी अभिकल्पना और लाखों हुतात्माओं के बलिदान का परिणाम है कि आज तिरंगा विश्व पटल पर भारत के बढ़ते कदमों का गवाह है। यह केवल एक ध्वज नहीं, हमारी रगों में दौड़ता राष्ट्रवाद है।

 

​धन्यवाद!

 

 

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