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बक्सर वासियों दिए जलाओ, खुशियाँ मनाओ! हिंदी साहित्याकाश के अमर ‘आचार्य’ शिवपूजन सहाय का प्रामाणिक जीवन-वृत्त

 

​भूमिका: एक युग-प्रवर्तक चेतना का जन्मोत्सव

​बक्सर वासियों दिए जलाओ, खुशियाँ मनाओ… आज हमारी पावन और ऐतिहासिक धरती के एक ऐसे महान विभूति, राष्ट्रसेवक और हिंदी के अनन्य उपासक का जन्मोत्सव है, जिन्होंने अपनी लेखनी से संपूर्ण भारतवर्ष को आलोकित किया। हम बात कर रहे हैं—आचार्य शिवपूजन सहाय जी की। ९ अगस्त, १८९३ को शाहाबाद ज़िले (वर्तमान बक्सर उपसंभाग, बिहार) के ‘उनवास’ ग्राम में जन्मी यह चेतना केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आप में हिंदी गद्य साहित्य का एक संपूर्ण स्वर्ण-युग थी।

 

शिक्षा और बौद्धिक संस्कार: आरा की भूमि का अवदान

​आरा (भोजपुर) के निवासियों, खुशियाँ मनाने और गर्व करने का अधिकार आपका भी उतना ही है; क्योंकि इस महान विभूति के मानसिक और बौद्धिक स्वरूप को गढ़ने वाले शिक्षक और कोई नहीं, बल्कि आप ही हैं। आचार्य जी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा के बाद, उन्होंने आरा नगर के ही एक प्रतिष्ठित हाईस्कूल से मैट्रिक की परीक्षा अत्यंत गौरव के साथ उत्तीर्ण की थी। यहीं से उनके भीतर भाषा, व्याकरण और साहित्य के प्रति वह अनुकरणीय कशिश पैदा हुई, जिसने आगे चल कर उन्हें हिंदी जगत का ‘आचार्य’ बना दिया।

 

​वैश्विक कर्मभूमि: बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार का सांस्कृतिक सेतु

​आज के इस उल्लास और गौरव में केवल बिहार ही नहीं, बल्कि बंगाल और उत्तर प्रदेश भी समान रूप से भागीदार हैं, क्योंकि आचार्य जी की मेधा किसी एक भौगोलिक सीमा में बंधकर नहीं रही:

​कलकत्ता (बंगाल) की पत्रकारिता: उन्होंने कला और पत्रकारिता के तत्कालीन वैश्विक केंद्र ‘कलकत्ता’ (कोलकाता) से पत्रकारिता की विधा का व्यावहारिक व व्यावहारिक अध्ययन किया।

लखनऊ और काशी (उत्तर प्रदेश) में साहित्य साधना: उत्तर प्रदेश की साहित्यिक त्रिवेणी में गोता लगाते हुए उन्होंने लखनऊ में कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद जी के साथ सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘माधुरी’ का संपादन किया। इसके पश्चात, उन्होंने बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी (वाराणसी) में दीर्घकाल तक प्रवास किया, जहाँ उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता, लेखन और साहित्यकारों की एक नई पीढ़ी को तैयार करने का महती कार्य किया।

दरभंगा और छपरा (बिहार) में अवदान: उत्तर प्रदेश से लौटकर आचार्य शिवपूजन सहाय जी ‘लहेरियासराय’ (दरभंगा) पधारे, जहाँ उन्होंने बच्चों के अत्यंत लोकप्रिय मासिक पत्र ‘बालक’ का ऐतिहासिक संपादन किया। इसके बाद, वे कुछ वर्षों तक राजेंद्र कॉलेज, छपरा में हिंदी के प्राध्यापक (प्रोफेसर) के रूप में भी अपनी सेवाएं देते रहे।

​पटना आगमन और राष्ट्रभाषा परिषद्: जीवन के उत्तरार्ध में उनका आगमन बिहार की राजधानी पटना में हुआ। यहाँ उन्होंने लगातार नौ वर्षों तक ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्’ के महानिदेशक के पद को सुशोभित किया और हिंदी अनुसंधान को एक वैश्विक पहचान दी।

 

साहित्यिक वैशिष्ट्य, कृतित्व एवं राजकीय सम्मान

​आचार्य शिवपूजन सहाय जी केवल एक लेखक नहीं थे; स्वतंत्रता के बाद वे ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद’ के संचालक होने के साथ-साथ ‘बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन’ की ओर से प्रकाशित होने वाले ‘साहित्य’ नामक उच्च कोटि के शोध-समीक्षाप्रधान त्रैमासिक पत्र के मुख्य संपादक भी थे।

​उन्होंने अपने सामाजिक जीवन का शुभारंभ एक समर्पित हिंदी शिक्षक के रूप में किया था, और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से वे साहित्य की मुख्यधारा में आए। उनके प्रारंभिक और तीखे लेख उस दौर की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं—‘लक्ष्मी’, ‘मनोरंजन’ तथा ‘पाटलीपुत्र’ में अत्यंत प्रमुखता से प्रकाशित होते थे।

 

सर्वोच्च नागरिक सम्मान:

​हिंदी साहित्य, भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में उनके इसी युगांतकारी अवदान को रेखांकित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें सन १९६० में ‘पद्म भूषण’ के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत किया। इसके तुरंत बाद, १९६२ में भागलपुर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें ‘डी.लिट्.’ (Doctor of Letters) की मानद उपाधि से विभूषित किया गया।

 

‘देहाती दुनिया’ और लखनऊ के दंगों की वह मर्मस्पर्शी त्रासदी

​आचार्य शिवपूजन सहाय जी को हिंदी साहित्य में ‘पहला आंचलिक उपन्यासकार’ होने का गौरव प्राप्त है। उनकी अमर औपनिवेशिक और प्रयोगात्मक चरित्र-प्रधान कृति ‘देहाती दुनिया’ को हिंदी का पहला अनूठा आंचलिक उपन्यास माना जाता है। परंतु इस महान कृति के साथ एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और दुखद त्रासदी जुड़ी हुई है:

इतिहास की एक क्रूर घटना: आचार्य जी ने ‘देहाती दुनिया’ की जो पहली मूल पाण्डुलिपि (Manuscript) अपने खून-पसीने से सींचकर तैयार की थी, वह लखनऊ में हुए भयानक हिंदू-मुस्लिम दंगे की भेंट चढ़ गई और आग में नष्ट हो गई। एक रचनाकार के लिए अपनी पहली कालजयी रचना का इस प्रकार नष्ट हो जाना किसी संतान को खोने जैसा था। आचार्य जी को इस अपूरणीय क्षति का दुःख जीवन के अंतिम क्षणों तक रहा, यद्यपि बाद में उन्होंने इसका पुनर्सृजन किया।

 

निष्कर्ष: संपूर्ण हिंदी जगत के आलोक-पुंज

​इस समग्र विमर्श के आलोक में यदि देखा जाए, तो आचार्य शिवपूजन सहाय केवल बक्सर, आरा, पटना, कोलकाता या लखनऊ के नहीं थे; वरन उन्होंने अपनी साहित्यिक आभा और निष्काम साधना से संपूर्ण हिंदी जगत को आलोकित किया है। वे एक ऐसे ‘आचार्य’ थे जिनके व्याकरण, भाषा-शैली और संपादन कला के सामने मायानगरी से लेकर काशी तक के विद्वान नतमस्तक होते थे। बक्सर की माटी से उपजा यह अनमोल रत्न हमेशा-हमेशा के लिए अमर है।

 

 

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