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‘प्रहार’ (Prahaar: The Final Attack) केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि समाज के गाल पर एक करारा तमाचा है। नाना पाटेकर ने न केवल इसका निर्देशन किया, बल्कि इसमें अपनी आत्मा झोंक दी।

 

निर्देशक: नाना पाटेकर

निर्माता: सुधाकर बोकाडे

संगीतकार: लक्ष्मीकांत प्यारेलाल

प्रदर्शन तिथियाँ: 29 नवंबर, 1991

मुख्य कलाकार: नाना पाटेकर (मेजर चौहान), डिम्पल कपाड़िया (किरन), गौतम जोगलेकर (पीटर डिसूजा), माधुरी दीक्षित (शर्ली), मकरंद देशपांडे, (शर्ली का भाई), हबीब तनवीर (पीटर के पिता) आदि।

 

कहानी: पीटर डिसूजा (गौतम जोगलेकर) एक भारतीय सेना अधिकारी है जो अपने बटालियन के विशेषज्ञ कमांडो प्लैटून में शामिल होना चाहता है। उसके पिता जॉन डिसूजा (हबीब तनवीर) चाहते हैं कि पीटर उनके बाद पारिवारिक बेकरी चलाएं, उसकी मंगेतर शर्ली (माधुरी दीक्षित) चाहती है कि वह उससे शादी करें, जबकि उसकी पड़ोसी किरण (डिम्पल कपाड़िया) पीटर को अपने दिल की बात मानने के लिए कहती है। राजपूताना राइफल्स रेजिमेंटल सेंटर में पीटर कमांडो प्रशिक्षण के लिए चल देता है।

बड़ी कठिनाइयों के बावजूद वह प्रशिक्षण पूरा करता है और अपनी कक्षा में सबसे ऊपर आता है। बचाव अभियान के दौरान, वह अपने पैरों के उपयोग को खो देता है और सेना से उसे सम्मानित रूप से छुट्टी दी जाती है। बाद में, वह चौहान को अपने विवाह में आमंत्रित करने के लिए चिट्ठी लिखता है।

जब चौहान शादी के लिए मुम्बई में पीटर के पते तक पहुँचा, तो उसे एक पड़ोसी ने सूचित किया कि पीटर मर चुका है। चौहान पीटर के क्षेत्र की कई चौंकाने वाली सच्चाइयों को जानता है। किरण ने उसे बताया कि गुंडों का एक समूह क्षेत्र के लोगों से पैसे माँगता था। पीटर ने अपने पिता की बेकरी में बैठे हुए उन्हें देने से इंकार कर दिया और उन्हें चुनौती दी। गिरोह ने पूरे इलाके के सामने पीटर को मार डाला, जबकि पीटर अंत तक एक सैनिक की तरह लड़ा। चौहान ने पाया कि एक भी व्यक्ति, यहाँ तक कि पीटर के पिता भी, डर से उनके खिलाफ गवाही देने के लिए तैयार नहीं हैं। कहानी…

 

मिलिट्री अनुशासन बनाम सिविलियन ‘कैजुअल’ रवैया: फिल्म का सबसे गहरा संघर्ष यहीं है। मेजर चौहान (नाना पाटेकर) के लिए अनुशासन जीवन है, जबकि आम नागरिकों के लिए यह एक ‘बोझ’ है।

टकराव: जब मेजर चौहान सिविलियन लाइफ में आते हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि सरहद पर दुश्मन पहचानना आसान है, लेकिन शहर की भीड़ में छिपे ‘कीड़ों’ (अपराधियों) को पहचानना और उनसे लड़ना मुश्किल है, क्योंकि समाज ने उन बुराइयों को स्वीकार कर लिया है।

 

समाज का डर और नपुंसकता (The Apathy): फिल्म बखूबी दिखाती है कि समाज बुराई से उतना नहीं डरता, जितना वह ‘झमेले’ से डरता है। जब पीटर (गौतम जोगलेकर) को गुंडे मारते हैं, तो पूरा मोहल्ला खिड़कियों से देखता है। यह दृश्य समाज की उस ‘मजबूरी’ पर सवाल उठाता है जो असल में कायरता है। फिल्म संदेश देती है कि यदि आप अन्याय होते देख रहे हैं और चुप हैं, तो आप भी अपराधी हैं।

 

परवरिश और नियति: विरोधाभास की दो कहानियाँ
फिल्म दो विपरीत चरित्रों के माध्यम से ‘महानता’ और ‘पतन’ को दर्शाती है:

किरण (माधुरी दीक्षित) का भाई: एक संभ्रांत घर और देशभक्त पिता (हबीब तनवीर) का बेटा होने के बावजूद वह आवारा और नशेड़ी (चरसी) बन जाता है। यह दिखाता है कि विरासत में मिली महानता तब तक व्यर्थ है जब तक व्यक्ति का अपना चरित्र मजबूत न हो।

पीटर और अन्य जवान: ये साधारण पृष्ठभूमि से आकर ट्रेनिंग के जरिए खुद को महान बनाते हैं। मेजर चौहान का यह कहना कि “गलत जगह जन्म लेने से इंसान गलत नहीं होता”, उन सभी के लिए है जो अपनी परिस्थितियों को दोष देते हैं।

 

सैन्य प्रशिक्षण: रोंगटे खड़े कर देने वाली वास्तविकता
फिल्म का पहला हिस्सा कमांडो ट्रेनिंग को इतने यथार्थवादी ढंग से दिखाता है कि दर्शक खुद को उस थकान और पसीने का हिस्सा महसूस करने लगते हैं। नाना पाटेकर ने वास्तव में पुणे के मराठा लाइट इन्फेंट्री में ट्रेनिंग ली थी, जिसका प्रभाव स्क्रीन पर दिखता है। वह ‘कठोरता’ बनावटी नहीं लगती। वह सिखाते हैं कि सेना केवल हथियार चलाना नहीं, बल्कि मानसिक मजबूती का नाम है।

 

कलाकारों का जीवंत प्रदर्शन:

नाना पाटेकर: मेजर चौहान के रूप में उन्होंने एक ऐसा चरित्र गढ़ा जो निडर है, लेकिन अंदर से भावुक भी। उनकी संवाद अदायगी और आंखों की तीव्रता बेमिसाल है।

डिंपल कपाड़िया: एक विधवा और माँ के रूप में उन्होंने समाज की उस बेबसी को आवाज दी है जो व्यवस्था से हार चुकी है।

माधुरी दीक्षित: एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका में उन्होंने फिल्म में कोमलता और मानवीय संवेदनाओं को जोड़ा।

 

संगीत और निर्देशन:

निर्देशन: नाना पाटेकर का निर्देशन बहुत ‘रॉ’ और सच्चा है। उन्होंने कहीं भी व्यावसायिकता के लिए फिल्म की गंभीरता से समझौता नहीं किया।

संगीत: फिल्म के गाने जैसे “धड़कन जरा रुक गई है” कहानी के दर्द को गहराई देते हैं। बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के तनाव को बनाए रखने में सफल रहा है।

 

कहानी के अंत की व्याख्या (The Final Attack)
फिल्म का अंत सबसे ज्यादा विवादित और चर्चित रहा है। जब मेजर चौहान उस अपराधी का गला काट देते हैं, तो यह केवल एक हत्या नहीं, बल्कि समाज की सड़ी-गली चुप्पी के खिलाफ एक विद्रोह है। अंत में उनका वह ‘कमांडो’ वाला रूप और छोटे बच्चों को ट्रेनिंग देना यह संकेत है कि अगली पीढ़ी को अभी से तैयार करना होगा ताकि वे अन्याय के सामने सिर न झुकाएँ।

 

निष्कर्ष: ‘प्रहार’ हमें आईना दिखाती है कि हम ‘सभ्य’ होने के नाम पर कितने कायर हो गए हैं। यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी १९९१ में थी।

 

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