images (2)

कुंभनदास जी, सूरदास जी के बाद अष्टछाप के तीसरे रत्न के रूप में हम नंददास जी को लेते हैं। नंददास जी के बारे में साहित्य जगत में एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है— “और कवि गड़िया, नंददास जड़िया”। यानी अन्य कवि केवल शब्द गढ़ते हैं, जबकि नंददास जी उन्हें किसी जौहरी की तरह जड़ देते हैं।

 

महाकवि नंददास: अष्टछाप के ‘जड़िया’ कवि और कलात्मक सौंदर्य के शिल्पी

 

परिचय और व्यक्तित्व

नंददास जी अष्टछाप के कवियों में सूरदास के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इनका जन्म संवत् १५९० (सन् १५३३) के आसपास उत्तर प्रदेश के रामपुर (सोरों) गाँव में हुआ था। वे गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे। कहा जाता है कि वे स्वभाव से बहुत रसिक थे, लेकिन विट्ठलनाथ जी के संपर्क में आने के बाद उनकी वह रसिकता कृष्ण-भक्ति में परिवर्तित हो गई।

 

“और कवि गड़िया, नंददास जड़िया” का अर्थ

नंददास जी की सबसे बड़ी विशेषता उनकी भाषा का सुगठित प्रयोग है। वे शब्दों का चयन इतनी बारीकी और सुंदरता से करते थे कि उनके काव्य में एक विशेष चमक आ जाती थी। ब्रजभाषा का जितना परिष्कृत और व्याकरण-सम्मत रूप नंददास के यहाँ मिलता है, वह दुर्लभ है। इसीलिए उन्हें साहित्य का ‘जौहरी’ या ‘जड़िया’ कहा जाता है।

 

प्रमुख कृतियाँ: ‘रासपंचाध्यायी’ और ‘भँवर गीत’

नंददास जी केवल एक भक्त ही नहीं, बल्कि एक शास्त्रीय विद्वान भी थे। उनकी रचनाएँ काव्य और दर्शन का अद्भुत मिश्रण हैं:

१. रासपंचाध्यायी: यह उनकी सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है। इसमें रोला छंद का प्रयोग किया गया है और कृष्ण की रासलीला का वर्णन इतना कलात्मक है कि वियोगी हरि ने इसे ‘हिंदी का गीत-गोविंद’ कहा है।

 २. भँवर गीत: जैसे सूरदास ने ‘भ्रमरगीत’ लिखा, वैसे ही नंददास ने ‘भँवर गीत’ की रचना की। जहाँ सूरदास का वर्णन भावुकता प्रधान है, वहीं नंददास का वर्णन तर्क और दर्शन प्रधान है। यहाँ गोपियाँ उद्धव के ज्ञान मार्ग का खंडन बड़ी तार्किकता से करती हैं।

 ३. अनेकार्थ मंजरी: यह एक प्रकार का शब्दकोश ग्रंथ है, जो उनकी विद्वत्ता का परिचायक है।

४. रूपमंजरी: यह एक सुंदर प्रेमाख्यानक काव्य है।

 

काव्यगत विशेषताएँ

शास्त्रीय ज्ञान: नंददास के काव्य में छंद, अलंकार और व्याकरण की शुद्धता स्पष्ट दिखाई देती है।

संगीत और लय: उनके पदों में एक आंतरिक संगीत है, जो उन्हें कीर्तन सेवा के लिए अत्यंत उपयुक्त बनाता है।

विरह वर्णन: उनके विरह वर्णन में एक विशेष प्रकार की गंभीरता और दार्शनिकता होती है।

 

महाप्रयाण

नंददास जी ने अपना अधिकांश जीवन गोवर्धन में बिताया और वहीं कृष्ण-लीलाओं का गान करते हुए संवत् 1640 के आसपास गोलोकवासी हुए।

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *