परमानंददास: अष्टछाप के अनन्य भक्त और वात्सल्य के माधुर्य कवि
परिचय और व्यक्तित्व
परमानंददास जी अष्टछाप के कवियों में माधुर्य भाव के सबसे बड़े संवाहक माने जाते हैं। इनका जन्म संवत् १५५० (सन् १४९३) के आसपास उत्तर प्रदेश के कन्नौज में एक कान्यकुब्ज ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे जन्म से ही बहुत शांत और विरक्त स्वभाव के थे। प्रारंभ में वे प्रयाग के आसपास रहकर अपनी ही धुन में पद गाया करते थे।
गुरु मिलन: वह पद जिसने वल्लभाचार्य को बेसुध कर दिया
परमानंददास जी की भेंट महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से प्रयाग के अड़ैल नामक स्थान पर हुई थी। उस समय उन्होंने महाप्रभु को अपना एक पद सुनाया:
“कान्ह भये जलवत अवतार…”
इस पद में कृष्ण की जल-क्रीड़ा का ऐसा सजीव वर्णन था कि वल्लभाचार्य जी कई दिनों तक मूर्छित (बेसुध) रहे। उन्होंने परमानंददास जी को तुरंत अपना शिष्य बनाया और उन्हें ‘दशम स्कंध’ की कथा सुनाई। इसके बाद वे स्थाई रूप से गोवर्धन पर रहकर श्रीनाथ जी की सेवा करने लगे।
काव्यगत विशेषताएँ और वात्सल्य
सूरदास के बाद यदि किसी कवि ने कृष्ण के वात्सल्य और बाल-रूप का सबसे मार्मिक चित्रण किया है, तो वे परमानंददास जी ही हैं।
भाव-प्रधान काव्य: उनके पदों में कला की बारीकियों से ज्यादा ‘भाव’ की प्रधानता है। वे कृष्ण के विरह और मिलन दोनों अवस्थाओं को बड़ी गहराई से चित्रित करते हैं।
संगीत का माधुर्य: उनके पद राग-रागिनियों में बंधे हुए हैं, जिन्हें गाते समय एक अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है।
प्रमुख ग्रंथ: ‘परमानंद सागर’
परमानंददास जी की रचनाओं का सबसे बड़ा संग्रह ‘परमानंद सागर’ है। इसमें लगभग दो हज़ार से अधिक पद संकलित हैं।
इस ग्रंथ में कृष्ण के जन्म से लेकर गोपी-विरह तक की लीलाओं का वर्णन है।
उनके कुछ अन्य पद ‘दानलीला’ और ‘ध्रुवचरित’ के रूप में भी मिलते हैं।
महाप्रयाण
उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन श्रीनाथ जी की सेवा और कीर्तन में समर्पित कर दिया। संवत् १६४१ के आसपास, गोवर्धन के ‘सुरभि कुंड’ के पास उन्होंने अपनी देह त्याग दी। उनके अंतिम समय में गोस्वामी विट्ठलनाथ जी स्वयं उपस्थित थे।