कृष्णदास: अष्टछाप के कुशल प्रबंधक और अनन्य पदकार
परिचय और प्रारंभिक जीवन
कृष्णदास जी का जन्म संवत् १५५३ (सन् १४९६) के आसपास गुजरात के राजनगर में एक कुनबी (पटेल) परिवार में हुआ था। अष्टछाप के कवियों में वे अपनी प्रशासनिक सूझबूझ और अनन्य भक्ति के अनूठे संगम के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने महाप्रभु वल्लभाचार्य जी से दीक्षा ली थी।
मंदिर के ‘अधिकारी’ का उत्तरदायित्व
कृष्णदास जी की योग्यता और निष्ठा को देखते हुए महाप्रभु वल्लभाचार्य और बाद में गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने उन्हें श्रीनाथ जी के मंदिर का ‘अधिकारी’ नियुक्त किया था। मंदिर की पूरी व्यवस्था, भंडार और उत्सवों का प्रबंधन उन्हीं के हाथों में था। कहा जाता है कि वे बड़े कड़े अनुशासन प्रिय थे, लेकिन उनका हृदय कृष्ण के प्रेम में सदैव कोमल बना रहता था।
काव्यगत विशेषताएँ और माधुर्य भाव
कृष्णदास जी के काव्य में ‘सख्य’ और ‘माधुर्य’ भाव की प्रधानता है। उनके पदों में ब्रजभाषा का बहुत ही सुंदर और प्रवाहपूर्ण प्रयोग मिलता है। यद्यपि वे प्रशासनिक कार्यों में व्यस्त रहते थे, फिर भी उन्होंने कृष्ण की लीलाओं पर सैकड़ों सुंदर पदों की रचना की।
लीला गान: उनके पदों में कृष्ण की बाल-लीलाओं के साथ-साथ युगल स्वरूप (राधा-कृष्ण) की झाँकी बहुत मनमोहक है।
भ्रमरगीत: इन्होंने भी भ्रमरगीत परंपरा में पदों की रचना की है, जिसमें विरह की गहरी वेदना झलकती है।
प्रमुख रचनाएँ: ‘जुगलमान चरित’
कृष्णदास जी की सबसे प्रसिद्ध रचना ‘जुगलमान चरित’ है।
इसमें राधा और कृष्ण के युगल रूप का वर्णन किया गया है।
इसके अतिरिक्त उनके लगभग २५०-३०० पद ‘कृष्णदास के पद’ के नाम से संकलित मिलते हैं।
व्यक्तित्व के दो पक्ष
कृष्णदास जी का जीवन हमें सिखाता है कि कैसे ‘कर्म’ (प्रबंधन) और ‘भक्ति’ (काव्य) को एक साथ साधा जा सकता है। वे जहाँ बाहरी दुनिया के लिए एक कठोर प्रशासक थे, वहीं एकांत में अपने आराध्य के सामने एक भावुक भक्त बन जाते थे।
महाप्रयाण
कृष्णदास जी ने अपना संपूर्ण जीवन गोवर्धन की तलहटी में श्रीनाथ जी की सेवा में व्यतीत किया। संवत् १६३५ के आसपास उन्होंने अपनी देह त्याग दी।