1778036355232

‘बंगाल डायरी’ श्रृंखला की तीसरी और सबसे रोमांचक कड़ी प्रस्तुत है। यह आलेख उस कालखंड को समर्पित है जिसे इतिहास की किताबों ने लगभग भुला दिया था—आजादी की वह खूनी कीमत जो बंगाल के हिंदुओं ने चुकाई और वह महानायक जिसने कोलकाता को ‘कब्रिस्तान’ बनने से बचाया।

 

बंगाल डायरी – भाग ३: आजादी का अधूरा सच और ‘गोपाल पाठा’ का शौर्य

लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण

 

१९४६ का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’: बंगाल की सड़कों पर मौत का तांडव

अगस्त १९४६ की वह सुबह बंगाल के इतिहास में ‘ब्लैक होल’ की तरह है। जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के आह्वान पर सुहरावर्दी की सरकार के संरक्षण में कोलकाता की सड़कों पर हिंदुओं का नरसंहार शुरू हुआ। इसे ‘द ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ कहा गया। हजारों निर्दोष हिंदुओं को काट दिया गया, माताओं-बहनों की अस्मत लूटी गई और संपत्तियों को राख कर दिया गया। पुलिस मूकदर्शक थी और सत्ता हत्यारों के साथ। ऐसा लग रहा था कि ८०० साल पुराना खिलजी का दौर फिर से लौट आया है और बंगाल पूरी तरह से ‘इस्लामी राज्य’ बनने की कगार पर है।

 

‘गोपाल पाठा’ का उदय: जब अहिंसा नहीं, शस्त्र ने रक्षा की

जब चारों ओर लाशों के ढेर थे और गांधीवादी अहिंसा का उपदेश बेअसर हो रहा था, तब एक रक्षक का उदय हुआ— गोपाल चंद्र मुखोपाध्याय, जिन्हें दुनिया ‘गोपाल पाठा‘ के नाम से जानती है। गोपाल पाठा ने कहा था, “अगर कोई राक्षस आपकी मां-बहन पर हाथ डाले, तो उसे अहिंसा का पाठ नहीं पढ़ाया जाता, उसे खत्म किया जाता है।” उन्होंने ‘भारतीय जातीय वाहिनी’ का गठन किया और बंगाल के युवाओं को संगठित किया।

 

प्रतिकार का वह प्रचंड रूप

गोपाल पाठा के नेतृत्व में हिंदू युवाओं ने वह जवाबी कार्रवाई की जिसकी कल्पना दंगाइयों ने नहीं की थी। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया: “अगर हमारा एक मारा जाएगा, तो उनके दस गिरेंगे।” ३-४ दिनों के भीतर ही पासा पलट गया। जो हत्यारे हिंदुओं को खत्म करने निकले थे, वे अब अपनी जान बचाकर भाग रहे थे। गोपाल पाठा के शौर्य ने न केवल कोलकाता के हिंदुओं को बचाया, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि कोलकाता भारत का हिस्सा बना रहे। यदि गोपाल पाठा न होते, तो आज कोलकाता का भूगोल कुछ और होता।

 

१९४७: आजादी मिली, लेकिन न्याय नहीं

भारत आजाद हुआ, बंगाल का विभाजन हुआ, लेकिन हिंदुओं के लिए यह ‘अधूरा सच’ था। पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) में रहने वाले करोड़ों हिंदू अपनी जड़ों से उखाड़ दिए गए। नोआखली के दंगों की आग और विभाजन की त्रासदी ने बंगाल को दो हिस्सों में बांट दिया। पश्चिम बंगाल भारत में तो रहा, लेकिन वहां की राजनीति ने धीरे-धीरे उस शौर्य को ‘सांप्रदायिक’ घोषित कर किनारे कर दिया। जिस गोपाल पाठा ने बंगाल को बचाया, उन्हें इतिहास की किताबों से मिटा दिया गया ताकि ‘तुष्टिकरण’ की नींव रखी जा सके।

 

एक भूला हुआ नायक और हमारी जिम्मेदारी

गोपाल पाठा केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस हिंदू चेतना के प्रतीक थे जो अन्याय के सामने झुकना नहीं जानती। उन्होंने गांधी जी के हथियार डालने के आग्रह को भी ठुकरा दिया था क्योंकि उनका मानना था कि आत्मरक्षा के लिए उठाए गए शस्त्र कभी गलत नहीं होते। आज जब हम ४ मई २०२६ के ‘हिन्दवी पुनर्जागरण’ की बात करते हैं, तो हमें गोपाल पाठा के उस शौर्य को याद करना होगा, क्योंकि उन्हीं की वजह से आज हमारे पास यह भूमि बची है।

 

निष्कर्ष

आजादी आई, लेकिन बंगाल के हिंदुओं के लिए वह शांति नहीं लाई। विभाजन का घाव आज भी हरा है। भाग ३ हमें याद दिलाता है कि सत्ता और संगठन के बिना केवल आदर्शवाद समाज की रक्षा नहीं कर सकता। अगले भाग में हम चर्चा करेंगे कि कैसे आजादी के बाद ‘लाल सलाम’ के नारों ने बंगाल की सांस्कृतिक जड़ों को खोखला किया और तुष्टिकरण की नई राजनीति को जन्म दिया।

 

 

लाल सलाम का सच: कैसे वामपंथ ने बंगाल के हिंदू गौरव को नष्ट किया।

 

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *