‘बंगाल डायरी’ श्रृंखला की दूसरी कड़ी प्रस्तुत है। यह आलेख उस संक्रमण काल पर केंद्रित है जहाँ बंगाल की सत्ता एक विदेशी शक्ति से दूसरी विदेशी शक्ति के हाथों में जाती रही, लेकिन स्थानीय हिंदू समाज के लिए दमन का चक्र स्थिर रहा।
बंगाल डायरी – भाग २: गुलामी के बदलते चेहरे — सल्तनत, मुग़ल और अंग्रेज
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण
सल्तनत काल: मजहबी कट्टरता और पहचान का संकट
बख्तियार खिलजी के बाद बंगाल ‘दिल्ली सल्तनत’ का एक अशांत सूबा बन गया। १२वीं से १५वीं शताब्दी के बीच, बंगाल ने इलियास शाही और हुसैन शाही राजवंशों का शासन देखा। इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि शासन का आधार ‘शरिया’ था। मंदिरों को तोड़कर उनके मलबे से मस्जिदों और दरगाहों का निर्माण (जैसे पंडुआ की अदीना मस्जिद) इसी काल की देन है। हिंदुओं के लिए यह अस्तित्व बचाने का संघर्ष था; या तो मतांतरण स्वीकार करें या ‘जज़िया’ देकर अपमानित जीवन जिएं। इसी कालखंड में चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आंदोलन ने बंगाल के हिंदुओं को वैचारिक और आध्यात्मिक संजीवनी प्रदान की, अन्यथा सांस्कृतिक विनाश पूर्ण हो चुका होता।
मुग़ल सत्ता: नवाबी ठाठ और हिंदुओं का दोहन
१६वीं शताब्दी में अकबर के सेनापति राजा मानसिंह ने बंगाल को मुग़ल साम्राज्य का हिस्सा बनाया। मुग़ल काल में बंगाल ‘साम्राज्य का स्वर्ग’ (Paradise of Nations) कहा जाता था, लेकिन यह स्वर्ग केवल शासकों के लिए था। बंगाल से भारी लगान वसूला जाता था जो दिल्ली के खजाने को भरता था। बाद के वर्षों में जब मुग़ल कमजोर हुए, तो ‘बंगाल के नवाबों’ (मुर्शिद कुली खान से सिराजुद्दौला तक) का उदय हुआ। नवाबी शासन में हिंदुओं को प्रशासनिक पदों पर तो रखा गया, लेकिन सामजिक और धार्मिक स्तर पर वे हमेशा ‘दोयम दर्जे’ के नागरिक ही रहे। कट्टरता का स्वरूप कभी नरम तो कभी अत्यंत क्रूर होता रहा।
१७५७ का मोड़: प्लासी के मैदान में नई बेड़ियाँ
सिराजुद्दौला और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच १७५७ में हुआ ‘प्लासी का युद्ध’ भारतीय इतिहास का वह मोड़ था जिसने गुलामी का चेहरा बदल दिया। नवाब की हार और अंग्रेजों की जीत ने बंगाल को एक नए प्रकार के शोषण के युग में धकेल दिया। अब दमन केवल मजहबी नहीं, बल्कि ‘आर्थिक और नस्लीय’ भी था। अंग्रेजों ने बंगाल की संपन्नता को दीमक की तरह चाटना शुरू किया। १८वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आए ‘महान बंगाल अकाल’ (Great Bengal Famine) ने करोड़ों हिंदुओं को मौत की नींद सुला दिया, जबकि ब्रिटिश गोदाम अनाज से भरे थे।
सांस्कृतिक प्रहार और औपनिवेशिक शिक्षा
अंग्रेजों ने तलवार के बजाय ‘कानून और शिक्षा’ को हथियार बनाया। मैकाले की शिक्षा नीति का उद्देश्य हिंदुओं को उनकी जड़ों से काटना था। सल्तनत और मुग़ल काल ने शरीर पर प्रहार किया था, तो अंग्रेजों ने ‘बौद्धिक गुलामी’ की नींव रखी। बंगाल के बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अपनी संस्कृति को ‘पिछड़ा’ और पश्चिम को ‘श्रेष्ठ’ मानने लगा। यह गुलामी का सबसे खतरनाक चेहरा था, जिसका प्रभाव आज भी कुछ राजनैतिक विचारधाराओं में दिखाई देता है।
साझा दमन की कहानी
चाहे खिलजी हो, औरंगजेब हो या लॉर्ड क्लाइव—इन तीनों के शासन में एक समानता थी: बंगाल के मूल हिंदू समाज की उपेक्षा और दमन। ८०० वर्षों के इस लंबे कालखंड में बंगाल की धन-संपदा लूटी गई, उसके गौरवशाली मंदिरों को अपवित्र किया गया और उसकी जनता को अपनी ही धरती पर पराया बना दिया गया। विदेशी आक्रांताओं ने केवल चेहरे बदले, लेकिन बंगाल के हिंदुओं की नियति में ‘संघर्ष’ ही बना रहा।
निष्कर्ष
सल्तनत की तलवार से शुरू हुई गुलामी, मुगलों के लगान और अंग्रेजों की कूटनीति तक जारी रही। यह वह दौर था जिसने बंगाल के हिंदू मानस को अंदर तक झकझोर दिया था। लेकिन इसी राख से आगे चलकर ‘क्रांति’ के बीज फूटने वाले थे। श्रृंखला के अगले भाग में हम उस ‘अधूरे सच’ की चर्चा करेंगे जो १९४७ की आजादी के साथ आया और वह शौर्य, जो गोपाल पाठा के रूप में प्रकट हुआ।
गोपाल पाठा का शौर्य: जब एक हिंदू वीर ने कोलकाता को ‘कब्रिस्तान’ बनने से बचाया।