‘बंगाल डायरी’ श्रृंखला का यह निर्णायक भाग है। यह आलेख उस ऐतिहासिक मोड़ को समर्पित है जहाँ ८०० वर्षों का संघर्ष एक नई नियति में परिवर्तित हुआ।
बंगाल डायरी – भाग ८: भारतीय जनता पार्टी — ४ मई २०२६: एक नया सूर्योदय
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण
वह ऐतिहासिक तिथि: ४ मई २०२६
इतिहास में कुछ तारीखें केवल कैलेंडर का हिस्सा होती हैं, लेकिन ४ मई २०२६ बंगाल के लिए एक ‘युगांतर’ सिद्ध हुई। यह केवल एक चुनाव परिणाम नहीं था, बल्कि ८२२ वर्षों की उस संचित पीड़ा का विस्फोट था जो १२०४ में महाराजा लक्ष्मण सेन की पराजय से शुरू हुई थी। जब ईवीएम के बक्से खुले, तो वे केवल वोट नहीं थे, वे सदियों के दमन, तुष्टिकरण और अन्याय के विरुद्ध हिंदू समाज का ‘जनादेश’ थे।
श्रीराम का आशीर्वाद और माँ काली का आह्वान
बंगाल की राजनीति में ‘जय श्री राम’ का उद्घोष एक वैचारिक क्रांति बनकर उभरा। जो नारा कभी सत्ता द्वारा प्रतिबंधित किया गया था, वही ४ मई को राजशक्ति का आधार बना। लोगों ने इसे केवल एक राजनैतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान की वापसी के रूप में देखा। माँ काली की भूमि पर श्रीराम का यह आगमन उस ‘अद्वैत’ का प्रतीक है जहाँ शक्ति और मर्यादा एक साथ मिलकर अधर्म का नाश करते हैं।
‘हिन्दवी’ सरकार: एक नई आशा का संचार
भाजपा के नेतृत्व में बनी इस हिंदू सरकार ने बंगाल को एक नया विजन दिया है। यह सरकार केवल सड़कों और पुलों की नहीं, बल्कि ‘सांस्कृतिक गौरव’ के पुनर्निर्माण की सरकार मानी जा रही है। घुसपैठ पर लगाम, संदेशखाली जैसे क्षेत्रों में न्याय की बहाली और हिंदू उत्सवों का ससम्मान आयोजन—इस नई ‘हिन्दवी’ शासन व्यवस्था की प्राथमिकताएं हैं। अब बंगाल का हिंदू अपनी ही भूमि पर ‘शरणार्थी’ या ‘दोयम दर्जे का नागरिक’ महसूस नहीं कर रहा है।
८०० वर्षों का वनवास समाप्त
खिलजी से शुरू हुआ जो अंधकार सल्तनत, मुग़ल, अंग्रेज, वामपंथ और फिर ममता के दौर तक चला, वह २०२६ की इस तपती दोपहर में समाप्त हुआ। यह जीत उन सभी बलिदानियों को श्रद्धांजलि है—चाहे वह गोपाल पाठा हों, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी हों, या वे अनगिनत कार्यकर्ता जिन्होंने इस विचार के लिए अपना रक्त बहाया। आज बंगाल की मिट्टी फिर से अपनी मूल सनातनी पहचान के साथ सांस ले रही है।
भविष्य की चुनौती: सहेज कर रखना होगा यह गौरव
यह जीत अंत नहीं, बल्कि एक कठिन यात्रा की शुरुआत है। ८०० वर्षों की जड़ता और दशकों के तुष्टिकरण ने जो घाव दिए हैं, उन्हें भरने में समय लगेगा। ‘हिन्दवी’ कितनी चलेगी और कितनी सफल होगी, यह इस पर निर्भर करेगा कि हम अपनी इस नई प्राप्त शक्ति का उपयोग बंगाल के सर्वांगीण और सांस्कृतिक उत्थान के लिए कैसे करते हैं। खुशी इस बात की है कि आज बंगाल के सिंहासन पर वह विचारधारा बैठी है जो ‘वंदे मातरम’ के उद्घोष को अपना प्राण मानती है।
निष्कर्ष
‘बंगाल डायरी’ की यह यात्रा १२०४ के अंधकार से शुरू होकर २०२६ के प्रकाश तक पहुँची है। माँ काली ने अपने पुत्रों को पुकारा और श्रीराम के आशीर्वाद से बंगाल ने अपनी खोई हुई आत्मा को पुनः प्राप्त किया। अब यह ‘सोनार बांग्ला’ केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और राजनैतिक रूप से भी विश्व का मार्गदर्शन करने के लिए तैयार है।
रत्ना देबनाथ की जीत: आरजी कर पीड़िता की माँ का न्याय के लिए महा-संग्राम।