श्रृंखला का सातवां भाग, जो उस जमीनी संघर्ष को समर्पित है जिसने बंगाल के हिंदुओं को आत्मरक्षा और एकजुटता का नया मंत्र दिया।
बंगाल डायरी – भाग ७: तपन घोष और हिंदू संहति — अस्तित्व की लड़ाई और हिंदुओं का एकीकरण
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय अरुण
वह नायक जिसने ‘प्रतिरोध’ को स्वर दिया
जब बंगाल की मुख्यधारा की राजनीति तुष्टिकरण के घुटनों पर थी और वामपंथ से लेकर तृणमूल तक सभी दल एक विशिष्ट वोट बैंक को साधने में जुटे थे, तब एक शांत लेकिन दृढ़ संकल्पित व्यक्तित्व का उदय हुआ— तपन घोष। उन्होंने भांप लिया था कि यदि बंगाल के हिंदू संगठित नहीं हुए, तो सुदूर गांवों और मुस्लिम बहुल इलाकों में रहने वाले हिंदुओं का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। उन्होंने किसी राजनीतिक पद की लालसा के बिना, केवल ‘हिंदू समाज’ के रक्षण को अपना जीवनोद्देश्य बनाया।
हिंदू संहति: गांवों से उठी एक गूँज
२००८ में तपन घोष ने ‘हिंदू संहति’ की स्थापना की। यह संगठन केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन संवेदनशील और सीमावर्ती इलाकों में पहुँचा जहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हो चुके थे। तपन दा ने सिखाया कि हिंदू समाज को अब केवल ‘सहिष्णु’ नहीं, बल्कि ‘सजग और सक्रिय’ होना होगा। हिंदू संहति ने उन हिंदू परिवारों को सुरक्षा की भावना दी, जिन्हें प्रशासन ने उनके हाल पर छोड़ दिया था।
मुस्लिम बहुल इलाकों में स्वाभिमान का जागरण
तपन घोष का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों (जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर २४ परगना) के हिंदुओं को एकजुट किया। उन्होंने लव-जिहाद और भूमि-कब्जे जैसे मुद्दों पर न केवल आवाज उठाई, बल्कि जमीनी स्तर पर प्रतिकार के लिए युवाओं को तैयार किया। उनके नेतृत्व में हिंदू समाज ने पहली बार महसूस किया कि यदि वे एकजुट हैं, तो सत्ता का संरक्षण न होने पर भी वे अपनी रक्षा कर सकते हैं।
राजनीति से परे, समाज के लिए समर्पण
तपन घोष ने कभी भी हिंदू हितों के साथ समझौता नहीं किया। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “हिंदू हितों की रक्षा करना कोई अपराध नहीं है।” जब राजनीतिक दल डरते थे, तब तपन दा निडर होकर पीड़ितों के बीच खड़े होते थे। उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि बंगाल के सुदूर अंचलों में ‘हिंदू’ शब्द एक गौरव और एकजुटता का प्रतीक बनने लगा। उन्होंने उन बाधाओं को तोड़ा जिन्हें वामपंथ ने जाति और वर्ग के नाम पर खड़ा किया था।
४ मई २०२६ की जीत की अदृश्य नींव
आज जब हम २०२६ में भाजपा की सरकार और ‘हिन्दवी’ के उदय को देख रहे हैं, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि इसकी वैचारिक और जमीनी नींव रखने वालों में तपन घोष अग्रणी थे। उन्होंने उस समय बीज बोए जब जमीन पथरीली थी और माहौल विपरीत था। उनका निधन (२०२०) हिंदू समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति था, लेकिन उनके द्वारा जलाई गई ज्योति आज पूरे बंगाल में मशाल बनकर जल रही है।
निष्कर्ष
तपन घोष ने बंगाल के हिंदू को ‘भय’ से मुक्त कर ‘स्वाभिमान’ की ओर अग्रसर किया। उनकी विरासत ही आज बंगाल के गांव-गांव में गूँज रहे ‘जय श्री राम’ के उद्घोष का आधार है। उन्होंने सिखाया कि संगठन में ही शक्ति है और शक्ति के बिना शांति संभव नहीं है। श्रृंखला के अगले और अंतिम भाग में हम उस ऐतिहासिक दिन की चर्चा करेंगे जिसने ८०० वर्षों की प्रतीक्षा को पूर्ण किया— ४ मई २०२६: एक नया सूर्योदय।