अयोध्या राम मंदिर अथवा बाबरी मस्जिद विवाद…यह एक जग जाहिर विवाद है जिसे ना तो कोई सरकार खत्म करना चाहती है और ना तो धार्मिक संगठन। कारण भी स्पष्ठ है, आखिर सबकी दुकान जो बंद हो जाएगी। मगर छोड़िए जाने दीजिए इस विषय को…हम यहां न्यायपालिका की बात करने वाले हैं और उनके न्याय पसंद न्यायाधीशों की, जब कभी अयोध्या विवाद की तारीख आती है तो माननीय न्यायाधीश या उनकी बेंच निर्णय देने के बजाय अपनी नाक अथवा जान बचाने हेतू अगली तारीख दे घर के किसी कोने में दुबक जाते हैं। उसी तरह कोई जमीन विवाद हो या कोई क्राइम का निर्णय देना हो बेचारे सिर्फ समय काट वेतन उठाना ज्यादा श्रेयस्कर समझते हैं। हो सकता है कितनों को मेरे इस बात से दुख भी पहुंचा हो तो कितने मेरी इस बात से सहमत भी नहीं होंगे,

तो दोस्तों हम अपनी बात को सही साबित करने के लिए एक हाई प्रोफाइल केस की बात करने वाले हैं जिससे शायद आप हमारी बात से सहमत भी हो जाएं। यह मुकदमा कोई मामूली मुकदमा नहीं था…

बात द्वितीय महायुद्ध के बाद की है, जब जापान द्वारा सुदूर पूर्व में किए गये युद्धापराधों के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मुकदमा चलाया गया था। मित्र राष्ट्र अर्थात अमरीका, ब्रिटेन, फ्रान्स आदि देश जापान को दण्ड देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने युद्ध की समाप्ति के बाद ‘क्लास ए वार क्राइम्स’ नामक एक नया कानून बनाया, जिसके अन्तर्गत आक्रमण करने वाले को मानवता तथा शान्ति के विरुद्ध अपराधी माना गया था।

इसके आधार पर जापान के तत्कालीन प्रधानमन्त्री हिदेकी तोजो तथा दो दर्जन अन्य नेता व सैनिक अधिकारियों को युद्ध अपराधी बनाकर कटघरे में खड़ा कर दिया गया। ११ विजेता देशों द्वारा १९४६ में निर्मित इस अन्तरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण (इण्टरनेशनल मिलट्री ट्रिब्यूनल फार दि ईस्ट) में दस न्यायाधीशों ने तोजो को मृत्युदण्ड दिया मगर एक न्यायाधीश ऐसा भी था जिसने न केवल इसका विरोध किया, बल्कि इस न्यायाधिकरण को ही अवैध बताया। इसलिए जापान में आज भी उन्हें एक महान व्यक्ति की तरह सम्मान दिया जाता है। यह सम्मानीय व्यक्ति कोई और नहीं हमारे अपने…

श्री राधाविनोद पाल जी हैं।

इनका जन्म २७ जनवरी १८८६ को हुआ था। कोलकाता के प्रेसिडेन्सी कॉलेज तथा कोलकाता विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा पूर्ण कर वे इसी विश्वविद्यालय में १९२३ से १९३६ तक अध्यापक रहे। १९४१ में उन्हें कोलकाता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

यद्यपि उन्होंने अन्तरराष्ट्रीय कानून का औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया था, फिर भी द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब जापान के विरुद्ध ‘टोक्यो ट्रायल्स’ नामक मुकदमा शुरू किया गया, तो उन्हें इसमें न्यायाधीश बनाया गया। डॉ॰ पाल ने अपने निर्णय में लिखा कि किसी घटना के घटित होने के बाद उसके बारे में कानून बनाना नितान्त अनुचित है। उन्होंने युद्धबंदियों पर मुकदमा चलाने को विजेता की जबरजस्ती बताते हुए सभी युद्धबंदियों को छोड़ने का फैसला दिया था। उनके इस निर्णय की सभी ने सराहना की।

यहां विचारणीय यह है की जहां विश्व की सारी शक्तियां जापान के विरुद्ध थीं और जहां ११ न्यायधीशों में १० के फैसले मित्र राष्ट्रों के पक्ष में हों तो वहां किसी एक का….? ? ? आप स्वयं विचारे !

जापान के यशुकुनी देवालय तथा क्योतो के र्योजेन गोकोकु देवालय में न्यायमूर्ति राधाबिनोद के लिए विशेष स्मारक निर्मित किए गये हैं।

जापान के सर्वोच्च धर्मपुरोहित नानबू तोशियाकी ने डॉ॰ राधाविनोद की प्रशस्ति में लिखा है, “हम यहाँ डॉ॰ पाल के जोश और साहस का सम्मान करते हैं, जिन्होंने वैधानिक व्यवस्था और ऐतिहासिक औचित्य की रक्षा की। हम इस स्मारक में उनके महान कृत्यों को अंकित करते हैं, जिससे उनके सत्कार्यों को सदा के लिए जापान की जनता के लिए धरोहर बना सकें।आज जब मित्र राष्ट्रों की बदला लेने की तीव्र लालसा और ऐतिहासिक पूर्वाग्रह ठण्डे हो रहे हैं, सभ्य संसार में डॉ॰ राधाविनोद पाल के निर्णय को सामान्य रूप से अन्तरराष्ट्रीय कानून का आधार मान लिया गया है”।

आज २७ जनवरी को इस महान न्याय रक्षक श्री राधाबिनोद पाल जी के जन्मदिवस पर अश्विनी राय ‘अरुण’ स्वयं अपने आप पर गर्व करता की वह उस माटी पर जन्म लिया जिस पर डॉ पाल जैसे महापुरुष ने जन्म लिया था और वह उन्हें कोटि कोटि नमन करता है।

धन्यवाद !

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