कला और सनातन चेतना के बेबाक साधक: वेद राही और कश्मीरी अस्मिता का सिनेमा
”जब भारतीय सिनेमा और टीवी जगत अपनी पहचान ढूँढ़ रहा था, तब कश्मीर की वादियों से उठी एक आवाज़ ने डोगरी, उर्दू और हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। यह दास्तान है ‘गुल गुलशन गुलफाम’ के सर्जक और ‘वीर सावरकर’ जैसी कालजयी फिल्म के निर्देशक वेद राही जी की।”
भारतीय साहित्य और सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसे विरले रचनाकार हुए हैं, जिन्होंने कभी भी बाज़ार की माँग के आगे अपने सिद्धांतों का सौदा नहीं किया। ऐसे ही एक प्रखर साहित्यकार, कहानीकार और फिल्म निर्देशक हैं—वेद राही जी। उनका जन्म २२ मई १९३३ को जम्मू-कश्मीर में हुआ था। उनके पिता लाला मुल्कराज सराफ एक प्रख्यात पत्रकार थे, जो जम्मू से “रणबीर” नाम का ऐतिहासिक समाचार-पत्र निकालते थे। राही जी को बचपन से ही लेखन का संस्कार अपने घर से मिला। उन्होंने अपनी साहित्यिक यात्रा उर्दू से शुरू की और आगे चलकर हिंदी और डोगरी भाषा में भी कालजयी साहित्यों की रचना की।
’गुल गुलशन गुलफाम’: दूरदर्शन का वह ऐतिहासिक मील का पत्थर
शायद आज की पीढ़ी को याद हो या न हो, लेकिन साल १९९१ में दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ धारावाहिक “गुल गुलशन गुलफाम” भारतीय टेलीविजन के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। वेद राही द्वारा निर्देशित यह धारावाहिक कश्मीर की पृष्ठभूमि, वहाँ के हाउसबोट (शिकारे) की जिंदगी और एक पारंपरिक कश्मीरी परिवार को चित्रित करने वाला पहला प्रामाणिक धारावाहिक था।
यह धारावाहिक अपनी सादगी और संवेदनशीलता के कारण रातों-रात एक जन-आंदोलन बन गया और ४५ एपिसोड तक चला। कश्मीर के वास्तविक दर्द और उसकी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने वाले इस धारावाहिक की लोकप्रियता को देखते हुए साल २००२ में इसका ‘सहारा टीवी’ पर पुनः प्रसारण भी किया गया था।
साहित्यिक अवदान और बॉलीवुड में रामानंद सागर का साथ
वेद राही जी का साहित्यिक फलक अत्यंत विस्तृत है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में मिट्टी की सोंधी महक और समाज का यथार्थ झलकता है।
प्रमुख कहानियाँ: काले हत्थे, आले, क्रॉस फायरिंग आदि।
प्रमुख उपन्यास: झाड़ू बेदी ते पत्तन, परेड, टूटी हुई डोर, गर्म जून आदि।
साहित्य की इस उर्वर जमीन से निकलकर उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा। महान फिल्मकार रामानंद सागर जी के साथ जुड़कर उन्होंने लगभग २५ हिंदी फिल्मों के लिए कालजयी कहानियाँ, संवाद (डायलॉग) और स्क्रीनप्ले लिखे। उनके द्वारा लिखित कुछ सबसे मशहूर फिल्मों में शामिल हैं:
’पवित्र पापी’, ‘यह रात फिर न आएगी’, ‘पराया धन’, ‘आप आये बहार आई’, ‘मोम की गुड़िया’, ‘बे-ईमान’, ‘संन्यासी’, ‘चरस’ और ‘बेज़ुबान’।
इसके अलावा, उन्होंने ९ फिल्मों और धारावाहिकों का कुशल निर्देशन भी किया, जिनमें ‘एहसास’, ‘रिश्ते’, ‘ज़िन्दगी’, ‘गुल गुलशन गुलफाम’, ‘नादानियाँ’, ‘प्रेम पर्वत’ और ‘दरार’ प्रमुख हैं। उन्होंने ‘काली घटा’ नामक एक बेहतरीन फिल्म का निर्माण भी किया।
’वीर सावरकर’ फिल्म: क्रांतिकारी इतिहास का साक्षात प्रकटीकरण
वेद राही जी के जीवन का सबसे बड़ा और साहसिक सिनेमाई योगदान था—”वीर सावरकर” फिल्म का निर्माण और निर्देशन। स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर क्रांतिकारी विनायक दामोदर सावरकर के जीवन पर आधारित इस प्रामाणिक फिल्म को बनाकर उन्होंने दुनिया के सामने पहली बार इस महान विभूति के वास्तविक त्याग, सेल्युलर जेल (काला पानी) की यातनाओं और राष्ट्रभक्ति के सच्चे स्वरूप से परिचय कराया। इस फिल्म के माध्यम से उन्होंने इतिहास के उन पन्नों को परदे पर उतारा, जिन्हें मुख्यधारा के इतिहासकारों ने दबा दिया था।
वैचारिक बेबाकी और सरकारी तंत्र की उपेक्षा
यहां आकर इतिहास और कला का वह कड़वा सच सामने आता है जिसे आपने रेखांकित किया है। वेद राही जी का जीवन और उनका लेखन हमेशा अत्यंत बेबाक और स्पष्ट रहा। उनकी सनातनी विचारधारा, राष्ट्रवादी सोच और साम्प्रदायिक (कम्यूनल) तुष्टीकरण की राजनीति पर करारी चोट करने की आदत के कारण उन्हें वह मुकाम और सम्मान हासिल नहीं हो सका, जिसके वे वास्तविक हकदार थे।
तत्कालीन सरकारी तंत्र और कतिपय वैचारिक खेमों को उनकी यह राष्ट्रवादी सोच कभी रास नहीं आई। बॉलीवुड का एक बड़ा हिस्सा भी उनसे दूरी बनाने लगा था, क्योंकि एक सनातनी विचारधारा और क्रांतिकारी चेतना से ओत-प्रोत व्यक्ति को हाशिए पर धकेलकर ही उस दौर में एक खास किस्म की नई और विषैली वैचारिक पौध उगाई जा सकती थी। लेकिन राही जी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे।
निष्कर्ष: एक अदम्य मनीषी को नमन
सरकारों के संरक्षण और पुरस्कारों की चकाचौंध से दूर, वेद राही जी ने अपनी लेखनी और कैमरे को हमेशा राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना के प्रति समर्पित रखा। आज जब हम उनके अवदानों को देखते हैं, तो उनका कद बहुत ऊँचा नज़र आता है। लेखक विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ कला, साहित्य और सनातन चेतना के इस अदम्य मनीषी और राष्ट्रभक्त रचनाकार के दीर्घायु जीवन की कामना करते हुए उनके चरणों में सादर नमन निवेदित करता है।
धन्यवाद!
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