हरा भारत, हरा गाँव: वैश्विक वनीकरण की दौड़ में हमारी वास्तविक स्थिति
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
दिनांक: ३० अक्टूबर, २०१९
संदर्भ सौजन्य: नासा (NASA), बी.बी.सी, सी.एन.एन, इंडिया टुडे, नवोदय टाइम्स, राष्ट्रीय सहारा एवं अमर उजाला।
एक यक्ष प्रश्न: पर्यावरण के प्रति कौन है सबसे सजग?
आज हम आपके सामने एक ऐसी जमीनी हकीकत और वैज्ञानिक रिपोर्ट साझा करने जा रहे हैं, जिसे पढ़कर शायद आप थोड़ी हैरत में पड़ जाएं, और थोड़ी चिंता में भी। क्या कभी शांत मन से सोचते हुए आपके दिमाग में यह यक्ष प्रश्न उठा है कि आखिर इस विशालकाय दुनिया में ऐसा कौन सा मुल्क है, जो पर्यावरण और प्रकृति के प्रति सबसे ज्यादा सजग और गंभीर है?
यदि आपके मन में अब तक यह सवाल नहीं उठा है, तो एक सजग नागरिक और इस धरती के कर्जदार होने के नाते यह सवाल आपके मन में जरूर उठना चाहिए। और अगर यह सवाल आपके दिल में है, तो आज हम आपको नासा के वैज्ञानिक आंकड़ों की तसल्ली के साथ इसका मुकम्मल उत्तर देंगे।
विरोधाभास: रिकॉर्ड वनीकरण बनाम बढ़ता प्रदूषण
नासा के उपग्रहों से प्राप्त वैश्विक आंकड़ों का गहन अध्ययन करें, तो एक सुखद और हैरान करने वाला सच सामने आता है—दरअसल, पूरी दुनिया में पेड़ लगाने और हरियाली बढ़ाने के मामले में हमारा प्यारा भारत और पड़ोसी देश चीन सबसे आगे खड़े हैं।
अब इस मोड़ पर आकर आपके मन में एक स्वाभाविक अंतद्वंद्व और विचार कौंधेगा कि—”अश्विनी भाई, जब भारत पेड़ लगाने के मामले में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है, अग्रणी भूमिका में है, तो फिर हमारे शहरों और गाँवों में प्रदूषण का ग्राफ घटने के बजाय दिन-ब-दिन बढ़ क्यों रहा है?”
इस विरोधाभास का जवाब भी बहुत सीधा और कड़वा है। बात बस इतनी सी है कि हमारा संकल्प तो नेक है, हम पेड़ लगा भी रहे हैं, लेकिन जिस तीव्र गति और मात्रा में भारत में नए पौधे रोपे जा रहे हैं, उससे लगभग दुगनी रफ्तार से विकास, शहरीकरण और औद्योगिक अंधी दौड़ में पुराने, घने पेड़ काटे जा रहे हैं। जब तक ‘रोपण’ और ‘कटान’ का यह संतुलन सकारात्मक नहीं होगा, तब तक प्रदूषण के इस दैत्य को काबू में कर पाना नामुमकिन है।
नासा (NASA) के उपग्रह आंकड़े क्या कहते हैं?
नासा के उपग्रह द्वारा वर्षों तक जुटाए गए डेटा से इस पूरे सच पर से पर्दा उठा है। इस विशेष वैज्ञानिक अध्ययन के मुख्य लेखक ‘ची चेन’ के मुताबिक:
”पूरी दुनिया के कुल पेड़-पौधों और नई हरियाली का एक-तिहाई (1/3) हिस्सा अकेले चीन और भारत के पास है। लेकिन विरोधाभास देखिए कि इस पूरे ग्रह (पृथ्वी) की कुल वन आच्छादित भूमि (Forest Land) का मात्र नौ प्रतिशत क्षेत्र ही इन दोनों देशों के हिस्से में आता है।”
ची चेन ने आगे एक बहुत ही गंभीर बात कही है, जो हम सबको सोचने पर मजबूर करती है। उन्होंने कहा कि अत्यधिक आबादी वाले इन विकासशील देशों में संसाधनों के अत्यधिक दोहन और जनसंख्या के दबाव के कारण भू-क्षरण (Soil Erosion) और वनों का नष्ट होना एक आम समस्या रही है। ऐसे संकटपूर्ण माहौल के बीच भी इन दोनों देशों का वैश्विक हरियाली में अग्रणी आना वाकई दुनिया को हैरान करने वाला तथ्य है। इस वैज्ञानिक शोध में स्पष्ट किया गया है कि सन २००० से २०१७ के बीच के उपग्रह आंकड़ों को देखें, तो धरती पर पेड़-पौधे लगाने की जो महा-प्रक्रिया शुरू हुई, उसका केंद्र मुख्य रूप से भारत और चीन ही रहे हैं।
चीन बनाम भारत: वनों और कृषि भूमि का गणित
इस अध्ययन में दोनों देशों के आंतरिक भूगोल और प्राथमिकताओं का एक बड़ा अंतर भी साफ-साफ दिखाई देता है, जिसे हमें गंभीरता से समझना होगा:
चीन का वनीकरण मॉडल: वैश्विक स्तर पर पेड़-पौधों से ढके क्षेत्र में जो कुल बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है, उसमें अकेले २५ प्रतिशत का योगदान चीन का है; जबकि चीन वैश्विक वनीकरण क्षेत्र का मात्र ६.६ प्रतिशत ही है। चीन में भूमि का ४२ प्रतिशत हिस्सा विशुद्ध वन क्षेत्र है और ३२ प्रतिशत हिस्सा कृषि भूमि के अंतर्गत आता है। वहाँ की सरकारें वायु प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ कई बेहद महत्वाकांक्षी और कड़े कार्यक्रम धरातल पर चला रही हैं।
भारत की कृषि प्रधानता: इसके उलट, यदि हम अपने देश भारत की स्थिति देखें, तो भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और हमारी ८२ प्रतिशत भूमि कृषि योग्य भूमि है। कृषि प्रधान होने के कारण हमारे पास वनों के लिए भूमि कम बचती है, और हमारा वास्तविक सघन वन क्षेत्र केवल ४.४ प्रतिशत के आसपास ही सिमटा हुआ है। यही कारण है कि पेड़ लगाने के बाद भी हमारे यहाँ वनों का वह विशाल साम्राज्य खड़ा नहीं हो पा रहा है, जो प्रदूषण सोख सके।
अन्न की आत्मनिर्भरता और चेतना का उदय
इस वैज्ञानिक सिक्के का एक और उजला पहलू भी है। सन २००० के बाद से भारत और चीन, दोनों ही देशों ने अपनी विशाल आबादी का पेट भरने के लिए खाद्य उत्पादन (Food Production) में ३५ प्रतिशत से अधिक की शानदार बढ़ोत्तरी दर्ज की है। यह कृषि और वनीकरण के बेहतरीन सह-अस्तित्व का उदाहरण है।
इस अध्ययन की सह-लेखिका ‘रमा नेमानी’ ने एक बहुत ही सुंदर और दार्शनिक बात कही है, जो मानव स्वभाव को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि—“जब इंसानों को किसी बड़ी समस्या का गहरा एहसास हो जाता है, तो वे स्वतः ही उसे दूर करने की कोशिशों में जुट जाते हैं।”
यदि हम अतीत की कड़ियों को जोड़ें, तो भारत और चीन में १९७० और १९८० के दशकों में पर्यावरण और पेड़-पौधों के संबंध में स्थिति बिल्कुल सही नहीं थी। अंधाधुंध कटाई और लापरवाही चरम पर थी। लेकिन १९९० के दशक में आते-आते जनमानस और सरकारों को इस भयानक भूल का एहसास हुआ। इसी आत्मबोध का परिणाम है कि आज नए सहस्राब्दी में चीजें बदल रही हैं, सुधार साफ दिख रहा है और हमारी धरती फिर से हरी-भरी होने की राह पर चल पड़ी है।
चलो, मिलकर एक संकल्प लें—”हरा भारत, हरा गाँव” केवल एक नारा न रहे, बल्कि हमारे जीवन का मूल कर्म बन जाए!
धन्यवाद!