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पौराणिक कथाओं से हरियाली की ओर… देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह का पावन महात्म्य

 

​”जागे हैं सृष्टि के पालनहार, गूँज रहा मंगल उल्लास,

शालिग्राम संग ब्याहने चलीं, हरिवल्लभा तुलसी खास।”

 

चार मास की निद्रा और देव जागरण का मंगल बेला

​सनातन संस्कृति में ऋतुओं के बदलने के साथ ही चेतना का भी जागरण होता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का सूर्योदय अपने साथ एक अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा लेकर आता है। इस पावन तिथि को हम ‘देवउठनी’ या ‘देवोत्थान एकादशी’ के नाम से जानते हैं। मान्यताओं के अनुसार, इस पवित्र दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार मास की अपनी योगनिद्रा के बाद जागते हैं।

​कहते हैं कि जब चराचर जगत के स्वामी नारायण अपनी आँखें खोलते हैं, तो उनकी दृष्टि सबसे पहले सृष्टि के कल्याण पर पड़ती है। और यह भी एक अद्भुत सत्य है कि भगवान विष्णु को तुलसी दल बेहद प्रिय हैं। नारायण जब जागते हैं, तो ब्रह्मांड में गूँजने वाली सबसे पहली प्रार्थना वे अपनी प्रिय हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं। इसीलिए, इस दिन को देव जागरण का सबसे पवित्र मुहूर्त माना गया है।

 

शालिग्राम और तुलसी: एक अलौकिक विवाह उत्सव

​इस देव जागरण की वेला का सबसे सुंदर और मांगलिक पक्ष है—तुलसी विवाह। कार्तिक शुक्ल पक्ष की इस शुभ एकादशी को साक्षात् भगवान शालिग्राम के साथ माता तुलसी का विवाह उत्सव पूरे देश में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

​यह केवल एक प्रतीकात्मक पूजा नहीं है, बल्कि इसके भीतर सामाजिक और पारिवारिक संवेदनाओं का एक गहरा सागर छिपा है। हमारे समाज में जिन दंपत्तियों के घर बेटियाँ नहीं हैं, वे इस दिन संपूर्ण विधि-विधान से तुलसी जी का विवाह रचाकर ‘कन्यादान’ का महापुण्य प्राप्त करते हैं। यह आयोजन ठीक वैसा ही भव्य और आत्मीय होता है, जैसे हिंदू रीति-रिवाज से किसी सामान्य वर-वधु का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न किया जाता है। मंडप सजते हैं, मंगल गीत गाए जाते हैं, और हरियाली की ओट से अध्यात्म का अनूठा रस बरसने लगता है।

 

पौराणिक कथा से प्रकृति (हरियाली) का संदेश

​”पौराणिक कथाओं से हरियाली की ओर…”—लेखक का यह दृष्टिकोण आज के युग में बेहद प्रासंगिक है। तुलसी विवाह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के संरक्षण, वनस्पतियों के प्रति कृतज्ञता और हरियाली को अपने जीवन में शीर्ष स्थान देने का एक सांस्कृतिक संकल्प है। तुलसी का हर घर के आँगन में होना, हमारे स्वास्थ्य, पर्यावरण और आत्मिक शुद्धि का प्रतीक है। जब देव जागते हैं, तो वे प्रकृति के इसी वैभव के साथ संसार का संचालन पुनः अपने हाथों में लेते हैं।

​बोलिए लक्ष्मी-नारायण भगवान की जय! माता तुलसी की जय!

 

 

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