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​५ अगस्त २०१९ का ऐतिहासिक विमर्श: अनुच्छेद ३७० का तकनीकी सच और जम्मू-कश्मीर का नया स्वरूप

 

​भारतीय राजनैतिक और संवैधानिक इतिहास में ५ अगस्त २०१९ की तिथि एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है। इसी दिन राज्यसभा में एक ऐतिहासिक विधेयक (जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक, २०१९) १२५ के मुकाबले ६५ मतों के भारी बहुमत से पारित हुआ (अगले दिन यह लोकसभा से भी पारित हुआ)। इस विधेयक और राष्ट्रपति के आदेश के बाद संपूर्ण राष्ट्र में ‘एक देश, एक संविधान और एक कानून’ की संकल्पना के साथ पूर्ण प्रशासनिक एकरूपता लागू हो गई।

​इस ऐतिहासिक बदलाव के बाद जम्मू-कश्मीर के राजनैतिक, भौगोलिक और प्रशासनिक स्वरूप में जो महत्वपूर्ण परिवर्तन आए, वे इस प्रकार हैं:

 

​पुनर्गठन और प्रशासनिक संरचना में बड़े बदलाव

​केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा (विधानसभा सहित): जम्मू-कश्मीर अब पूर्ण राज्य न रहकर एक केंद्रशासित प्रदेश (Union Territory) बन गया है। यहाँ दिल्ली और पुडुचेरी (पांडिचेरी) की तर्ज पर विधानसभा कायम रहेगी, परंतु शासन की कमान उप राज्यपाल (Lieutenant Governor) के हाथों में होगी।

​सुरक्षा और पुलिस व्यवस्था: कानून-व्यवस्था और पुलिस बल को पूरी तरह से केंद्र सरकार (गृह मंत्रालय) के अधीन कर दिया गया है।

​भूमि और नागरिकता के अधिकार: पूर्व में लागू अनुच्छेद ३५ए (Article 35A) के समाप्त होने के बाद, अब भारत का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में भूमि (ज़मीन) खरीद सकता है, वहाँ व्यापार कर सकता है और स्थायी रूप से बस सकता है।

​विशेषाधिकारों की समाप्ति: कश्मीर के स्थानीय नेताओं और नागरिकों को मिलने वाले तमाम तरह के विशिष्ट राजनैतिक और प्रशासनिक विशेषाधिकार पूरी तरह समाप्त कर दिए गए।

​लद्दाख का नया स्वरूप: लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग करके एक पृथक केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया है। परंतु, चंडीगढ़ या लक्षद्वीप की तरह लद्दाख में विधानसभा (असेम्ब्ली) नहीं होगी। वहाँ का प्रशासन सीधे लेफ्टिनेंट गवर्नर (उप राज्यपाल) के माध्यम से केंद्र द्वारा संचालित होगा।

​भौगोलिक और राजनैतिक पुनर्गठन: ब्रिटिश काल से चले आ रहे जम्मू-कश्मीर राज्य का नए सिरे से भौगोलिक और राजनैतिक मानचित्र तैयार किया गया, जिससे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयाँ बन गए।

​एक संविधान: जम्मू-कश्मीर का अपना कोई अलग संविधान नहीं होगा। अब वहाँ भी ‘भारत का संविधान’ ही सर्वोच्च और एकमात्र कानून है।

​एक राष्ट्रीय ध्वज: कश्मीर का अलग झंडा अब इतिहास की बात हो चुका है। अब वहाँ केवल और केवल भारत का गौरवशाली ‘तिरंगा’ ही फहराया जाता है।

​विधानसभा के कार्यकाल में परिवर्तन: पूर्ववर्ती व्यवस्था में जम्मू-कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल ६ वर्ष का होता था, जिसे अब संशोधित कर पूरे देश की तरह ५ वर्ष कर दिया गया है।

 

​क्या अनुच्छेद ३७० पूरी तरह समाप्त हो गया? एक विधिक भ्रांति

जनमानस में यह आम धारणा है कि अनुच्छेद ३७० को संविधान से पूरी तरह ‘हटा’ या ‘मिटा’ दिया गया है। कानूनी और तकनीकी दृष्टि से यह एक भ्रांति है। अनुच्छेद ३७० को समाप्त नहीं किया गया, बल्कि राष्ट्रपति के विशेष संवैधानिक आदेश (Constitutional Order 272) के द्वारा इसके प्रावधानों को ‘बदल’ और ‘निष्प्रभावी’ कर दिया गया है।

​संवैधानिक स्थिति के अनुसार:

​क्या हटाया गया?: अनुच्छेद ३७० खंड (२) और खंड (३) के उन प्रावधानों को निष्प्रभावी किया गया जो कश्मीर को अलग दर्जा, अलग झंडा और अलग कानून बनाने की छूट देते थे।

​क्या बचा रह गया?: अनुच्छेद ३७० का खंड (१) अर्थात ३७०(१) आज भी भारतीय संविधान का हिस्सा है।

 

​अनुच्छेद ३७०(१) को क्यों नहीं हटाया गया? कानूनी मर्म

​यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा कानूनी और कूटनीतिक बिंदु है। कानूनविदों और संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, अनुच्छेद ३७०(१) को जानबूझकर सुरक्षित रखा गया क्योंकि यही वह मूल संवैधानिक पुल (Bridge) है जिसके माध्यम से जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बना हुआ है।

​यदि ३७०(१) को पूरी तरह निरस्त कर दिया जाता, तो महाराजा हरि सिंह द्वारा हस्ताक्षरित ‘विलय पत्र’ (Instrument of Accession) और भारत संघ के बीच का वह तकनीकी व विधिक संबंध ही दांव पर लग जाता जिसके तहत कश्मीर भारत में शामिल हुआ था।

​राष्ट्रपति शासन का विधिक लाभ

​अनुच्छेद ३७०(१) केंद्र सरकार को यह शक्ति देता है कि देश के राष्ट्रपति एक आदेश जारी करके भारतीय संविधान की विभिन्न धाराओं और कानूनों को जम्मू-कश्मीर पर लागू कर सकते हैं, परंतु इसके लिए उन्हें ‘जम्मू-कश्मीर की सरकार की सलाह’ की आवश्यकता होती थी।

​चूँकि अगस्त २०१९ में जम्मू-कश्मीर में कोई चुनी हुई सरकार नहीं थी और वहाँ राष्ट्रपति शासन लागू था, इसलिए विधिक रूप से ‘जम्मू-कश्मीर की सरकार’ का अर्थ वहाँ के राज्यपाल (जो केंद्र के प्रतिनिधि होते हैं) से था। इस प्रकार, केंद्र सरकार ने राज्यपाल की सहमति को ही राज्य की सहमति मानकर राष्ट्रपति के माध्यम से ऐतिहासिक आदेश जारी करवाया और ३७० के सभी दंत-नख तोड़ दिए।

 

निष्कर्ष

​५ अगस्त २०१९ का यह निर्णय भारतीय संसद की इच्छाशक्ति और कूटनीतिक मेधा का एक बेजोड़ उदाहरण है। इसने बिना किसी अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवाद में उलझे, भारतीय संविधान के ही दायरे में रहकर, कश्मीर को पूरी तरह मुख्यधारा में शामिल कर लिया। आज कश्मीर विकास, पर्यटन और शांति के एक नए मार्ग पर अग्रसर है, जहाँ अतीत की कड़वाहट के स्थान पर नव-भारत का संकल्प दिखाई देता है।

 

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