ऑपरेशन पोलो: अखंड भारत का उदय, रजाकारों का अंत और हैदराबाद विलय का पूर्ण इतिहास
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
भूमिका: खंडित भारत का संकट और लौह पुरुष का संकल्प
भारत का हर एक नागरिक—चाहे वह बच्चा हो या बड़ा, स्त्री हो या पुरुष—१५ अगस्त, १९४७ के उस ऐतिहासिक दिन से भली-भांति परिचित है। उस दिन जहाँ एक ओर देशवासियों में सदियों की गुलामी से मिली आज़ादी की बेपनाह खुशी थी, तो वहीं दूसरी ओर विभाजन का एक बेइंतहा दर्द भी था। यह दर्द तब और भी बढ़ गया, जब स्वतंत्र होने के बाद भी भारत को यह पता चला कि वह एक संगठित राष्ट्र के बजाय स्वतंत्र रियासतों के खंडों में बंटा हुआ है।
वास्तव में, यह एक गहरे षड्यंत्र के तहत जान-बूझकर अंतिम ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लुई माउंटबेटन का किया-धरा था। इस कुटिल नीति का उद्देश्य यही था कि आज़ाद हुए सारे भूखंड आपस में बिखरे रहें, उनकी आपसी सीमा विवाद वर्षों तक चलती रहे और वे एक राष्ट्र के रूप में मजबूती से कभी भी खड़े न हो सकें—जैसा कि आज भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश की भौगोलिक विसंगतियों में दिखाई देता है। परंतु अंग्रेज आक्रांताओं को यह कहाँ पता था कि माँ भारती की कोख से एक ‘सरदार’ जन्मा है। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने लगभग ५६५ देशी रियासतों को एक दिन भारत संघ में मिलाकर संपूर्ण देश को एक सूत्र में बांध दिया और राष्ट्र को यह मौजूदा स्वरूप प्रदान किया। इसीलिए, कृतज्ञ राष्ट्र अपने इस कुशल प्रशासक को आज भी ’लौह पुरुष‘ के रूप में श्रद्धापूर्वक याद करता है।
देशी रियासतों का विलय: एक दुर्गम चुनौती
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश के भीतर तकरीबन ५६५ देशी रियासतें (प्रिंसली स्टेट्स) विद्यमान थीं, जो ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य के आंतरिक संरक्षण में थीं। उस समय सरदार पटेल अंतरिम सरकार में उपप्रधानमंत्री के साथ-साथ देश के गृहमंत्री का उत्तरदायित्व संभाल रहे थे।
माउंटबेटन ने भारत की आज़ादी को लेकर जवाहरलाल नेहरू के सामने जो प्रस्ताव रखा था, उसमें यह प्रावधान था कि ये रजवाड़े अपनी इच्छानुसार भारत या पाकिस्तान में से किसी एक में विलय चुन सकते हैं, और यदि वे चाहें तो दोनों महासंघों से अलग रहकर स्वयं को पूर्ण स्वतंत्र भी रख सकते हैं। सरदार वल्लभ भाई पटेल तथा कुशल कूटनीतिज्ञ वी.पी. मेनन के अथक प्रयासों से भारत के हिस्से में आए ५६२ रजवाड़ों ने स्वेच्छा से एक-एक करके विलय पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके बाद केवल चार मुख्य रियासतें शेष रह गईं—हैदराबाद, जूनागढ़, कश्मीर और भोपाल।
जूनागढ़, कश्मीर तथा हैदराबाद—इन तीनों राज्यों को अंततः सैन्य शक्ति और परिस्थितियों के दबाव से भारत संघ में मिलाया गया। किंतु भोपाल के विलय में सेना की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि पटेल और वी.पी. मेनन को यह भली-भांति पता था कि भौगोलिक विवशताओं के कारण भोपाल को अंततः भारत में मिलना ही होगा। अतः भोपाल का विलय भी हुआ, किंतु सबसे अंत में।
हैदराबाद की भौगोलिक स्थिति और निजाम की कुटिलता
हैदराबाद उस समय भारत की सभी रियासतों में सबसे बड़ी, समृद्धशाली और शक्तिशाली रियासत थी, जो दक्कन के पठार के एक बहुत बड़े भाग तक फैली हुई थी। इस रियासत की विडंबना यह थी कि इसकी अधिसंख्यक जनसंख्या (लगभग ८५ प्रतिशत) हिंदू थी, परंतु इस पर एक मुस्लिम शासक निजाम मीर उस्मान अली का शासन था।
निजाम ने भारत संघ में शामिल होने से साफ मना कर दिया और एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य की मांग की। निजाम के इस दुस्साहस के पीछे पाकिस्तान के मोहम्मद अली जिन्ना का पूर्ण आश्वासन था कि आवश्यकता पड़ने पर पाकिस्तान सैन्य रूप से हैदराबाद के साथ खड़ा रहेगा। इस आश्वासन के बल पर निजाम लगातार यूरोप से अवैध हथियारों का आयात कर रहा था। इस प्रकार भारत और सरदार पटेल की उलझनें लगातार बढ़ती जा रही थीं। पटेल ने कई बार मध्यस्थों के माध्यम से शांति प्रस्ताव भेजे और कई बार निजाम को कूटनीतिक चेतावनियां भी दीं, मगर वे सफल न हो सके।
हैदराबाद राज्य का संक्षिप्त इतिहास और सामाजिक ताना-बाना
यदि आज़ादी के उपरांत सरदार पटेल दृढ़ता के साथ सैन्य कार्रवाई शुरू न करते, तो आज भारत के ठीक मध्य (हृदयस्थल) में एक दूसरा शत्रु देश खड़ा होता, जिसका कुल क्षेत्रफल २,३९,३१४ वर्ग किलोमीटर होता—अर्थात वर्तमान उत्तर प्रदेश के लगभग बराबर।
मुगल काल से स्वायत्तता: हैदराबाद का निजाम मूलतः एक तुर्की मुसलमान था, जो मुगल शासकों के अधीन दक्कन (दक्षिण) की सूबेदारी संभालता था। कालान्तर में जब मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा, तो निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित करने के बजाय केवल ‘सेनापति’ बनाए रखा, जो उसकी एक सोची-झीली राजनीतिक चाल थी। धीरे-धीरे वह मुगलों की छाया से बाहर निकलकर स्वयं को मजबूत करने लगा।
हैदराबाद राज्य की स्थापना: वर्ष १७२० में कमरुद्दीन खान ने मुगलिया सल्तनत से अलग स्वतंत्र हैदराबाद राज्य का ऐलान कर दिया। इस ऐतिहासिक राज्य के अंतर्गत अविभाजित आंध्र प्रदेश समेत वर्तमान कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ बड़े हिस्से भी आते थे।
गोलकुंडा के हीरे और अकूत संपत्ति: गोलकुंडा की प्रसिद्ध हीरे की खानों के कारण हैदराबाद भारत का सबसे अमीर राज्य बन गया और उसका निजाम उस दौर में सारे संसार का सबसे धनी व्यक्ति चुना गया। हैदराबाद राज्य ने समय के साथ अपनी अलग रेलवे लाइन, अपनी निजी एयरलाइंस और अपना अलग रेडियो स्टेशन तक तैयार कर लिया था।
मराठा प्रभाव और ब्रिटिश आधिपत्य: हैदराबाद के इतिहास में एक समय ऐसा भी आया था, जब पराक्रमी मराठों ने निजाम से ‘चौथ’ (कर) की वसूली की थी। परंतु पेशवा बाजीराव के जाने के बाद जब मराठा साम्राज्य आंतरिक संघर्षों से कमजोर हुआ, तो हैदराबाद पुनः अपनी पूरी शक्ति के साथ उभर आया। अंततः, वर्ष १७९८ में निजाम आसफ जाह द्वितीय ने अंग्रेजों की ‘सहायक संधि’ (Subsidiary Alliance) पर हस्ताक्षर कर दिए और हैदराबाद ब्रिटिश हुकूमत की एक संरक्षित मिल्कियत बन गया।
सावरकर और गांधीजी के वैचारिक मतभेद का केंद्र
हैदराबाद का आंतरिक सामाजिक परिदृश्य अत्यंत विस्फोटक था। वहाँ की ८५ फीसदी प्रजा हिंदू थी, परंतु रियासत के प्रशासन, पुलिस और सेना में ९० फीसदी पदों पर मुसलमानों का कब्ज़ा था। हैदराबाद ही वह मुख्य विषय था, जिसे लेकर वीर विनायक दामोदर सावरकर और महात्मा गांधी के रिश्ते कभी भी मधुर नहीं रह सके।
हैदराबाद के कुशासन में हिंदुओं के नागरिक अधिकारों और उनकी प्रशासनिक सहभागिता को बढ़ाने के लिए वीर सावरकर ने एक बड़ा आंदोलन छेड़ा था, परंतु गांधीजी ने इस आंदोलन में भाग लेने या इसका समर्थन करने से साफ मना कर दिया। इसके प्रतिउत्तर में, सावरकर ने भी बाद में कांग्रेस के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सहयोग करने से मना कर दिया था।
निजाम का विश्वासघात और ‘रजाकारों’ का जन्म
आज़ादी के बाद भारत सरकार और हैदराबाद के बीच एक वर्ष के लिए ‘यथास्थिति समझौता’ (Standstill Agreement) हुआ था। इसके बावजूद सरदार पटेल को निजाम मीर उस्मान अली पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं था। उन्होंने निजाम की गुप्त गतिविधियों की थाह लेने के लिए एक ‘सीक्रेट इन्वेस्टिगेशन टीम’ (गुप्त जांच दल) को काम पर लगाया।
जांच टीम ने जो रिपोर्ट दी, वह चौंकाने वाली थी। पता चला कि निजाम पीठ पीछे पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ा रहा है, उनके कराची बंदरगाह (Port) को इस्तेमाल करने का गुप्त समझौता करने जा रहा है और पाकिस्तान को बिना ब्याज के २० करोड़ रुपये का कर्ज देने वाला है। पाकिस्तान उस धन का उपयोग भारत के खिलाफ कश्मीर की जंग में हथियार खरीदने के लिए करने वाला था। पटेल ने फौरन कड़े कदम उठाए और निजाम को नवंबर तक लागू समझौते की याद दिलाई, जिसके दबाव में निजाम ने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद तो रोक दी, लेकिन भारत के भीतर ही एक नए तरीके से छद्म युद्ध छेड़ दिया।
MIM और कासिम रिजवी का उभार: आज जिसे हम ओवैसी बंधुओं के संगठन ‘AIMIM’ के तौर पर जानते हैं, वह संगठन मूलतः ‘मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’ (MIM) के नाम से शुरू हुआ था। यह उन कट्टरपंथी मुसलमानों का संगठन था, जो हैदराबाद को भारत का हिस्सा न मानकर एक स्वतंत्र इस्लामिक ‘खलीफा का राज्य’ बनाना चाहते थे। इस संगठन के सशस्त्र लड़ाकों को ‘रजाकार’ कहा जाता था।
हिंदुओं पर अत्याचार: उस वक्त इस संगठन का क्रूर मुखिया कासिम रिजवी था। रिजवी ने लगभग दो लाख रजाकारों को सैन्य ट्रेनिंग देनी शुरू की। इसके बाद पूरे हैदराबाद राज्य में हिंदुओं के खिलाफ भीषण हिंसा, लूटपाट, दंगे और नरसंहार का दौर शुरू हो गया। जुलाई और अगस्त के महीने में ही रजाकारों द्वारा लगभग १,००० महिलाओं के साथ बलात्कार और तकरीबन ५०० हिंदुओं की निर्मम हत्या कर दी गई। राज्य के हिंदू भयंकर आतंक के साए में जीने को विवश थे।
नेहरू की असहमति और पटेल का ऐतिहासिक ‘हरी झंडी’ निर्णय
सैन्य कार्रवाई शुरू करने से पहले सरदार पटेल ने दिल्ली में कासिम रिजवी से मुलाकात भी की थी, परंतु रिजवी ने उनके साथ अत्यंत रूखा और उद्दंड व्यवहार किया। वह स्वयं को हैदराबाद का ‘जिन्ना’ समझने लगा था और अपने भड़काऊ भाषणों में हिंदुओं के खिलाफ ‘डायरेक्ट एक्शन’ (प्रत्यक्ष कार्रवाई) की धमकी दे रहा था।
अब सरदार पटेल के सब्र का बांध टूट चुका था। सितंबर के पहले सप्ताह में उन्होंने भारतीय सेना के आला अफसरों के साथ एक आपातकालीन बैठक बुलाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस पुलिस एक्शन के पूरी तरह खिलाफ थे, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि प्रभावित होगी और देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क सकते हैं। परंतु राष्ट्रहित सर्वोपरि मानने वाले लौह पुरुष ने नेहरू की आशंकाओं और राय को दरकिनार करते हुए सैन्य कार्रवाई का दृढ़ मन बना लिया और सेना को आगे बढ़ने की हरी झंडी दिखा दी।
‘ऑपरेशन पोलो’: १०८ घंटों का सैन्य पराक्रम
१३ सितंबर, १९४८: मेजर जनरल जे.एन. चौधरी की कमान में ३६,००० पूरी तरह सुसज्जित भारतीय सैनिकों ने सुबह ठीक ४ बजे हैदराबाद राज्य की सीमाओं में प्रवेश किया। इस ऐतिहासिक सैन्य अभियान को कोड नेम दिया गया—’ऑपरेशन पोलो’ (क्योंकि उस समय हैदराबाद में दुनिया में सबसे ज्यादा १७ पोलो खेल के मैदान थे)।
पहला दिन (१३ सितंबर): पहली भीषण भिड़ंत सोलापुर-सिकंदराबाद राजमार्ग पर स्थित ऐतिहासिक नालदुर्ग किले के पास हुई। वहाँ हैदराबाद इन्फैंट्री के बचाव दल और भारतीय सेना की सातवीं ब्रिगेड के मध्य युद्ध लड़ा गया। भारतीय सेना ने गति और रणनीति के विस्मयकारी उपयोग से हैदराबाद की नकारा सेना को पस्त कर दिया और नालदुर्ग किले को अपने नियंत्रण में ले लिया। पहले ही दिन पश्चिमी मोर्चे पर निजाम की सेना को भारी क्षति उठानी पड़ी।
दूसरा दिन (१४ सितंबर): उमरगा में डेरा डालने वाला भारतीय सैन्य बल ४८ किलोमीटर पूर्व की ओर स्थित राजेश्वर शहर के लिए रवाना हुआ। भारतीय वायुसेना के ‘टेम्पेस्ट’ विमानों ने हवाई टोह लेते हुए सेना का मार्ग प्रशस्त किया। भूमि बलों ने आदेशानुसार दोपहर तक राजेश्वर पर पूर्ण कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद जालना शहर को सुरक्षित करने के लिए ३/११ गोरखा रेजिमेंट की एक कंपनी को छोड़कर, शेष बल लातूर होते हुए मोमिनाबाद की ओर निकल गए, जहाँ उन्हें निजाम के ‘गोलकुंडा लांसर्स’ के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।
तीसरा और चौथा दिन (१५-१६ सितंबर): गोलकुंडा लांसर्स और रजाकार इकाइयों ने शहरी क्षेत्रों में छिपकर भारतीय सेना पर घात लगाकर हमले किए। परंतु गोरखा और भारतीय बख्तरबंद रेजिमेंट के भीषण प्रहारों के सामने वे टिक नहीं सके। १६ सितंबर को रजाकारों सहित पूरी गोलकुंडा लांसर्स ने घुटने टेक दिए और सामूहिक आत्मसमर्पण कर दिया।
पाँचवाँ दिन (१७ सितंबर): १७ सितंबर की तड़के भारतीय सेना ऐतिहासिक बीदर शहर में प्रवेश कर गई। सेना की पहली बख़्तरबंद रेजिमेंट हैदराबाद से मात्र ६० किलोमीटर दूर चित्याल शहर में अपना डेरा जमा चुकी थी, जबकि एक अन्य सैन्य दल ने हिंगोली शहर को पूरी तरह अपने अधीन कर लिया था।
निजाम का आत्मसमर्पण और एक अखंड राष्ट्र का जन्म
जब चारों मोर्चों पर निजाम की सेना और रजाकारों का समूल नाश हो गया और यह स्पष्ट हो गया कि अब भारतीय सेना के सामने टिकना असंभव है, तब १७ सितंबर, १९४८ को शाम ठीक ५ बजे लाचार निजाम मीर उस्मान अली ने रेडियो पर युद्धविराम (Ceasefire) की घोषणा कर दी।
यह ऐतिहासिक सैन्य अभियान बमुश्किल १०८ घंटे चला था। १७ सितंबर को ही निजाम के प्रधानमंत्री लायक अली और उनके पूरे मंत्रिमंडल ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया। १८ सितंबर को मेजर जनरल जे.एन. चौधरी ने हैदराबाद के सैन्य गवर्नर के रूप में कार्यभार संभाला। लायक अली और उनके मंत्रियों को नजरबंद कर दिया गया।
१९ सितंबर को रजाकारों के क्रूर चीफ कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर लिया गया। उसे न्यायालय द्वारा आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, परंतु बाद में इस शर्त पर राहत दी गई कि वह भारत छोड़कर हमेशा के लिए पाकिस्तान चला जाए। ९ वर्ष की जेल काटने के बाद १९NT५७ में वह पाकिस्तान चला गया, लेकिन जाने से पूर्व वह भारत को जख्म देने वाली एक कुटिल हरकत कर गया। वह चुपके से एक बार हैदराबाद आया और ‘मजलिस’ (MIM) की पूरी जिम्मेदारी अब्दुल वाहिद ओवैसी को सौंप गया। अब्दुल वाहिद ओवैसी ने बाद में इस संगठन के नाम के आगे ‘ऑल इंडिया’ शब्द जोड़कर इसे AIMIM बना दिया, जिसे आज भी उनका ओवैसी परिवार ही चला रहा है।
निष्कर्ष: राष्ट्र भर में हर्ष का माहौल
इस पूरे सैन्य ऑपरेशन की सबसे अद्भुत और अनुकरणीय बात यह रही कि इसके दौरान पूरे भारतवर्ष में एक भी सांप्रदायिक अप्रिय घटना घटित नहीं हुई। सरदार पटेल की दूरदर्शिता ने उन सभी आशंकाओं को ध्वस्त कर दिया जो नेहरू और पश्चिमी विचारक लगा रहे थे। इस हैदराबाद प्रकरण के इतनी तेजी से और सफलतापूर्वक समाप्त होने पर संपूर्ण विश्व भर में हर्ष का माहौल था और देश के सभी हिस्सों से भारत सरकार तथा विशेषकर लौह पुरुष सरदार पटेल को बधाई संदेश आने लगे। यह दिन भारत के इतिहास में ‘हैदराबाद मुक्ति दिवस’ के रूप में सदा अमर रहेगा।
धन्यवाद!
विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’