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मौन का महानाद: शांत चित्त, स्वयं की खोज और ब्रह्म का आनंद

 

​”देखने में यह आदमी बिल्कुल अकेला लग रहा है, मगर नहीं… वह इस समय पूरी सृष्टि के साथ है। क्योंकि वह शांत है, बिल्कुल शांत! शांत मन और शांत चित्त आदमी को जीवन की एक नई और असीम ऊंचाई प्रदान करता है। ऐसा व्यक्ति कभी अकेला हो ही नहीं सकता, क्योंकि उस परम एकांत में वह ‘स्वयं’ के साथ होता है। वह आदमी पूरे संसार के हर उस संगीत को सुन सकता है जो बाकी कोलाहल में जी रहे लोगों के लिए दुर्लभ है, वह हर उस मनोरंजन को पा सकता है जिसकी किसी ने कभी कल्पना तक न की हो।”

 

​आधुनिक संसार में जिसे लोग ‘लोनलीनेस’ (अकेलापन) कहकर डरते हैं, अध्यात्म की भाषा में वही जब अंतर्मुखी होता है, तो ‘सॉलिट्यूड’ (एकांत) और ‘समाधि’ का मार्ग बनता है। हम बाहर की दुनिया में मनोरंजन ढूंढते हैं—फिल्मों में, गानों में, गैजेट्स में—मगर वह सब क्षणिक है। वास्तविक और दुर्लभ मनोरंजन तो मनुष्य के अपने भीतर छिपा है, जिसे पाने की पहली शर्त है—मौन और मानसिक शांति।

 

​स्वयं की खोज: दुर्लभ मनोरंजन का एकमात्र मार्ग

​इस संसार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इंसान पूरी जिंदगी दूसरों को जानने और दुनिया को नापने में बिता देता है, लेकिन कभी खुद के साथ दो पल बैठकर बात नहीं करता।

​दुर्लभ संगीत: जब हमारे विचार शांत होते हैं, जब मस्तिष्क का अनर्गल शोर थमता है, तब प्रकृति और अंतरात्मा का अनहद नाद (Inner Music) सुनाई देता है। यह वह संगीत है जिसे कान नहीं, बल्कि आत्मा सुनती है।

​परम आनंद: लोग इसे पाने के लिए तरसते हैं, लेकिन पूरे जीवनकाल में इसे तब तक नहीं पा सकते, जब तक वे स्वयं को नहीं पा लेते। और स्वयं को पाने का केवल एक ही रास्ता है—शांत चित्त होना।

 

​खुद में खोना और खुद को पाना: ब्रह्मांडीय मणियों का वैभव

​जब मनुष्य बाहर की चकाचौंध से अपनी आँखें बंद करके खुद के भीतर उतरता है, तो उसे ‘खुद में खोना’ पड़ता है। यह खोना किसी भटकाव का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने अहंकार, अपनी चिंताओं और अपनी वासनाओं को विसर्जित करना है।

​जैसे ही कोई व्यक्ति खुद में खो जाता है, वह वास्तव में ‘खुद को पा लेता है’। इस अवस्था में पहुँचकर वह केवल शांत नहीं रहता, बल्कि पूरे ब्रह्मांड की दुर्लभ मणियों (ज्ञान, संतोष, करुणा और आनंद के दिव्य रत्न) से खुद को अंगीकार कर लेता है। फिर उसे संसार की किसी वस्तु का अभाव नहीं खटकता। वह भीतर से इतना समृद्ध हो जाता है कि सम्राटों के साम्राज्य भी उसके आगे फीके लगने लगते हैं।

 

​अंतिम परिणति: स्वयं का ब्रह्म में विलीन होना

​”अर्थात वह स्वयं को ब्रह्म में विलीन कर सकता है… वो ब्रह्म को पा जाएगा।” यह पंक्ति आदि शंकराचार्य के ‘अद्वैत वेदांत’ के उस महावाक्य को चरितार्थ करती है—”अहं ब्रह्मास्मि” (मैं ही ब्रह्म हूँ)।

​जब लहर को यह अहसास हो जाता है कि वह सागर से अलग नहीं है, तो वह सागर में विलीन होकर खुद समुद्र बन जाती है। ठीक वैसे ही, जब शांत चित्त पुरुष अपने भीतर के परमात्मा को पहचान लेता है, तो जीव और ब्रह्म का भेद मिट जाता है। वह उस परम चेतना (Supreme Consciousness) का हिस्सा बन जाता है। यही मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है और यही वास्तविक मुक्ति है।

 

​निष्कर्ष: कोलाहल से केंद्र की ओर

​यह आलेख उन सभी भटके हुए मनों के लिए एक मार्गदर्शक है जो शांति की तलाश में बाहर भटक रहे हैं। शांति बाज़ार में या पहाड़ों की कंदराओं में नहीं, बल्कि आपके अपने शांत चित्त के भीतर है। खुद में खो जाइए, ताकि आप खुद को पा सकें और उस ब्रह्म के आनंद का हिस्सा बन सकें जो इस सृष्टि का एकमात्र परम सत्य है।

 

 

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