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शतपथ ब्राह्मण: वैदिक वाङ्मय का जाज्वल्यमान ज्ञान-कोश

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​परिचय: ब्राह्मण ग्रन्थों में सर्वोच्च स्थान

​वैदिक साहित्य में ब्राह्मण ग्रन्थों का स्थान वेदों की व्याख्या के रूप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इनमें शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद का ब्राह्मण) अपनी विशालता, प्रमाणिकता और दार्शनिक गहराई के कारण ‘सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण’ माना जाता है।

​रचयिता: इसके मुख्य प्रवचनकर्ता महर्षि याज्ञवल्क्य माने जाते हैं। ग्रन्थ के अंत में स्पष्ट उल्लेख है कि आदित्य से प्राप्त शुक्ल यजुष् का व्याख्यान याज्ञवल्क्य ने किया।

​शाखाएँ: यह शुक्ल यजुर्वेद की दोनों शाखाओं—माध्यन्दिनी (१४ काण्ड) और काण्व (१७ काण्ड)—में उपलब्ध है।

​प्राचीनता: इसमें प्रयुक्त ‘स्वर-चिह्न’ (तैत्तिरीय ब्राह्मण के समान) इसकी प्राचीनता का पुष्ट प्रमाण हैं।

​नामकरण: ‘सौ पथों’ का समागम

 

​’शतपथ’ का शाब्दिक अर्थ है—सौ पथों (अध्यायों) वाला ग्रन्थ।

​’शतं पन्थानो मार्गा नामाध्याया यस्य तच्छतपथम्’

​माध्यन्दिन शाखा में पूर्णतः १०० अध्याय होने के कारण यह नाम सार्थक है। यद्यपि काण्व शाखा में १०४ अध्याय हैं, फिर भी प्रधानता के कारण इसे शतपथ ही कहा जाता है।

 

​विषय-वस्तु और काण्डों का वर्गीकरण

​शतपथ ब्राह्मण केवल यज्ञों की विधि नहीं बताता, बल्कि यह भूगोल, इतिहास और समाजशास्त्र का भी संगम है।

काण्ड संख्या:  प्रमुख विषय / प्रतिपाद्य

१-५ : दर्श-पूर्णमास, अग्निहोत्र, सोमयाग, वाजपेय और राजसूय यज्ञ।

६-१० : ‘शाण्डिल्य काण्ड’ – इसमें अग्नि चयन का विस्तृत वर्णन है।

११-१३ : उपनयन, स्वाध्याय, अश्वमेध, पुरुषमेध और सर्वमेध यज्ञ।

१४ : प्रवर्ग्य और प्रसिद्ध ‘बृहदारण्यक उपनिषद’।

 

यज्ञ-मीमांसा: ‘यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म’

शतपथ ब्राह्मण का मूल मंत्र है—“यज्ञ ही जीवन का श्रेष्ठतम कृत्य है।” यहाँ यज्ञ केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि सृष्टि की प्रक्रिया का प्रतीक है।

प्रतीकात्मक व्याख्या: यज्ञ को ‘पुरुष’ माना गया है। आहवनीय अग्नि उसका मुख है और यजमान की श्रद्धा उसका आधार।

मानवीय पक्ष: यहाँ ‘अनृत-भाषण’ (झूठ बोलना) को यज्ञ के लिए हानिकारक बताया गया है। सत्य बोलना ही यज्ञ की दीक्षा है।

कृषि संस्कृति: इसमें ‘हल संबंधी अनुष्ठान’ का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो तत्कालीन कृषि प्रधान वैदिक समाज को दर्शाता है।

 

ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व

शतपथ ब्राह्मण इतिहास के जिज्ञासुओं के लिए एक प्रामाणिक स्रोत है:

भौगोलिक प्रसार: इसमें आर्य संस्कृति के सरस्वती तट से पूर्व (विदेह/मिथिला) की ओर प्रसार का संकेत मिलता है (विदेघ माथव की कथा)।

सम्राटों का उल्लेख: यहाँ कुरु, पांचाल, कोसल और विदेह जनपदों के साथ-साथ दुष्यंत, जनमेजय और जनक जैसे महान सम्राटों की गाथाएँ हैं।

देव मंडल: यहाँ ३३ देवताओं (८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, इन्द्र और प्रजापति) के वास्तविक स्वरूप की व्याख्या है।

 

सृष्टि प्रक्रिया और आख्यान

यह ग्रन्थ भारतीय दर्शन के बीज संजोए हुए है:

जल-प्लावन कथा: मनु और मत्स्य की कथा, जो वैश्विक साहित्य में ‘महाप्रलय’ के रूप में प्रसिद्ध है, सबसे पहले यहीं विस्तार से मिलती है।

पुरूरवा-उर्वशी आख्यान: कालिदास के नाटकों का मूल आधार यही आख्यान हैं।

सृष्टि का आरंभ: प्रजापति के ‘तप’ और ‘श्रम’ से सृष्टि के विस्तार की वैज्ञानिक व्याख्या यहाँ प्राप्त होती है।

 

उपसंहार

पंडित मोतीलाल शास्त्री के अनुसार, शतपथ ब्राह्मण केवल कर्मकांड का ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह ‘विज्ञान-भाष्य’ का आधार है। आज से लगभग ५००० वर्ष पूर्व रचा गया यह ग्रन्थ आज भी भारतीय मेधा और अध्यात्म का सर्वोच्च शिखर है।

 

 

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