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मनेर से मकर संक्रांति तक: सौर मास का खगोलीय सच, वैश्विक रूप और आध्यात्मिक महत्व

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​भूमिका: सौर विज्ञान और भारतीय मनीषा का समन्वय

​सनातन धर्म की समस्त व्यवस्था विज्ञान, प्रकृति और अध्यात्म के त्रिवेणी संगम पर टिकी है। हमारे ऋषियों-मुनियों ने सृष्टि के नियमों को केवल पूजा-पाठ से नहीं जोड़ा, बल्कि उसके पीछे छिपे खगोलीय सत्यों (Astronomical Truths) को ऋतुचर्या और पर्वों का रूप दिया। इसी खगोलीय चेतना का सर्वोत्कृष्ट पर्व है—’मकर संक्रांति’।

​सामान्यतः भारतीय जनमानस में यह धारणा है कि हमारे सभी त्योहार केवल पौराणिक कथाओं पर आधारित हैं, परंतु मकर संक्रांति प्रत्यक्ष सूर्य की गति और पृथ्वी के अक्षीय झुकाव (Axial Tilt) से जुड़ा एक प्रामाणिक सौर उत्सव है। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण ही इस पर्व की आत्मा है, जो संपूर्ण चराचर जगत को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का संदेश देती है।

संक्रांति और सौर मास का वैज्ञानिक एवं खगोलीय विमर्श

​खगोल विज्ञान के दृष्टिकोण से ब्रह्मांड को बारह राशियों में विभाजित किया गया है। जब प्रत्यक्ष देवता सूर्य नारायण अंतरिक्ष की यात्रा करते हुए एक राशि की सीमा को छोड़कर दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उस संक्रमण काल को ‘संक्रांति’ कहा जाता है।

​सौर मास की परिभाषा: एक संक्रांति से लेकर दूसरी संक्रांति के बीच की जो समयावधि होती है, उसे ही ‘सौर मास’ (Solar Month) कहा जाता है। यह चंद्र मास (Lunar Month) से भिन्न है, क्योंकि चंद्र मास की गणना चंद्रमा की कलाओं (पूर्णिमा और अमावस्या) से होती है, जबकि सौर मास सीधे सूर्य की स्थिति से निर्धारित होता है।

​चार महत्वपूर्ण संक्रांतियाँ: कुल बारह राशियों के आधार पर वर्ष भर में बारह संक्रांतियाँ होती हैं। परंतु, पृथ्वी की गति और अयन (Solstice) के परिवर्तन के आधार पर चार संक्रांतियाँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी गई हैं:

१. मेष संक्रांति (सौर नववर्ष का प्रारंभ)

२. तुला संक्रांति (शरद ऋतु का आगमन)

३. कर्क संक्रांति (दक्षिणायन का प्रारंभ)

४. मकर संक्रांति (उत्तरायण का प्रारंभ)

​इन चारों में भी मकर संक्रांति का धार्मिक, आध्यात्मिक और कृषि परक महत्व सबसे ऊपर है।

मकर संक्रांति और उत्तरायण का रहस्य

​पौष मास में जब सूर्य देव धनु राशि की अपनी यात्रा को पूर्ण कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब ‘मकर संक्रांति’ का पावन योग बनता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन पड़ता है।

उत्तरायण का भू-वैज्ञानिक कारण: १४ जनवरी के बाद से सूर्य की गति उत्तर दिशा की ओर अग्रसर होने लगती है, जिसे ‘उत्तरायण’ कहा जाता है। इसके पीछे का शुद्ध भौगोलिक कारण यह है कि पृथ्वी का झुकाव हर छः-छः माह में उत्तर और दक्षिण की ओर बदलता रहता है। यह एक निरंतर चलने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया है।

प्रकाश और ऊर्जा का विस्तार: जब भारत (जो कि उत्तरी गोलार्ध यानी Northern Hemisphere में स्थित है) की ओर सूर्य का झुकाव बढ़ता है, तो दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं। यह अंधकार पर प्रकाश की और शीत पर ग्रीष्म (ऊर्जा) की विजय का भौतिक प्रतीक है।

 

अनेकता में एकता: भारतवर्ष में मकर संक्रांति के विभिन्न रंग

भारत की भौगोलिक और भाषाई विविधता इस पर्व के विविध नामों में स्पष्ट दिखाई देती है। भले ही नाम बदल जाते हों, परंतु इसके पीछे की भावना, पवित्र स्नान और दान की परंपरा अक्षुण्ण रहती है:

क) मकर संक्रांति

यह नाम भारत के सबसे बड़े भूभाग में प्रचलित है। छत्तीसगढ़, गोवा, ओड़ीसा, हरियाणा, बिहार, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, सिक्किम, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल, गुजरात और जम्मू में इसे मूल नाम ‘मकर संक्रांति’ से ही जाना जाता है।

ख) खिचड़ी

विशेष रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार के लोक-जीवन में इसे ‘खिचड़ी’ कहा जाता है। इस दिन नए अन्न (चावल, दाल, घी, नमक) की खिचड़ी पकाने, खाने और उसका दान करने का विशेष महत्व है।

ग) उत्तरायण

गुजरात और उत्तराखण्ड में इसे ‘उत्तरायण’ के नाम से पुकारा जाता है। गुजरात में इस अवसर पर ‘अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव’ का आयोजन होता है, जहाँ आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से पट जाता है।

घ) ताइ पोंगल और उझवर तिरुनल

तमिलनाडु में यह पर्व चार दिनों तक ‘ताइ पोंगल’ के रूप में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। यह मूलतः किसानों का त्योहार है (उझवर तिरुनल का अर्थ है—किसानों का विशेष दिन), जिसमें सूर्य देव और इंद्र देव को नई फसल का भोग लगाया जाता है।

ङ) माघी और भोगाली बिहु

पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश: यहाँ इसे ‘माघी’ के रूप में मनाया जाता है, जो लोहड़ी के ठीक अगले दिन आता है।

असम: पूर्वोत्तर के असम में इसे ‘भोगाली बिहु’ या ‘माघ बिहु’ कहा जाता है, जहाँ सामूहिक भोज (उरुका) और पारंपरिक मेजी (अलाव) जलाने की प्रथा है।

च) प्रादेशिक विशिष्ट नाम

जम्मू: उत्तरैन या माघी संगरांद

कश्मीर घाटी: शिशुर सेंक्रात

पश्चिम बंगाल: पौष संक्रांति (इस दिन पीठे और पातिशप्ता जैसी पारंपरिक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं)

कर्नाटक: मकर संक्रमण (जहाँ ‘एल्लू-बेल्ला’ यानी तिल और गुड़ बांटने की सुंदर परंपरा है)

 

भारत के बाहर: मकर संक्रांति का वैश्विक विस्तार

सनातन संस्कृति की सीमाएं केवल भारत के भौगोलिक मानचित्र तक सीमित नहीं हैं। सुदूर पूर्व और दक्षिण-एशियाई देशों में भी सूर्य के इस राशि परिवर्तन को एक महान उत्सव के रूप में स्वीकार किया गया है:

देश:  पर्व का स्थानीय नाम– सांस्कृतिक स्वरूप

नेपाल: माघे संक्रांति, माघी या खिचड़ी संक्रांति– देवघाट और त्रिवेणी पर पवित्र स्नान, तिल और तरुल का सेवन।

बांग्लादेश: पौष संक्रांति– शक्रैन उत्सव, पतंगबाजी और पारंपरिक मिठाइयों का निर्माण।

थाईलैंड: सोंगकरन (Songkran)– जल उत्सव, नववर्ष की शुरुआत और वृद्धों का सम्मान।

लाओस: पिमा लाओ (Pi Ma Lao)– नए वर्ष का स्वागत, जल छिड़क कर पवित्र होने की परंपरा।

म्यांमार: थिंयान (Thingyan)– पारंपरिक बौद्ध जल उत्सव, सूर्य की गति का उत्सव।

कम्बोडिया: मोहा संगक्रान (Moha Sangkran)– पारंपरिक खमेर नववर्ष, मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना।

श्रीलंका: पोंगल, उझवर तिरुनल– तमिल बहुल क्षेत्रों में नई फसल का उत्सव और सूर्य पूजा।

 

धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व: मोक्ष का पावन द्वार

मकर संक्रांति केवल ऋतु परिवर्तन का समय नहीं है, बल्कि यह साधना की दृष्टि से ‘पुण्य काल’ माना गया है। शास्त्रों में सूर्य के इस राशि परिवर्तन को आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग बताया गया है।

हमारे पुराणों में एक अत्यंत पवित्र और फलदायी श्लोक का उल्लेख मिलता है:

माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम।

स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

अर्थात: माघ के महीने में जो व्यक्ति भगवान शिव (या असहायों) को घी और कंबल का दान करता है, वह इस संसार के सभी भौतिक सुखों को भोगकर अंत में मोक्ष (परम पद) को प्राप्त करता है।

महास्नान की महत्ता: इस अवसर पर पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा जी में स्नान और गंगातट पर किए गए दान को अक्षय पुण्यदायी माना गया है। तीर्थराज प्रयाग (त्रिवेणी संगम) और गंगासागर में इस दिन होने वाले स्नान को ‘महास्नान’ की संज्ञा दी गई है। मान्यता है कि ‘सब तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार’।

कर्क और मकर का विशेष फल: यद्यपि सूर्य देव प्रति मास अपनी राशि बदलते हैं और सभी राशियों को प्रभावित करते हैं, किंतु कर्क और मकर राशियों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक और ऊर्जा की दृष्टि से अत्यंत फलदायक है, क्योंकि यह संक्रमण क्रिया छह-छह माह के अंतराल पर अयन बदलती है।

 

पूर्ण परमात्मा का संविधान और तात्त्विक विमर्श

हमारे पवित्र वेद, श्रीमद्भगवद्गीता जी तथा पूर्ण परमात्मा का शाश्वत संविधान यह उद्घोष करता है कि यह भौतिक जगत और इसके खगोलीय परिवर्तन तो प्रकृति की व्यवस्था हैं, परंतु यदि जीव इस अनमोल मानव जन्म में किसी पूर्ण तत्वदर्शी संत से नाम-दीक्षा लेकर उस एक पूर्ण अकाल पुरुष (परमात्मा) की अव्यभिचारिणी भक्ति करे, तो यह धरती ही स्वर्ग के समान सुखद हो सकती है।

अध्यात्म का वास्तविक मर्म यही है कि बाहरी सूर्य के उत्तरायण होने के साथ-साथ हमारे भीतर का विवेक-सूर्य भी जाग्रत हो। जब साधक पूर्ण गुरु के सान्निध्य में आता है, तो उसकी अंतरात्मा की लौकिक और पारलौकिक दोनों इच्छाएँ स्वतः पूर्ण होने लगती हैं, और वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर परम शांति का अधिकारी बन जाता है।

 

निष्कर्ष: जड़ता से चेतनता की ओर प्रस्थान

मकर संक्रांति भौगोलिक सत्य, वैश्विक बंधुत्व और आध्यात्मिक पराकाष्ठा का एक अप्रतिम उदाहरण है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सूर्य देव कड़ाके की ठंड की परीक्षा को पार कर, धनु की संकुचित सीमा को छोड़, मकर की व्यापकता में प्रवेश करते हैं और संसार को नया ताप और जीवन देते हैं; ठीक उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने संकीर्ण विचारों को त्यागकर सर्वकल्याण की भावना में लीन हो जाना चाहिए। तिल-गुड़ की मिठास और खिचड़ी की समरसता हमारे सामाजिक ताने-बाने को मजबूत बनाए रखे, यही इस पर्व का वास्तविक संदेश है।

 

 

 

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