पोखरण: प्राचीन वैभव से परमाणु शक्ति के उदय तक की महागाथा
प्रस्तावना:
राजस्थान की मरुधरा अपनी गोद में अनगिनत रहस्यों और वीरगाथाओं को समेटे हुए है। जैसलमेर से लगभग ११० किलोमीटर दूर जैसलमेर-जोधपुर मार्ग पर स्थित ‘पोखरण’ (या पोकरण) एक ऐसा ही नाम है, जिसने प्राचीन काल में किलों की प्राचीर से और आधुनिक काल में परमाणु परीक्षणों की गर्जना से विश्व पटल पर अपनी अमिट पहचान बनाई है।
१. ऐतिहासिक गौरव: लाल पत्थरों का अजेय दुर्ग
पोखरण का सबसे प्रमुख आकर्षण यहाँ का दुर्ग है, जो स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। लाल पत्थरों से निर्मित इस सुंदर और सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण सन् १५५० में राव मालदेव ने कराया था। राव मालदेव, जो राव जोधा के वंशज और मारवाड़ के प्रतापी शासक थे, उन्होंने इस दुर्ग को सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित किया। यह किला राठौड़ वंश के पराक्रम का साक्षी रहा है।
जानकारी के लिए यह भी उल्लेखनीय है कि पोखरण से मात्र तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘सातलमेर’ को पोखरण की प्राचीन राजधानी होने का गौरव प्राप्त है। इतिहास के झरोखों में सातलमेर की अपनी एक विशिष्ट पहचान रही है।
२. आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत
पोखरण केवल युद्धों की भूमि नहीं रही, बल्कि यह श्रद्धा और शांति का केंद्र भी है। आधुनिक समय में इस स्थल की प्रसिद्धि बाबा रामदेव (रामदेव पीर) के गुरुकुल के रूप में भी है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु और पर्यटक निम्नलिखित स्थलों के दर्शन कर आत्मिक शांति का अनुभव करते हैं:
आशापूर्णा मंदिर: शक्ति की देवी माँ आशापूर्णा का यह मंदिर आस्था का बड़ा केंद्र है।
खींवज माता का मंदिर: स्थानीय संस्कृति और लोक-आस्था का प्रतीक।
कैलाश टेकरी: प्राकृतिक सौंदर्य और शांति के लिए प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल।
३. परमाणु सामर्थ्य का साक्षी: १८ मई और ११-१३ मई
पोखरण का नाम विश्व के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में तब अंकित हुआ, जब भारत ने दुनिया को अपनी परमाणु शक्ति का परिचय दिया। पोखरण के रेतीले धोरों ने दो बार परमाणु धमाकों की गूँज सुनी है:
प्रथम परीक्षण (स्माइलिंग बुद्धा): १८ मई, १९७४ को भारत ने यहाँ अपना पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण कर विश्व को चौंका दिया था।
द्वितीय परीक्षण (ऑपरेशन शक्ति): पुनः ११ और १३ मई, १९९८ को बुद्ध पूर्णिमा के ही अवसर पर भारत ने यहाँ पाँच परमाणु परीक्षण किए। इन परीक्षणों के बाद भारत ने स्वयं को पूर्ण परमाणु संपन्न राष्ट्र घोषित किया।
इन घटनाओं ने पोखरण को केवल राजस्थान का एक कस्बा न रखकर ‘शक्ति स्थल’ में परिवर्तित कर दिया।
निष्कर्ष:
पोखरण आज मध्यकालीन किलों की भव्यता और आधुनिक भारत की वैज्ञानिक प्रगति का एक अनूठा संगम है। यह भूमि हमें सिखाती है कि कैसे अपनी जड़ों (इतिहास) को सम्मान देते हुए आसमान (शक्ति) की ऊँचाइयों को छुआ जाता है।