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साप्ताहिक कविता प्रतियोगिता # ५
दिनांक – १८-१२-१८
विषय – रिश्ते

 

बदलते मायने रिश्तों के…

 

​रिश्तों के मायने बदल रहे हैं,

आग पर बैठे जैसे उबल रहे हैं।

मंदिर के पत्थर को सीढ़ी बना,

अपनों को ही कुचल रहे हैं।

 

​रिश्तों के मायने बदल रहे हैं।

 

​बिन बोले कभी जो हाथ बढ़ाता,

आज चेतना-शून्य है हर कोई।

रिश्ते शायद शून्य में बदल रहे हैं,

रिश्तों के मायने बदल रहे हैं।

 

​जिसके खातिर माथा टेका,

रखा जिसके खातिर उपवास।

उसने बनाया किसी और को खास,

हर कोई रिश्तों को छल रहे हैं।

 

​रिश्तों के मायने बदल रहे हैं।

 

​आगे जाने की अंधी दौड़ लगी है,

सपनों को पाने की होड़ लगी है।

​माँ-बाप का बस सरनाम लगता है,

खून का रिश्ता बेकाम लगता है।

 

पास-पड़ोसी बेगाने लग रहे हैं,

रिश्तों के मायने सच में बदल रहे हैं।

 

 

एक विजेता, दो चैंपियंस: २०१९ वर्ल्ड कप फाइनल के बेतुके नियम और न्यूज़ीलैंड की महानता

 

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