July 24, 2024

द स्पिरिट मानीया
दिनांक – २४/११/२०१९
मासिक लेखन चुनौती १.१

प्रथम स्थान के पुरस्कार स्वरूप यह आलेख एक साझा संग्रह के लिए आरक्षित हो गया है। साथ ही इस आलेख को पत्रिका के पहले संस्करण के लिए भी चुना गया है।

शीर्षक : दहेज का संक्षेपण

प्राचीन भारतीय समाज में कई प्रकार की प्रथाएं विद्यमान रही हैं जिनमें से अधिकांश परंपराओं का सूत्रपात किसी विशेष उद्देश्य से किया गया था। लेकिन समय के साथ-साथ इन प्रथाओं की उपयोगिता पर भी लगातार प्रश्नचिंह लगते गए जिसके परिणामस्वरूप पारिवारिक और सामाजिक तौर पर ऐसी अनेक मान्यताएं अपना आस्तित्व पूरी तरह से खो चुकी हैं। वहीं दूसरी तरफ अनेक परंपराएं ऐसी भी हैं जो बदलते वक्त के साथ अधिक भयावह रूप ग्रहण करती जा रही हैं। दहेज प्रथा ऐसी ही कुरीति बनकर उभरी है जिसने समाज को अपनी चपेट में ले लिया है। इस प्रथा के अंतर्गत युवती का पिता उसे ससुराल विदा करते समय तोहफे और कुछ धन देता है, अब यही धन वैवाहिक संबंध तय करने का माध्यम बन चुका है। वर पक्ष के लोग मुंहमांगे धन की आशा करने लगे हैं जिसके ना मिलने पर स्त्री का शोषण होना, उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाना कोई बड़ी बात नहीं रह गई है। यही कारण है कि युवती के पिता को यही डर सताता रहता है कि अगर उसने दहेज देने योग्य धन संचय नहीं किया तो उसकी बेटी का विवाह कैसे होगा।

जब से इस प्रथा की शुरूआत की गई तब से लेकर अब तक इस प्रथा के स्वरूप में कई नकारात्मक परिवर्तन देखे जा सकते हैं। इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो यह प्रमाणित होता है कि दहेज का जो रूप आज हम देखते हैं ऐसा पहले कतई नहीं था। उत्तरवैदिक काल में प्रांरभ हुई यह परंपरा आज अपने घृणित रूप में हमारे समक्ष खड़ी है।

दहेज प्रथा का इतिहास :

ऋगवैदिक काल में दहेज प्रथा का कोई औचित्य या मान्यता नहीं थी। विद्वानों के अनुसार उत्तरवैदिक काल में वस्तु के रूप में इस प्रथा का प्रचलन शुरू हुआ जिसका स्वरूप वर्तमान दहेज व्यवस्था से पूरी तरह भिन्न था। इस काल में युवती का पिता उसे पति के घर विदा करते समय कुछ तोहफे देता था। लेकिन उसे दहेज नहीं मात्र उपहार माना जाता था, जो पूर्व निश्चित नहीं होता था। उस समय पिता को जो देना सही जान पड़ता था वह अपनी इच्छा से वो दे देता था जिसे वर पक्ष सहर्ष स्वीकार करता था। इसमें न्यूनतम या अधिकतम जैसी कोई सीमा निर्धारित नहीं थी। इस काल में लिखे गए धर्म ग्रंथों और पौराणिक कथाओं में कहीं भी दहेज से संबंधित कोई भी प्रसंग नहीं मिलता है।

मध्य काल में इस वहतु को स्त्रीधन के नाम से पहचान मिलने लगी। इसका स्वरूप वस्तु के ही समान था। पिता अपनी इच्छा और काबीलियत के अनुरूप धन या तोहफे देकर बेटी को विदा करता था। इसके पीछे मुख्य विचारधारा यह थी कि जो उपहार वो अपनी बेटी को दे रहा है जो किसी परेशानी या फिर किसी बुरे वक्त में उसके और उसके ससुराल वालों के काम में आएगा। इस स्त्रीधन से ससुराल पक्ष का कोई संबंध नहीं होता था, लेकिन इसका स्वरूप पहले की अपेक्षा थोड़ा विस्तृत होता गया। अब विदाई के समय धन को भी महत्व दिया जाने लगा था, विशेषकर राजस्थान के उच्च और संपन्न राजपूतों घरानो ने इस प्रथा को अत्याधिक बढ़ा दिया। इसके पीछे उनका मंतव्य ज्यादा से ज्यादा धन व्यय कर अपनी मान प्रतिष्ठा को बढ़ाना था। सही मायने में यही वह समय था जब इस प्रथा की शुरूआत हुई जिसमें स्त्रीधन शब्द पूरी तरह गौण होकर दहेज शब्द प्रभाव में आया।

वर्तमान समय में दहेज व्यवस्था एक ऐसी कुप्रथा का स्वरूप प्राप्त कर चुकी है जिसके अंतर्गत युवती के माता-पिता और परिवारवालों का सम्मान दहेज में दिए गए धन-दौलत पर ही निर्भर करने लगा है। वर-पक्ष सरेआम अपने पुत्र को बाजार में सौदा करने लगा है। प्राचीन परंपराओं के नाम पर युवती के परिवार वालों पर दबाव डाला जाने लगा है और उन्हें प्रताड़ित भी किया जाने लगा है। इस व्यवस्था ने समाज के सभी वर्गों को अपनी चपेट में ले रखा है। संपन्न परिवारों को शायद दहेज देने या लेने में कोई बुराई नजर नहीं आती, क्योंकि उन्हें यह मात्र एक निवेश लगता है। उनका मानना है कि धन और उपहारों के साथ बेटी को विदा करेंगे तो यह उनके मान-सम्मान को बढ़ाने के साथ-साथ बेटी को सुखी रखेगा। वह जानते हैं कि अगर दहेज का प्रबंध नहीं किया गया तो विवाह के पश्चात बेटी का ससुराल में जीना तक मुश्किल हो जाएगा। दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए अब तक कितने ही नियमों और कानूनों को लागू किया गया हैं, जिनमें से कोई भी कारगर सिद्ध नहीं हो पाया। 1961 में सबसे पहले दहेज निरोधक कानून अस्तित्व में आया जिसके अनुसार दहेज देना और लेना दोनों ही गैरकानूनी घोषित किए गए, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसका कोई लाभ नहीं मिल पाया। आज भी बिना किसी हिचक के वर-पक्ष दहेज की मांग करता है और ना मिल पाने पर नववधू को उनके कोप का शिकार होना पड़ता है।

1985 में दहेज निषेध नियमों को तैयार किया गया था। इन नियमों के अनुसार शादी के समय दिए गए उपहारों की एक हस्ताक्षरित सूची बनाकर रखा जाना चाहिए। इस सूची में प्रत्येक उपहार, उसका अनुमानित मूल्य, जिसने भी यह उपहार दिया है उसका नाम और संबंधित व्यक्ति से उसके रिश्ते का एक संक्षिप्त विवरण मौजूद होना चाहिए। नियम बना तो दिए जाते हैं लेकिन ऐसे नियमों को शायद ही कभी लागू किया जाता है। 1997 की एक रिपोर्ट में अनुमानित तौर पर यह कहा गया कि प्रत्येक वर्ष 5,000 महिलाएं दहेज हत्या का शिकार होती हैं।

दहेज एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसका परित्याग करना बेहद जरूरी है। उल्लेखनीय है कि शिक्षित और संपन्न परिवार भी दहेज लेना अपनी परंपरा का एक हिस्सा मानते हैं तो ऐसे में अल्पशिक्षित या अशिक्षित लोगों की बात करना बेमानी है। युवा पीढ़ी, जिसे समाज का भविष्य समझा जाता है, उन्हें इस प्रथा को समाप्त करने के लिए आगे आना होगा ताकि भविष्य में प्रत्येक स्त्री को सम्मान के साथ जीने का अवसर मिले और कोई भी वधू दहेज हत्या की शिकार ना होने पाए।

अश्विनी राय ‘अरूण’

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