यशपाल का उपन्यास ‘दिव्या’: स्त्री-मुक्ति का आवरण या सनातन परंपरा पर योजनाबद्ध आघात?
यशपाल का उपन्यास ‘दिव्या’ (१९४५) कुषाण-काल की पृष्ठभूमि पर लिखा गया एक ऐतिहासिक-काल्पनिक उपन्यास है। इसे पढ़कर पहली नज़र में लगता है कि यह बौद्ध काल में स्त्री के अधिकारों और उसकी स्वतंत्रता की लड़ाई है। परंतु जब इसके ‘प्रोजेक्टेड प्लॉट’ और यशपाल की मार्क्सवादी-फ्रायडवादी (Marxist-Freudian) दृष्टि का पोस्टमार्टम करते हैं, तो प्रगतिशील लेखकों का असली षड्यंत्र बेनकाब होता है।
१. वैदिक और सनातनी पात्रों का राक्षस-निरूपण
उपन्यास की शुरुआत में ही यशपाल ने पात्रों का विभाजन मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष (Class War) के आधार पर कर दिया:
देवशर्मा (ब्राह्मण/धर्मगुरु): ढोंगी, कठोर, रूढ़िवादिता का पोषक और शोषक।
पृथुसेन (वैदिक कुलीन/योद्धा): कायर, परंपराओं का दास, और विपत्ति आते ही अपनी प्रेयसी (दिव्या) का त्याग करने वाला।
मारिश (चार्वाक/नास्तिक/वामपंथी प्रतीक): बुद्धिमान, व्यावहारिक, निर्भीक, और अंत में ‘दिव्या’ का असली रक्षक!
पोस्टमार्टम: यशपाल ने कुटिलतापूर्वक सनातन धर्म, वैदिक ऋषियों और कुलीन नायकों को अत्यंत पतित, कायर और रूढ़िवादी चित्रित किया। उनका स्पष्ट एजेंडा था—पाठक के मन में अपनी ही प्राचीन वैदिक विरासत के प्रति घृणा और हीनभावना (Inferiority Complex) पैदा करना।
२. ‘दिव्या’ का भटकाव और अमानवीकरण (Deconstruction of Womanhood)
दिव्या एक कुलीन, रूपवती और संभ्रांत आर्य कन्या है। लेकिन यशपाल उसे कहानी में एक ऐसे रास्ते पर ले जाते हैं जहाँ उसकी मर्यादा, पवित्रता और आत्मसम्मान की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं।
प्रोजेक्टेड प्लॉट: दिव्या गर्भवती होती है, घर से निकाली जाती है, दासी बनती है, वेश्यालय/गणिका गृह पहुँचती है, और अंत में कलावंती बनकर अपना शरीर बेचती है।
पोस्टमार्टम: यशपाल ने ‘स्त्री-मुक्ति’ के नाम पर दिव्या का इतना शारीरिक और मानसिक शोषण दिखाया कि अंततः वह समाज की हर नैतिक सीमा को तोड़ दे। मार्क्सवादी दर्शन यह मानता है कि जब तक पारिवारिक ढाँचा और नैतिक मूल्य नष्ट नहीं होंगे, तब तक ‘क्रांति’ नहीं हो सकती। यशपाल ने दिव्या को भारतीय नारी की गरिमा से गिराकर एक ‘मार्क्सवादी प्रयोग की वस्तु’ बना दिया।
३. बौद्ध धर्म का आवरण और मार्क्सवादी प्रहार
जब दिव्या थक-हारकर शांति की तलाश में बौद्ध संघ (भिक्षुणी बनने) जाती है, तो यशपाल वहाँ भी बौद्ध धर्म का उपहास उड़ाते हैं। वे संघ को भी अंततः स्त्रियों के लिए ‘शोषक’ और ‘दमनकारी’ सिद्ध कर देते हैं।
पोस्टमार्टम: यहाँ यशपाल का असली वामपंथी चेहरा दिखता है। उनके लिए न सनातन धर्म सही है, न बौद्ध धर्म। उनके लिए दुनिया की हर धार्मिक/सांस्कृतिक संस्था ‘शोषक’ है। वे साबित करना चाहते हैं कि धर्म केवल एक ‘अफीम’ है और मुक्ति केवल नास्तिक-भौतिकवादी विचारधारा में ही संभव है।
४. अंत का प्रायोजित संदेश: ‘मारिश’ (चार्वाक/नास्तिक) की जीत
उपन्यास के अंत में दिव्या के सामने तीन पुरुष खड़े होते हैं:
पृथुसेन (वैदिक परंपरा का प्रतीक) – जो उसे धर्म और कुल की मर्यादा का वास्ता देता है।
शर्मा (बौद्ध संघ का प्रतीक) – जो उसे संसार त्यागकर भिक्षुणी बनने को कहता है।
मारिश (नास्तिक/चार्वाक/वामपंथी प्रतीक) – जो कहता है कि “धर्म-अधर्म सब ढोंग है, शरीर और वासना ही सत्य है, आओ मेरे साथ गृहस्थी बसाओ।”
दिव्या अंत में मारिश (नास्तिक) का हाथ थाम लेती है!
पोस्टमार्टम: यही इस पूरे उपन्यास की प्रायोजित पटकथा (Projected Plot) का चरम बिंदु है। यशपाल ने ३०० पन्नों का प्रपंच केवल इसलिए रचा ताकि वे पाठक को यह समझा सकें कि धर्म, परंपरा, कुल-मर्यादा, ईश्वर और अध्यात्म सब बेकार हैं; अंतिम सत्य केवल भौतिकवाद (Materialism), नास्तिकता और वासना की तृप्ति है।
निष्कर्ष (The Bottom Line)
यशपाल का ‘दिव्या’ कोई ऐतिहासिक या प्रगतिशील उपन्यास नहीं है, बल्कि भारतीय मानस को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से काटने का एक ज़हरीला वैचारिक हथियार है।
उन्होंने ‘स्त्री-विमर्श’ का झुनझुना थमाकर:
१. वैदिक संस्कृति और ऋषियों का चरित्र-हनन किया।
२. भारतीय परिवार संस्था और विवाह के पवित्र ताने-बाने को ‘सामंती शोषण’ घोषित किया।
३. धर्म विहीन, ईश्वर विहीन, और मर्यादा विहीन नास्तिक समाज की वकालत की।
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