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प्रेमचंद की कहानी ‘कफ़न’: सामाजिक यथार्थ या मानवीय संवेदनाओं का आपराधिक विकृतीकरण?

 

​’कफ़न’ को प्रगतिशील आलोचकों द्वारा “अति-यथार्थवादी” (Extreme Realism) और “शोषित वर्ग की अमानवीकरण की त्रासदी” कहकर सराहा गया। परंतु जब इसके प्रोजेक्टेड प्लॉट, पात्रों के व्यवहार और अंतर्निहित संदेश की शल्य-चिकित्सा की जाती है, तो प्रगतिशील लेखकों की वही पुरानी चालाकी सामने आती है—भारतीय समाज, परिवार व्यवस्था और आत्मसम्मान को सर्वथा पतित (Degraded) और संवेदनहीन चित्रित करना।

 

​१. घीसू और माधव: चमार या कामचोर और क्रूर अमानुष?

​कथा सम्राट कहानी की शुरुआत में ही घीसू और माधव की मानसिकता को स्पष्ट कर देते हैं:

“दोनों इतने कामचोर थे कि दो-चार दिन काम करते तो आठ-दस दिन चिलम पीते… गाँव में उनके लिए कोई काम न था, लेकिन काम करने की नीयत भी तो न थी।”

विश्लेषण: यहाँ प्रेमचंद जिस वर्ग का प्रतिनिधित्व रच रहे हैं, उसे न केवल निर्धन बल्कि परम अलसी, कामचोर और क्रूर दिखाते हैं। जब झोपड़ी के भीतर बुधिया प्रसव-पीड़ा (Labor Pain) से तड़प रही है और चीख रही है, तब बाप-बेटे बाहर बैठकर आलू भूनकर खा रहे हैं।
प्रेमचंद लिखते हैं:

“माधव को डर था कि वह अंदर गया, तो घीसू आलू का बड़ा हिस्सा खा जाएगा।”

क्या यह किसी भी भारतीय ग्रामीण या समाज का स्वाभाविक यथार्थ है? प्रसव पीड़ा से तड़पती अपनी पत्नी को मरता छोड़कर आलू खाने का यह घृणित चरित्र-चित्रण केवल इसलिए गढ़ा गया ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि गरीबी मनुष्य को इतना राक्षस बना देती है कि उसमें पति और पिता का मानवीय गुण भी समाप्त हो जाता है। यह यथार्थवाद नहीं, बल्कि चरित्र का अमानवीकरण (Dehumanization) है।

 

२. कफ़न के पैसे और शराबखाने की प्रायोजित नौटंकी

​बुधिया मर जाती है। गाँव वाले दया करके चंदे के रूप में पाँच रुपये इकट्ठा करते हैं ताकि कफ़न खरीदा जा सके।

​प्रोजेक्टेड प्लॉट: घीसू और माधव बाज़ार कफ़न लेने जाते हैं, लेकिन कफ़न खरीदने के बजाय उन पैसों से शराब, पूरियाँ और कबाब उड़ाते हैं!

विश्लेषण: प्रेमचंद का तर्क यहाँ यह है कि “जो कफ़न लाश के साथ जल जाना है, उस पर पैसे क्यों बर्बाद करना?”
यह तर्क कितना भी दार्शनिक लगे, लेकिन व्यावहारिक और सामाजिक रूप से अत्यंत कुटिल है। दुनिया की किसी भी संस्कृति में अंत्येष्टि (Funeral) का एक पवित्र और सामाजिक महत्व होता है। लेकिन प्रेमचंद ने अपने ‘प्रोजेक्टेड प्लॉट’ के ज़रिए यह दिखाया कि शोषित वर्ग के मन में अपनी ही मृत पत्नी/बहु के प्रति रत्ती भर सम्मान नहीं है।

 

३. ‘मदिरालय’ में सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का उपहास

​शराबखाने में नशे में धुत होकर घीसू और माधव जो संवाद बोलते हैं, वही इस कहानी का मूल वैचारिक एजेंडा है:

​”उसने हमें ज़िंदगी में भर पेट खाने को न दिया, लेकिन मरने पर कफ़न दे गई… वह बैकुंठ न जाएगी, तो क्या ये मोटे-मोटे पेट वाले ज़मींदार जाएँगे?”

विश्लेषण: यहाँ प्रेमचंद का असली खेल शुरू होता है।
​बुधिया (जिसने पूरे घर का काम किया, जो तड़प-तड़प कर मर गई) को बैकुंठ भेजने का ठेका प्रेमचंद उस शराब के नशे में दिलाते हैं!

​पूरे समाज को (जो पाँच रुपये चंदा देता है) शोषक और निर्दयी बता दिया जाता है।

​शराबखोरी, कामचोरी और अपनी ही स्त्री के प्रति क्रूरता को ‘व्यवस्था का मारा होना’ कहकर सही ठहराने (Justify) की कोशिश की जाती है।

 

​४. प्रगतिशील लेखक संघ (PWA) का असली संदेश

​’कफ़न’ के माध्यम से प्रगतिशील लेखकों ने क्या संदेश दिया

पहला: निर्धन या शोषित वर्ग के पास कोई नैतिकता, धर्म, या पारिवारिक संवेदना नहीं होती। (जो कि भारतीय समाज के उस वर्ग के स्वाभिमानी यथार्थ का सरासर अपमान है)।

दूसरा: व्यवस्था इतनी सड़ चुकी है कि इसमें केवल अमानवीयता और अपराध ही पनप सकता है।

तीसरा: समाज की हर परंपरा (जैसे अंत्येष्टि या कफ़न) एक ढोंग है।

 

निष्कर्ष

​’कफ़न’ कहानी कोई संवेदना या करुणा जगाने वाली रचना नहीं है, बल्कि यह मनुष्यता के पतन का उत्सव है। प्रेमचंद ने इस कहानी में घीसू और माधव के माध्यम से भारतीय गरीब मानस के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गरिमा को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।

​जहाँ एक ओर भारतीय परंपरा में गरीबी के बावजूद मर्यादा और त्याग के उदाहरण भरे पड़े हैं, वहीं ‘कफ़न’ में शोषित वर्ग को इतना पतित और निर्लज्ज दिखाकर प्रगतिशील लेखकों ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि समाज की हर बीमारी का समाधान केवल ‘मार्क्सवादी क्रांति’ या ‘व्यवस्था-भंग’ ही हो सकता है।

 

 

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