बाबू गोकुलचन्द्र: काशी के दानवीर और हिंदी के अनन्य उपासक
भूमिका
धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में वर्ष १८५१ ई. में जन्में बाबू गोकुलचन्द्र का नाम उन विरल व्यक्तित्वों में गिना जाता है, जिन्होंने भारतीय पुनर्जागरण के दौर में विद्या और भाषा की सेवा को ही अपना धर्म माना। एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में जन्म लेने के बावजूद, उनकी आत्मा साहित्य और शिक्षा के उन्नयन में बसती थी।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के स्वप्न को मिला आर्थिक संबल
जब महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ की स्थापना का संकल्प लिया, तो उनके पास विज़न था लेकिन संसाधनों की चुनौती थी। ऐसे समय में बाबू गोकुलचन्द्र ने अपने कोष के द्वार खोल दिए।
उन्होंने विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए उस दौर में विशेष आर्थिक सहयोग प्रदान किया, जिससे महामना के इस महान संकल्प को धरातल पर आने में गति मिली।
उनका यह दान केवल धन का वितरण नहीं था, बल्कि आधुनिक भारत की नींव में शिक्षा के बीज बोने जैसा था।
हिंदी भाषा के उत्थान में योगदान
१९वीं सदी के उत्तरार्ध में जब हिंदी भाषा अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही थी, बाबू गोकुलचन्द्र ने निरंतर हिंदी साहित्य और भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए अपना समर्थन दिया।
वे मानते थे कि व्यापारिक समृद्धि तब तक अधूरी है जब तक कि समाज अपनी मातृभाषा और संस्कृति से समृद्ध न हो।
उन्होंने हिंदी लेखकों और पत्र-पत्रिकाओं को आर्थिक संबल प्रदान किया, ताकि हिंदी के ‘उत्थान’ का कार्य निर्बाध रूप से चलता रहे।
व्यापारी से विद्या-अनुरागी तक का सफर
आमतौर पर व्यापारिक घराने केवल मुनाफे तक सीमित रहते थे, लेकिन गोकुलचन्द्र जी ने एक नई मिसाल पेश की। काशी के समाज में उनका सम्मान केवल उनकी धन-संपदा के कारण नहीं, बल्कि उनके द्वारा किए गए विद्या-दान के कारण था। वे महामना मालवीय जी के उन विश्वसनीय सहयोगियों में से थे, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर राष्ट्र-निर्माण में अपनी आहुति दी।
प्रमुख बिंदु (Key Highlights)
जन्म: १८५१ ई., वाराणसी (काशी)।
विशेषता: BHU के प्रारंभिक आर्थिक सहयोगियों में से एक।
साहित्यिक प्रेम: हिंदी भाषा के विकास हेतु निरंतर धन-दान।
विरासत: शिक्षा और भाषा के प्रति समर्पण का भाव।
लेखक की विशेष टिप्पणी:
आज जब हम BHU की भव्यता को देखते हैं, तो हमें बाबू गोकुलचन्द्र जैसे उन दानवीरों को स्मरण करना चाहिए, जिन्होंने इसकी नींव में अपनी ईंटें लगाई थीं। काशी के इतिहास में उनका नाम एक ऐसे ‘भामाशाह’ के रूप में दर्ज है, जिन्होंने अपनी लेखनी और लक्ष्मी को देश की मिट्टी के नाम कर दिया।
— विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
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