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इतिहास के झरोखे से: फ़ातिमा शेख़ — भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षक और सामाजिक क्रांति की मशाल

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: विस्मृत इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय

​भारतीय नवजागरण और सामाजिक सुधारों के इतिहास में उन्नीसवीं सदी का कालखंड एक युगांतकारी मोड़ था। जब भी स्त्री शिक्षा और उत्पीड़ित वर्गों के उत्थान की बात होती है, तो महात्मा ज्योतिबा फुले और क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले का नाम आदर से लिया जाता है। परंतु, इस महान सामाजिक क्रांति के नेपथ्य में एक और ऐसा व्यक्तित्व खड़ा था, जिसके बिना आधुनिक भारत में स्त्री शिक्षा का यह ‘आलाप’ अधूरा रह जाता। वह नाम है—फ़ातिमा शेख़ का। आधुनिक भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षक के रूप में स्वीकृत फ़ातिमा शेख़ ने तत्कालीन समाज की रूढ़ियों, धार्मिक कट्टरता और जातिवाद की दीवारों को ढहाकर ज्ञान का जो दीप जलाया, उसकी लौ आज भी करोड़ों महिलाओं के जीवन को आलोकित कर रही है।

 

​जीवन परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

​फ़ातिमा शेख़ का जन्म ९ जनवरी, १८३१ को महाराष्ट्र के ऐतिहासिक शहर पुणे में हुआ था। वह अपने भाई उस्मान शेख़ के साथ गंज पेठ इलाके में रहती थीं। यह वह दौर था जब शूद्रों, अति-शूद्रों, दलितों और महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार पूरी तरह बंद थे।

​इसी कालखंड में (वर्ष १८४८ में) जब ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने निचली जातियों के लोगों और लड़कियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया, तो पुणे के सनातनी और ऊँची जाति के समाज में खलबली मच गई। विरोध इस कदर बढ़ा कि फुले दंपति की जाति, उनके परिवार और समाज के लोगों ने उनका हुक्का-पानी बंद कर दिया। अपनों द्वारा त्याग दिए जाने और घर से निकाल दिए जाने के बाद, जब इस क्रांतिकारी जोड़े के पास सिर छुपाने की जगह नहीं थी, तब उस्मान शेख़ और उनकी बहन फ़ातिमा शेख़ ने मानवता की एक नई मिसाल पेश की। उन्होंने न केवल फुले दंपति के लिए अपने घर के दरवाजे खोले, बल्कि उनके शैक्षिक स्वप्न को पूरा करने के लिए अपनी छत भी सौंप दी।

 

​’स्वदेशी पुस्तकालय’ और पहले विद्यालय की स्थापना

​शेख़ भाई-बहनों के इसी घर (पुणे के गंज पेठ) की छत के नीचे सन १८४८ में ‘स्वदेशी पुस्तकालय’ की स्थापना हुई, जो वास्तव में लड़कियों और वंचित तबके के लिए भारत के पहले स्कूलों में से एक बना।

​हाशिए के समाजों का समागम: इस परिसर में खुले स्कूल में सावित्रीबाई फुले और फ़ातिमा शेख़ ने मिलकर उन दलित और मुस्लिम महिलाओं और बच्चों को पढ़ाना शुरू किया, जिन्हें वर्ग, धर्म, जाति या लिंग के आधार पर तत्कालीन समाज ने शिक्षा के अधिकार से सर्वथा वंचित कर रखा था।

​अभूतपूर्व साहस: फ़ातिमा शेख़ केवल स्कूल में पढ़ाती ही नहीं थीं, बल्कि वे स्वयं झुग्गियों और घर-घर जाकर मुस्लिम समुदाय और दलित समाज के लोगों को समझाती थीं कि वे अपनी बेटियों और बच्चों को इस स्वदेशी पुस्तकालय में पढ़ने के लिए भेजें।

 

​भारी सामाजिक विरोध और बाधाओं पर विजय

​रूढ़िवादी समाज के लिए दो अलग-अलग धर्मों के लोगों का मिलकर दलितों और स्त्रियों को शिक्षित करना एक असहनीय कृत्य था। परिणामस्वरुप, फ़ातिमा शेख़ और सावित्रीबाई फुले को कदम-कदम पर भारी विरोध और अपमान का सामना करना पड़ा।

​धमकियाँ और बहिष्कार: स्थानीय ठेकेदारों द्वारा उन्हें लगातार धमकियाँ दी गईं। उनके परिवारों को भी सामाजिक रूप से प्रताड़ित किया गया। रूढ़िवादियों ने उनके सामने दो ही विकल्प रखे—या तो वे अपनी इन ‘असामाजिक’ गतिविधियों को तुरंत रोक दें, या फिर अपना घर छोड़ दें।

​दृढ़ संकल्प: फ़ातिमा शेख़ और उनके करीबियों ने झुकने के बजाय स्वाभिमान और संघर्ष की राह चुनी। उन्होंने स्पष्ट रूप से घर छोड़ने और प्रताड़ना सहने के विकल्प को स्वीकार किया, लेकिन शिक्षा के इस महायज्ञ में कोई रुकावट आने नहीं दी। तत्कालीन अभिलेखागारों के साक्ष्य बताते हैं कि इस पूरे संघर्ष में फ़ातिमा के भाई उस्मान शेख़ ने अपनी बहन को समाज में शिक्षा का प्रसार करने के लिए निरंतर प्रेरित और प्रोत्साहित किया।

 

​सावित्रीबाई फुले को संबल और सगुणाबाई का साथ

​पुणे की ऊँची जाति के प्रबल और हिंसक विरोध के सामने जब सगे संबंधी भी साथ छोड़ चुके थे, तब फ़ातिमा शेख़ एक चट्टान की तरह सावित्रीबाई फुले के साथ खड़ी रहीं।

​एकता और नेतृत्व: फ़ातिमा ने हर संभव तरीके से सावित्रीबाई का दृढ़ता से समर्थन किया। इन दोनों शिक्षिकाओं के साथ सगुणाबाई भी आ मिलीं, जो आगे चलकर इस शिक्षा आंदोलन की एक और महान स्तंभ बनीं। इन महिलाओं के आपसी सामंजस्य, त्याग और अटूट सहेलीपन ने भारत में स्त्री-मुक्ति आंदोलन की व्यावहारिक नींव रखी।

 

​निष्कर्ष: इतिहास का न्याय और प्रासंगिकता

फ़ातिमा शेख़ का योगदान केवल एक समुदाय विशेष तक सीमित नहीं था। वे आधुनिक भारत की ऐसी धर्मनिरपेक्ष और समतावादी चेतना की प्रतीक थीं, जिन्होंने ज्ञान को किसी सीमा में नहीं बांधा। उन्होंने शिक्षा को देश के हर वर्ग और अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचाने का जो जिम्मा उठाया था, वह आज भी हमारे समाज के लिए मार्गदर्शक है। इतिहास भले ही उनके प्रति अनुदार रहा हो, लेकिन आज जब भी भारत में स्त्री शिक्षा का इतिहास गौरव से पढ़ा जाएगा, फ़ातिमा शेख़ और सावित्रीबाई फुले का नाम एक ही सांस में, आदर के साथ लिया जाएगा।

 

सावित्रीबाई फुले

 

 

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