रंगमंच के पुरोधा और नयी कहानी के महानायक: मोहन राकेश का संपूर्ण साहित्यिक एवं जीवन विमर्श
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
प्रस्तावना: आधुनिक हिंदी नाट्य-क्षितिज का देदीप्यमान नक्षत्र
आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘नयी कहानी आंदोलन’ एक युगांतकारी मोड़ था, जिसने कहानी की पारंपरिक तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया। इस आंदोलन के शीर्ष त्रयी में कमलेश्वर और राजेंद्र यादव के साथ जिस तीसरे नाम को सर्वोपरि और ‘महानायक’ माना गया, वे थे—मोहन राकेश। मोहन राकेश न केवल कथा-शिल्प के उस्ताद थे, बल्कि वे आधुनिक हिंदी रंगमंच के वह अग्रदूत भी थे जिन्होंने साहित्य को दोबारा दृश्य-काव्य (थिएटर) के करीब ला दिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र और महाकवि जयशंकर प्रसाद के बाद यदि हिंदी नाट्य-साहित्य में कोई लीक से हटकर ऐसा नाम आता है जिसने अखिल भारतीय स्तर पर रंगमंच को विश्व-धारा से जोड़ा, तो वह निसंदेह मोहन राकेश का ही है।
जन्म, कठिन किशोरी काल और शिक्षा दीक्षा
मोहन राकेश का जन्म ८ जनवरी, १९२५ को पंजाब के ऐतिहासिक शहर अमृतसर में हुआ था। उनके पिता पेशे से एक प्रतिष्ठित वकील थे, जिनकी संगीत और साहित्य में गहरी पैठ थी। पिता की इसी साहित्यिक अभिरुचि के संस्कार बाल्यकाल में ही मोहन राकेश के मानस पटल पर अंकित हो गए।
परंतु, नियति ने शीघ्र ही परीक्षा ली और किशोरी अवस्था में ही उनके सिर से पिता का साया उठ गया। इस भीषण वज्रपात के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी शिक्षा की यात्रा को अनवरत जारी रखा। उन्होंने सर्वप्रथम लाहौर के प्रसिद्ध ‘ओरिएंटल कॉलेज’ से ‘शास्त्री’ की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात, उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी तथा अंग्रेजी, दोनों विषयों में एम.ए. (M.A.) की उच्च उपाधि प्राप्त की। अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने दिल्ली, जालंधर, शिमला और मुम्बई जैसे प्रमुख शहरों में अध्यापन (शिक्षण) का कार्य किया, जिसके साथ ही उनका झुकाव लघु कहानियों के लेखन की ओर तेजी से बढ़ा。
स्वतंत्र लेखन का संकल्प और जीविकोपार्जन
एक जन्मजात साहित्यकार का मन भला अध्यापन के पारंपरिक बंधनों में कब तक रमता! अपनी तीव्र साहित्यिक अभिरुचि के कारण उन्होंने शिक्षण कार्य से किनारा कर लिया। इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक अत्यंत प्रतिष्ठित पत्रिका ‘सारिका’ का संपादन भी किया। परंतु, संपादन के प्रशासनिक दायित्वों को भी अपने मूल लेखन में बाधा समझते हुए उन्होंने एक वर्ष के भीतर ही इस पद को भी त्याग दिया। इसके बाद जीवन के अंतिम क्षण तक उन्होंने केवल स्वतंत्र लेखन (Free-lance writing) को ही अपने जीविकोपार्जन और साधना का मुख्य साधन बनाए रखा।
कथा साहित्य: नयी कहानी आंदोलन के शीर्ष शिल्पी
मोहन राकेश का हिंदी साहित्य में प्रवेश सर्वप्रथम एक कहानीकार के रूप में हुआ था। उनकी कहानियों की विषय-वस्तु समाज की संवेदनशील अनुभूतियों और आधुनिक मनुष्य की नियति के अंतर्संबंधों से बुनी गई थी। उनकी भाषा में जहाँ गज़ब का सधाव था, वहीं एक शास्त्रीय अनुशासन और अद्भुत शिल्प-कौशल भी था।
कालजयी कहानियाँ: उनकी प्रसिद्ध कहानियों—’मिसपाल’, ‘आद्रा’, ‘ग्लासटैंक’, ‘जानवर’ और ‘मलबे का मालिक’ ने हिंदी कहानी के पूरे परिदृश्य को बदल दिया।
शहरी मध्य वर्ग का यथार्थ: कहानी से लेकर उपन्यास तक उनकी कथा-भूमि का मुख्य केंद्र ‘शहरी मध्य वर्ग’ का मानस और उसका द्वंद्व रहा।
विभाजन की विभीषिका: उनकी कुछ कालजयी कहानियों में भारत-विभाजन के उस दारुण दुख और मानवीय पीड़ा की अत्यंत सशक्त अभिव्यक्ति देखने को मिलती है।
नाट्य-लेखन: अँधेरे बंद कमरों से रंगमंच तक का मार्ग
कहानी के क्षेत्र में अद्वितीय कीर्तिमान स्थापित करने के बाद राकेश जी को नाट्य-लेखन में वह ऐतिहासिक सफलता मिली, जिसने उन्हें अमर बना दिया। लक्ष्मीनारायण, जगदीशचंद्र माथुर, उपेंद्रनाथ अश्क, लक्ष्मीनारायण लाल और धर्मवीर भारती जैसे पूर्ववर्ती प्रयोगधर्मी नाट्यकारों ने जिस आधुनिक भाव-बोध और विश्वजनीन चेतना (यथार्थवाद, प्रतीकवाद, एपिक थिएटर, असंगतवाद आदि) को आगे बढ़ाया था, उसका चरमोत्कर्ष मोहन राकेश के नाटकों में दिखाई देता है।
उन्होंने हिंदी नाटकों को युगों के रोमानी ऐंद्रजालिक सम्मोहन (Romantic Illusion) से उबारकर समकालीन भारतीय प्रवृत्तियों का द्योतक बनाया। यही कारण है कि देश के सबसे महान नाट्य निर्देशकों—इब्राहीम अलकाज़ी, ओम शिवपुरी, अरविंद गौड़, श्यामानंद जालान, रामगोपाल बजाज और दिनेश ठाकुर ने उनके नाटकों को अत्यंत चाव से बार-बार मंच पर उतारा।
’आषाढ़ का एक दिन’ (१९५८) — आधुनिक युग का प्रथम नाटक
सन १९५८ में प्रकाशित यह नाटक हिंदी नाट्य-साहित्य की सबसे बड़ी और युगांतकारी उपलब्धि माना जाता है। इसे आधुनिक युग का प्रथम आधुनिक नाटक होने का गौरव प्राप्त है।
कथानक और बिंब: महाकवि कालिदास के निजी जीवन पर केंद्रित इस त्रिखंडीय नाटक का शीर्षक कालिदास की अमर कृति ‘मेघदूतम्’ की शुरुआती पंक्तियों (वर्षा ऋतु का शुरुआती महीना) से प्रेरित है。
द्वंद्व की पराकाष्ठा: नाटक में सफलता-वैभव और निश्छल प्रेम के बीच झूलते एक रचनाकार के मन की पहेलियों को उकेरा गया है। वहीं दूसरी ओर, प्रेम में टूटकर भी अपनी पवित्रता को अक्षुण्ण रखने वाली इस नाटक की नायिका ‘मल्लिका’ के रूप में हिंदी साहित्य को एक शाश्वत और कभी न भूलने वाला योग्य पात्र मिला है।
पुरस्कार और सिनेमा: सन १९५९ में इसे सर्वश्रेष्ठ नाटक के लिए ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से नवाजा गया। बाद में सन १९७९ में महान निर्देशक मणि कौल ने इस पर एक फिल्म भी बनाई, जिसने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ‘फिल्मफेयर पुरस्कार’ जीता।
रंगमंच की अनूठी भाषा और अपूर्ण स्वप्न
मोहन राकेश पाश्चात्य नाट्य-शिल्प के अंधानुकरण के घोर विरोधी थे। वे अपने नाटक ‘आषाढ़ का एक दिन’ की भूमिका में स्पष्ट रूप से लिखते हैं:
”हिंदी रंगमंच को हिंदी भाषी प्रदेश की सांस्कृतिक पूर्तियों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करना होगा… हमारे दैनंदिन जीवन के रागरंग को प्रस्तुत करने के लिए हमारे संवेदों और स्पंदनों को अभिव्यक्त करने के लिए जिस रंगमंच की आवश्यकता है, वह पाश्चात्य रंगमंच से कहीं भिन्न होगा।”
वे नाटक की भाषा पर और अधिक गहरा शोध करना चाहते थे, जिसके लिए उन्हें प्रतिष्ठित ‘नेहरू फैलोशिप’ भी प्राप्त हुई थी। परंतु, विधि के विधान को कुछ और ही मंजूर था; असमय मृत्यु हो जाने के कारण उनका यह महत्वपूर्ण कार्य अधूरा ही रह गया।
प्रमुख कृतियाँ एवं साहित्य-संसार
मोहन राकेश की विपुल लेखनी ने साहित्य की लगभग हर विधा को समृद्ध किया:
उपन्यास: अँधेरे बंद कमरे, न आने वाला कल, अंतराल, बाकलमा खुदा।
नाटक: आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस (उनका सबसे विख्यात नाटक), आधे अधूरे।
कहानी संग्रह: क्वार्टर तथा अन्य कहानियाँ, पहचान तथा अन्य कहानियाँ, वारिस तथा अन्य कहानियाँ।
यात्रा-वृत्तांत व निबंध: आखिरी चट्टान तक (यात्रा-वृत्त), डायरी, परिवेश।
अनुवाद कार्य: मृच्छकटिकम्, शाकुंतलम् (संस्कृत से अनुवाद)।
सम्मान, पुरस्कार और अवसान
साहित्य जगत में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए वर्ष १९६८ में उन्हें ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। हिंदी साहित्य जगत को नए आयाम देने वाले और भाषा को एक शास्त्रीय अनुशासन देने वाले इस महान लेखक का ३ जनवरी, १९७२ को नई दिल्ली में आकस्मिक और असमय निधन हो गया। यद्यपि वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनकी रचनाओं का ‘आलाप’ और ‘लहरों के राजहंस’ की गूँज आज भी रंगमंच के आकाश पर उतनी ही जीवंत है।