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गोविन्द सखाराम सरदेसाई – शूट२पेन
February 29, 2024

मराठा इतिहास के लंबे अध्ययन का निचोड़ पुस्तक ‘न्यू हिस्टरी ऑव द मराठाज़’ और उसका हिंदी संस्करण, मराठों का नवीन इतिहास, यह ग्रंथ मराठा इतिहास की पुरानी और नवीन अध्ययन पद्धति के बीच की सबसे मजबूत कड़ी है। इस ग्रंथ के लेखक गोविन्द सखाराम सरदेसाई का जन्म १७ मई, १८६५ को कोंकण, तत्कालीन महाराष्ट्र के गोविल ग्राम में हुआ था। वह कर्हाड ब्राह्मण थे और इनके पितामह ने छत्रपति शिवाजी, पेशवा, प्रतिनिधि इत्यादि की सेवा की। बाद में आर्थिक स्थिति गिर जाने के कारण पिता सखाराम महादेव ने खेती की। गोविन्द सखाराम का बाल्यकाल काफी कठिनाई से बीता। शिक्षा, रत्नगिरि, फर्ग्युसन कालेज पूना और एलफिंस्टन कालेज बंबई, में प्राप्त की। वर्ष १८८८ में बीए की डिग्री प्राप्त करने के बाद बड़ौदा रियासत के महकमा खास में उनकी नियुक्ति हो गई और अगले ३७ वर्ष तक बड़ौदा राज्य की सेवा में रहे तथा जागीरदारों के लड़कों और महाराज कुमार को शिक्षा देने का कार्य भी करते रहे। १८९२ और १९११ के बीच वे सर सयाजीराव गायकवाड़ के साथ कई बार यूरोप गए। गोविंद सखाराम को पारिवारिक सुख न मिल सका। उनके दोनों प्रतिभाशाली पुत्र युवावस्था में ही तपेदिक के शिकार हो गए। वर्ष १९२५ में उन्होंने राज्य से मनमुटाव के कारण एक छोटी पेंशन पर अवकाश ग्रहण किया।

सरदेसाई को बाल्यकाल से ही इतिहास में रुचि थी। उन्होंने विविध विषयों पर पुस्तकें लिखी और मराठी में अनुवाद किया। १८९९ में मुसलमानी रियासत प्रकाशित की। तीन वर्ष बाद मराठी रियासत का प्रथम खंड छपा। यह रचना ९ खंडों में अगले तीस वर्षों में पूरी हुई और इसी बीच विविध खंडों के कई संशोधित खंड भी प्रकाशित हुए। यदुनाथ सरकार से उनका संपर्क १९०४ के प्रारंभ में हुआ और जो आजीवन मैत्री में परिणत हो गया। यदुनाथ सरकार से ऐतिहासिक विषयों पर उनका पत्रव्यवहार १९५८ में दो जिल्दों में प्रकाशित हुआ। अवकाश ग्रहण करने के बाद उनका सबसे महत्वपूर्ण कार्य पेशवा दफ्तर के अभिलेखों का ४५ जिल्दों में बंबई सरकार के तत्वावधान में प्रकाशन था। मराठी इतिहास के लिए और १८वीं शती के इतिहास के लिए यह ग्रंथ बहुमूल्य है, यद्यपि पैसों की तंगी अथवा सरकार की जल्दबाजी इत्यादि के कारण संपादकीय दृष्टि से इसमें बहुत सी त्रुटियाँ नजर आती हैं।

गोविन्द सखाराम सरदेसाई का मराठों के अर्वाचीन इतिहासकारों में अग्रणी स्थान है। उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन १९५७ में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

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