ज़ु ज़ु ज़ू ज़ु ज़ू ज़ु ज़ु ज़ु ज़ु ज़ू
यशोदा का नंदलाला बृज का उजाला है
मेरे लाल से तो सारा जग झिलमिलाए
ज़ु ज़ु ज़ू ज़ु ज़ू ज़ु ज़ु ज़ु ज़ु ज़ू

भगवान श्री कृष्ण के जन्मदिवस पर ये गाना तो बनता है, फिल्म थी संजोग जो १९८५ मे आई थी। इस फिल्म क़ो संगीत दिया था, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने, अर्थात…

लष्मीकांत शांताराम कुदलकर
और
प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा ।

इसी जोड़ी मे से एक प्यारेलाल रामप्रसाद शर्मा उर्फ
#प्यारेलाल का जन्म आज ही के दिन अर्थात,
#०३सितम्बर१९४० क़ो प्रसिद्ध बिगुल वादक पंडित रामप्रसाद शर्मा जी के यहां हुवा था। उन्होंने ही प्यारेलाल को संगीत की मूल बातें सिखाई थी।

जब उनके परिवार की वित्तीय स्थिति काफी खराब हो गयी तब उन्हें १२ वर्ष कि अल्प आयु में ही एक स्टूडियो में काम करना पड़ा। प्यारेलाल को परिवार के लिए पैसे कमाने के लिए रंजीत स्टूडियो एवं अन्य स्टूडियो में वायलिन बजाना पड़ता था।

राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है
दुख तो अपना साथी है
सुख है एक छाँव ढलती आती है जाती है
दुख तो अपना साथी है
राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है
दुख तो अपना साथी है

प्यारेलाल जी कहते हैं, “उन दिनों लक्ष्मीकांत ‘पंडित हुस्नलाल भगतराम’ के साथ काम करते थे, वो मुझसे ३ साल बड़े थे उम्र में, धीरे धीरे हम एक दूसरे के घर आने जाने लगे। साथ बजाते और कभी कभी क्रिकेट खेलते और संगीत पर लम्बी चर्चाएँ करते। हमारे शौक़ और सपने एक जैसे होने के कारण हम बहुत जल्दी अच्छे दोस्त बन गए।” “सी. रामचंद्र जी ने एक बार मुझे बुला कर कहा कि मैं तुम्हें एक बड़ा काम देने वाला हूँ। वो लक्ष्मी से पहले ही इस बारे में बात कर चुके थे। चेन्नई में हमने ढ़ाई साल साथ काम किया फ़िल्म थी “देवता” कलाकार थे जेमिनी गणेशन, वैजयंती माला, और सावित्री, जिसके हमें 6000 रुपए मिले थे। ये पहली बार था जब मैंने इतने पैसे एक साथ देखे। मैंने इन पैसों से अपने पिता के लिए एक सोने की अंगूठी ख़रीदी जिसकी कीमत 1200 रुपए थी।”

एक हमें आँख की लड़ाई मार गई
दूसरी तो यार की जुदाई मार गई
तीसरी हमेशा की तन्हाई मार गई
चौथी ये खुदा की खुदाई मार गई
बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई

मुश्किल हालातों मे भी उनके हौसले कभी कम नहीं हुवे, वे बहुत महत्त्वाकांक्षी थे, अपने संगीत के दम पर अपने लिए नाम कमाना और देश विदेश की यात्रा करना उनका सपना था।

चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है
चिट्ठी है वतन से चिट्ठी आयी है
बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद
वतन की मिट्टी आई है, चिट्ठी आई है …

लक्ष्मीकांत जी के साथ जोड़ी बन जाने के बाद, १९६३ से लेकर १९९८ तक उन लोगों ने ६३५ हिंदी फिल्मों के लिए संगीत रचना की और अपने समय के लगभग सभी उल्लेखनीय फिल्म निर्माताओं के लिए काम किया जिसमे सम्मिलित थे शोमैन राज कपूर साहब, सदाबहार देव आनंद साहब, बी.आर. चोपड़ा साहब , शक्ति सामंत जी, मनमोहन देसाई जी, यश चोपड़ा साहब, सुभाष घई जी और भारत भूषण मनोज कुमार साहब।

तो आइए प्यारेलाल जी के जन्म पर हम ये गाना गुनगुनाते हैं और खुशियाँ मनाते हैं….

सावन का महीना, पवन करे सोर
हां, जियरा रे झूमे ऐसे, जैसे बनमा नाचे मोर
हो सावन का महीना…
मौजवा करे क्या जाने, हमको इशारा
जाना कहाँ है पूछे, नदिया की धारा
मरज़ी है तुम्हारी, ले जाओ जिस ओर
जियरा रे झूमे ऐसे …

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