एकला चलो रे: जोड़ासाँको से शांतिनिकेतन तक जीवंत गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर
”जोदी तोर डाक सुने केउ ना आसे तोबे एकला चलो रे…”
(यदि तेरी पुकार सुनकर कोई न आए, तो तू अकेला चल पड़…)
यह केवल एक गीत की पंक्ति नहीं है, यह उस महाप्राण की जीवन-यात्रा का बीज-मंत्र है, जिसने अकेले ही भारतीय सांस्कृतिक आकाश को अपनी उंगलियों पर नचाया और पूरी दुनिया को ‘विश्व-भारती’ का वैश्विक संदेश दिया।
चेतना का प्रकटन: जोड़ासाँको का वह सुरीला आँगन
कोलकाता के सिंघी बगान और राजा कटरा के समीप, २६७ रवीन्द्र सरणी पर स्थित ‘जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी’ की प्राचीरों में आज भी एक नवजात शिशु की किलकारी गूंजती है। ७ मई १८६१ को महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर के ब्रह्म-समाजी और दार्शनिक आँगन में जब भानु (रवींद्र) का आगमन हुआ, तो किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह बालक सनातन धर्म के वैश्विक मर्म को अपनी लेखनी से पुनः जीवित करेगा।
बचपन से ही इस बालक की आँखें खिड़की के पार की प्रकृति को निहारती थीं। शब्द, छन्द और भाषा जैसे उनके भीतर जन्मजात मोती बनकर आए थे। महज़ आठ साल की उम्र में जब उन्होंने अपनी पहली कविता कागज़ पर उतारी, तो प्रकृति मुस्कुरा उठी। और फिर सन १८७७ में, केवल सोलह वर्ष की कच्ची उम्र में जब उनकी प्रथम लघुकथा प्रकाशित हुई, तो बांग्ला साहित्य को उसकी नई ‘चेतना’ मिल चुकी थी।
उपन्यासों का धरातल: समाज के अंतर्द्वंद्व का आधार
रवींद्र के साहित्य की रीढ़ उनके उपन्यास थे, जिन्होंने समाज के कठोर सच को अपनी कथा का आधार बनाया। जब वे ‘चोखेरबाली’ लिखते हैं, तो वे केवल एक कहानी नहीं गढ़ते, बल्कि मानव मन की ईर्ष्या, प्रेम और इच्छाओं के अंतर्द्वंद्व को जीवित कर देते हैं। उनके उपन्यास सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करते थे, मगर उनमें एक अद्भुत कोमलता होती थी। ‘गोरा’ और ‘घरे बाहिरे’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने राष्ट्रवाद और मानवता के बीच की उस बारीक लकीर को खींचा, जिसे आज भी पूरी दुनिया समझने की कोशिश कर रही है। उनके उपन्यास आलेख का आधार बनकर यह बताते हैं कि हाड़-मांस का मनुष्य ईश्वर की सबसे सुंदर और जटिल रचना है।
कविताओं के मोती और गीतों की कालजयी माला: ‘रवींद्रसंगीत’
टैगोर के सृजन संसार में कविताएँ बिखरे हुए मोती की तरह नहीं, बल्कि एक-दूसरे से गुंथे हुए दिव्य प्रकाश की तरह हैं। ‘गीतांजलि’, ‘पूरबी प्रवाहिनी’, ‘शिशु भोलानाथ’, ‘महुआ’, ‘वनवाणी’, ‘परिशेष’, ‘पुनश्च’, ‘वीथिका’ और जीवन के अंतिम पड़ाव पर लिखी गई ‘शेषलेखा’ जैसी कृतियों में उन्होंने देश-विदेश के सारे दर्शन और संस्कृति को आचमन करके अपने भीतर समेट लिया था। ‘कणिका’, ‘नैवेद्य’ और ‘क्षणिका’ की पंक्तियों में ईश्वर और मनुष्य का चिरस्थायी संपर्क अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आया।
और इन मोतियों को जब उन्होंने सुरों में पिरोया, तो जन्म हुआ ‘रवींद्रसंगीत’ का—जो आज बांग्ला संस्कृति का अमिट और अभिन्न अंग है। करीब २२३० गीतों की यह माला हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित है। अलग-अलग रागों में सजे ये गीत जब गूंजते हैं, तो ऐसा आभास होता है मानो वह राग विशेष सदियों से इसी गीत की प्रतीक्षा कर रहा था। यह उस प्रकृति प्रेमी की रूहानी ताकत ही थी, जिसने विश्व इतिहास में एकमात्र व्यक्ति बनकर दो देशों के राष्ट्रगान लिखे—भारत का ‘जन गण मन’ और बांग्लादेश का ‘आमार सोनार बांग्ला’।
कृत्य की रोशनी और व्यक्तित्व की आत्मा: शांतिनिकेतन की स्थापना
जब हम बोलपुर के समीप उस छोटे से शहर ‘शांतिनिकेतन’ में प्रवेश करते हैं, तो वहाँ की हवाओं में गुरुदेव के कृत्य की रोशनी और उनके व्यक्तित्व की आत्मा आज भी महसूस होती है। लाल माटी के उस वितान में उन्होंने ‘विश्व-भारती विश्वविद्यालय’ रूपी एक ऐसे गुरुकुल की स्थापना की, जहाँ ज्ञान किसी बंद कमरे का मोहताज नहीं था, बल्कि पेड़ों की छांव में प्रकृति के सानिध्य में फलता-फूलता था। यहीं बैठकर उन्होंने अपनी कालजयी कृतियों का सृजन किया, जहाँ कला, संगीत और रंगमंच (जैसे ‘मायेर खेला’) के माध्यम से युवा मानस को गढ़ा जाता था। उनका व्यक्तित्व इतना विराट था कि उन्होंने जीवन के अंतिम दिनों में जब कूची उठाई और चित्र बनाना शुरू किया, तो उसमें उस पूरे युग का संशय, मोह, क्लांति और निराशा के गहरे स्वर सजीव हो उठे।
महाप्रयाण: पुराने आलोक का गमन, नए का आगमन
समय का चक्र घूमा और ७ अगस्त १९४१ का वह उदास दिन करीब आने लगा। गुरुदेव अत्यंत बीमार थे। जब उन्हें उनके प्राणप्रिय शांतिनिकेतन से इलाज के लिए कोलकाता ले जाया जा रहा था, तब रास्ते में उनकी नातिन ने उनके गिरते स्वास्थ्य को देखकर, उनका ध्यान भटकाने के लिए धीमे से कहा, “दादू, आपको मालूम है? हमारे यहाँ अब एक नया पावर हाउस बन रहा है।”
इस पर उस युगदृष्टा, मृत्यु को पर्व मानने वाले मनीषी ने मंद मुस्कान के साथ जो उत्तर दिया, वह उनकी आत्मा की शाश्वत रौशनी को दिखाता है। उन्होंने कहा:
“हाँ… पुराना आलोक चला जाएगा और नए आलोक का आगमन होगा।”
निष्कर्ष: अमर आलोक
रबीन्द्रनाथ टैगोर शारीरिक रूप से उस नए पावर हाउस के बनने से पहले चले गए, लेकिन वे जिस ‘पुराने आलोक’ की बात कर रहे थे, वह कभी बुझ नहीं सकता। वे आज भी जोड़ासाँको की गलियों में, शांतिनिकेतन के पलाश के फूलों में, और हर उस राही के कंठ में जीवित हैं जो अंधेरी रातों में हिम्मत हारने पर खुद से कहता है—”तोबे एकला चलो रे…”
धन्यवाद!
नौका डूबी उपन्यास की संपूर्ण कहानी: गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का कालजयी सामाजिक दर्शन
भारत रत्न नानाजी देशमुख की जीवनी: सरस्वती शिशु मंदिर से लेकर सत्ता के त्याग की अमर कहानी