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जयंती (१८ जून ) पर विशेष
महान स्वतंत्रता-सेनानी,चिंतक और हिन्दीसेवी साँवलिया बिहारी लाल वर्मा

साँवलिया बिहारी लाल वर्मा: राष्ट्रभाषा के तपस्वी और मानवतावाद के अमर शिल्पी

​भारतीय स्वाधीनता संग्राम और हिंदी साहित्य के आकाश में साँवलिया बिहारी लाल वर्मा एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी चमक ने विधि, अर्थशास्त्र और अध्यात्म—तीनों क्षेत्रों को समान रूप से आलोकित किया। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्था थे। बिहार के निर्माताओं की अग्रिम पंक्ति में खड़े साँवलिया जी ने अपनी मेधा को विदेशी विलासिता के चरणों में न्योछावर करने के बजाय अपनी मातृभूमि और ‘माई की बोली’ की सेवा में समर्पित कर दिया।

 

जन्म एवं सुसंस्कृत परिवेश

​साँवलिया जी का जन्म 18 जून, 1896 को बिहार के सारण जिले (छपरा) के एक अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रज्ञावान परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री मथुरा प्रसाद, देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद के सगे मामा थे। इस प्रकार साँवलिया जी को बचपन से ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद और बाबू सच्चिदानंद सिन्हा जैसे महान व्यक्तित्वों का सान्निध्य और प्रेरणा प्राप्त हुई।

 

मेधा और स्वाभिमान का संगम

​उनकी प्रारंभिक शिक्षा छपरा, मोतिहारी और मुज़फ़्फ़रपुर में हुई। मुज़फ़्फ़रपुर के ‘भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज’ में उन्हें आचार्य जे.बी. कृपलानी का मार्गदर्शन मिला। वर्ष 1920 में उन्होंने पटना कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्वर्ण पदक के साथ स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। उनकी प्रतिभा से अभिभूत होकर अंग्रेज़ प्राचार्य एच.ए. हॉर्न उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजना चाहते थे, किंतु देशप्रेम की भावना से ओत-प्रोत साँवलिया जी ने इस प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया कि उनकी बुद्धि और सेवाएँ केवल भारत के लिए हैं।

 

​हिंदी का अपमान और ऐतिहासिक त्याग-पत्र

​वर्ष 1921 में वे पटना कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुए। साहित्य के प्रति उनका अनुराग ऐसा था कि मात्र 21 वर्ष की आयु में उनका ग्रंथ ‘यूरोपीय महाभारत’ प्रकाशित हो चुका था। 1923 में जब उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन के अधिवेशन में जाने के लिए अवकाश माँगा, तो प्रशासन ने इसे ‘अनुपयोगी कार्य’ मानकर अस्वीकार कर दिया। स्वाभिमानी साँवलिया जी ने इसे स्वयं का नहीं, बल्कि ‘हिंदी का अपमान’ माना और तत्काल अपना त्याग-पत्र सौंप दिया। यह घटना हिंदी के प्रति उनके अटूट समर्पण का प्रमाण है।

 

​साहित्यिक सृजन और विचार दर्शन

​छपरा और बाद में सीतामढ़ी को अपना कार्यक्षेत्र बनाते हुए उन्होंने ‘गद्य चंद्रिका’ और ‘गद्य चंद्रोदय’ जैसी कृतियों से हिंदी गद्य को नई ऊँचाइयाँ दीं। 1927 के सोनपुर अधिवेशन में उन्होंने हिंदी और उर्दू के भाषायी विवाद पर जो तार्किक मत रखा, वह आज भी प्रासंगिक है: “भाषा की पहचान उसकी क्रियाओं और सर्वनामों से होती है, शब्दों के आगमन से नहीं; अतः उर्दू हिंदी की ही एक शैली है।”

 

आध्यात्मिक एवं मानवतावादी दृष्टि

​स्वतंत्रता के पश्चात उनका झुकाव वैदिक साहित्य और महर्षि अरविंद के दर्शन की ओर हुआ। उन्होंने ‘इस्लाम की झाँकी’, ‘विश्व धर्म-दर्शन’ और ‘गीता-विश्वकोश’ जैसे ग्रंथों की रचना की। उनके द्वारा 40 उपनिषदों पर लिखा गया भाष्य उनकी दार्शनिक गहराई को दर्शाता है। उन्होंने सीतामढ़ी के डुमरा में ‘गीता-भवन’ की स्थापना की, जो आज भी एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उनकी स्मृति को संजोए हुए है।

 

अंतिम समय और विरासत

​84 वर्ष की दीर्घायु तक राष्ट्र और साहित्य की सेवा करते हुए 29 दिसंबर, 1979 को इस मनीषी का अवसान हुआ। उनके द्वारा स्थापित ‘गीता-भवन’ आज भी निर्धन विद्यार्थियों का आश्रय और ज्ञान का केंद्र बना हुआ है।

 

अश्विनी राय ‘अरुण’ की भावांजलि

​”साँवलिया बिहारी लाल वर्मा जी का जीवन हमें सिखाता है कि पद और प्रतिष्ठा से बड़ा राष्ट्रभाषा का गौरव होता है। वे एक ऐसे ‘ऋषि’ थे जिन्होंने वकालत की तार्किकता और अध्यात्म की तरलता को एक सूत्र में पिरो दिया था। बिहार की इस विभूति को शत-शत नमन।”

 

 

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