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डॉ. जगदीश व्योम: लोक-संस्कृति के संरक्षक और हाइकु के शिखर पुरुष

 

भूमिका

साहित्य के आकाश में डॉ. जगदीश व्योम एक ऐसे देदीप्यमान कवि, कथाकार और संपादक हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी से न केवल ब्रज और कन्नौजी लोक-संस्कृति को सहेजा है, बल्कि हिंदी काव्य जगत में ‘हाइकु’ जैसी सूक्ष्म विधा को नई ऊंचाइयां भी प्रदान की हैं। १ मई, १९६० को उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद जिले के ‘शंभूनगला’ ग्राम में जन्मे डॉ. व्योम का जीवन साहित्य की साधना को समर्पित रहा है।

भोर का स्वर,

जागा सारा संसार,

स्वप्न सुंदर।

हाइकु जगत के ‘दर्पण’: संपादन और अवदान

डॉ. जगदीश व्योम का नाम ‘हिंदी हाइकु’ के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे प्रतिष्ठित पत्रिका ‘हाइकु दर्पण’ के संस्थापक संपादक हैं। उनके संपादन में हाइकु न केवल अपनी शिल्पगत शुद्धता (५-७-५ वर्ण) के साथ उभरा, बल्कि उसमें भारतीय परिवेश की सोंधी महक भी समाहित हुई।

शब्दों के दीप,

जलाती है लेखनी,

मिटे अंधेरा।

 

लोक-साहित्य का अन्वेषण (Research & Folk)

एक शोधार्थी के रूप में डॉ. व्योम का कार्य मील का पत्थर है। उन्होंने कन्नौजी लोकगाथाओं और लोकोक्तियों पर जो गहन शोध किया है, वह विलुप्त होती भाषाई विरासत को बचाने का एक महायज्ञ है। उनके ‘मुहावरा कोश’ ने लोक-भाषा को अकादमिक गरिमा प्रदान की है।

अपनी मिट्टी,

महकती साँसों में,

जुड़ा है मन।

 

बाल साहित्य: भविष्य की पीढ़ी का निर्माण

डॉ. व्योम का हृदय बच्चों जैसा कोमल और पारदर्शी है। ‘नन्हा बलिदानी’ और ‘डब्बू की डिबिया’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने भावी पीढ़ी को वीरता और नैतिकता के पाठ पढ़ाए हैं। वे बच्चों के लिए केवल लिखते नहीं, बल्कि उनके साथ एक संवाद स्थापित करते हैं।

नन्हे से हाथ,

पकड़े है किताब,

खिले भविष्य।

 

प्रमुख कृतियाँ: एक विस्तृत दृष्टि

डॉ. व्योम की रचनाधर्मिता बहुआयामी है। इंद्रधनुष के रंगों से लेकर भोर के स्वर तक, उनकी कृतियाँ मानवीय संवेदनाओं का कोलाज पेश करती हैं।

काव्य संग्रह : इंद्रधनुष, भोर के स्वर

शोध ग्रंथ : कन्नौजी लोकगाथा सर्वेक्षण, कन्नौजी मुहावरा कोश

बाल साहित्य : नन्हा बलिदानी, सगुनी का सपना

लेखनी बोले,

मन की जो पीड़ा है,

काव्य में ढले।

 

सम्मान और उपलब्धियाँ

‘प्रकाशिनी हिंदी निधि’ से लेकर ‘बाल उपन्यास’ हेतु प्राप्त पाँच राष्ट्रीय पुरस्कारों तक, डॉ. व्योम की यात्रा उपलब्धियों से भरी है। आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों से उनकी वार्ताओं का प्रसारण उन्हें जन-जन का प्रिय साहित्यकार बनाता है।

मिला सम्मान,

झुका और भी मन,

बढ़ा दायित्व।

 

लेखक की विशेष टिप्पणी

अश्विनी राय ‘अरुण’ के शब्दों में, डॉ. जगदीश व्योम का साहित्य ‘जड़ों से जुड़कर आसमां छूने’ की निरंतर प्रक्रिया है। वे कन्नौजी लोक के रक्षक भी हैं और आधुनिक काव्य विधाओं के पथ-प्रदर्शक भी।

साहित्य साधना,

जीवन का ध्येय है,

यही आराधना।

 

— विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

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