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गीतों के कबीर शैलेन्द्र: सादगी की ओट में गहरा दर्शन और लोक-संवेदना का अमर साधक

 

​”सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है। न हाथी है न घोड़ा है, वहाँ पैदल ही जाना है॥”

अदभुत सादगी और कबीर जैसी फकीरी मिज़ाज वाले हिंदी व भोजपुरी सिनेमा के उस महानतम गीतकार की कहानी, जिसने गरीबी और आम भारतीय की संवेदना को वैश्विक पहचान दी।

​आज के इस भागदौड़ भरे दौर में जब तकनीक के माध्यम से हमें सुबह-सुबह किसी महान विभूति की याद आती है, तो मन अतीत के गलियारों में लौट जाता है। ३० अगस्त की ऐसी ही एक सुबह जब मोबाइल के झरोखे से पता चला कि आज गीतकार शंकरदास केसरीलाल यानी हमारे प्रिय ‘शैलेन्द्र’ जी का जन्मदिन है, तो बचपन की यादें ताज़ा हो गईं। हम सबने बचपन में रेडियो पर उनके लिखे गीतों को न जाने कितनी बार गुनगुनाया है।

​शैलेन्द्र जी हिंदी फिल्मों के साथ-साथ भोजपुरी सिनेमा के भी एक युग-प्रवर्तक गीतकार थे। उनका जन्म ३० अगस्त १९३० (कुछ दस्तावेज़ों में वर्ष १९२३ भी उल्लेखित है) को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान) में हुआ था। आशावादी रुझान के इस महान शिल्पी ने जीवन से लबालब भरे अनेकों ऐसे गीत लिखे हैं, जो आज भी हताशा के क्षणों में हमें जीने की नई प्रेरणा देते हैं। उनके लिखे कालजयी गीतों की ऐसी लंबी फ़ेहरिस्त है कि किसे सर्वश्रेष्ठ माना जाए और किसे नहीं, यह तय करना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है।

 

गुलज़ार की दृष्टि: सतह के नीचे छिपे गहरे अर्थ

​शैलेन्द्र जी के लेखन की गहराई के बारे में आज के दौर के महान शायर और निर्देशक गुलज़ार साहब बहुत बड़ी बात लिखते हैं:

​”बिना शक, शंकर शैलेन्द्र को हिंदी सिनेमा का आज तक का सबसे बड़ा लिरिसिस्ट (गीतकार) कहा जा सकता है। उनके गीतों को खुरच कर देखें, तो आपको सतह के नीचे दबे बिल्कुल नए अर्थ प्राप्त होंगे। उनके एक ही सीधे-सादे गीत में न जाने कितने गहरे दार्शनिक अर्थ छिपे होते थे।”

​यही कारण था कि जब वे सिनेमा के परदे पर लिखते थे:

​”दुनिया बनाने वाले, क्या तेरे मन में समाई।

काहे को दुनिया बनाई, तूने काहे को दुनिया बनाई॥”

​तो वह केवल एक फिल्मी गाना नहीं रह जाता था, बल्कि ईश्वर की रचना पर आम इंसान का एक मासूम सा सवाल बन जाता था।

 

पहली फिल्म ‘बरसात’ और शंकर-जयकिशन का ऐतिहासिक संयोग

​शैलेन्द्र मूलतः एक क्रांतिकारी कवि थे जो रेलवे में नौकरी करते थे और मुशायरों में ‘जलता है पंजाब’ जैसी प्रगतिशील कविताएं पढ़ते थे। उनकी प्रतिभा को सबसे पहले ‘शो-मैन’ राजकपूर ने पहचाना। गीतकार के रूप में उन्होंने अपना पहला गीत राजकपूर की सदाबहार फिल्म ‘बरसात’ (१९४९) के लिए लिखा था, जिसके बोल थे—‘बरसात में तुमसे मिले हम सजन, तुमसे मिले हम सजन…’

​इसे भारतीय सिनेमा का एक अद्भुत संयोग ही कहा जाएगा कि इसी फिल्म ‘बरसात’ से बतौर संगीतकार अमर जोड़ी शंकर-जयकिशन ने भी अपने सुनहरे करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद राजकपूर, शैलेन्द्र और शंकर-जयकिशन की ऐसी त्रिमूर्ति बनी जिसने ‘आवारा’, ‘श्री ४२०’, ‘अनाड़ी’ और ‘गाइड’ जैसी फिल्मों से दुनिया भर में धूम मचा दी।

 

​जावेद अख्तर का वक्तव्य: कबीर, मीरा और उत्तर भारत के लोक की सादगी

​आज के प्रख्यात गीतकार और संवाद लेखक जावेद अख्तर साहब शैलेन्द्र जी के हुनर को याद करते हुए कहते हैं:

​”शैलेन्द्र एक सच्चे जीनियस थे। दरअसल, उनका सीधा रिश्ता संत कबीर और मीराबाई की परंपरा से बनता है। बहुत बड़ी और दार्शनिक बात को बेहद सादगी से कह देने का जो हुनर शैलेन्द्र में था, वो किसी और में नहीं था। यहाँ तक कि ‘ग़म दिए मुस्तक़िल’ से लेकर ‘आज मैं ऊपर आसमां नीचे’ जैसे बेमिसाल गाने लिखने वाले मज़रूह सुल्तानपुरी साहब ने एक बार खुद मुझसे कहा था कि—’जावेद, सच पूछो तो सही मायनों में असली गीतकार सिर्फ शैलेन्द्र ही हैं।’ शैलेन्द्र का जुड़ाव उत्तर भारत के लोक-गीतों से था। लोक-गीतों में जो सहज सादगी और अथाह गहराई होती है, वही शैलेन्द्र के गीतों की आत्मा थी। फिल्म ‘तीसरी कसम’ की ये पंक्तियाँ—‘तूने तो सबको राह दिखाई, तू अपनी मंज़िल क्यों भूला, औरों की उलझन सुलझा के राजा क्यों कच्चे धागों में झूला… क्यों नाचे सपेरा’—अगर ऐसी लाइन्स मैं अपने पूरे जीवन में कभी लिख पाऊँ, तो मैं इत्मीनान से जीऊँगा।”

 

​संवेदना के शिखर: अनाड़ीपन की ओट में हिंदुस्तानी दिल

​सरल, सटीक और आम बोलचाल के शब्दों में मानवीय भावनाओं और गहरी संवेदनाओं को अभिव्यक्त कर देना शैलेन्द्र जी की सबसे बड़ी विशेषता थी।

“किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार।

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार, जीना इसी का नाम है॥”

​’किसी के आँसुओं में मुस्कुराने’ या ‘किसी का दर्द उधार लेने’ जैसा निश्छल विचार केवल शैलेन्द्र जैसे संवेदनशील और विशाल हृदय वाले कवि के मन में ही आ सकता था। उनकी भावुकता और विरह की संवेदना का एक और बेजोड़ उदाहरण देखिए, जहाँ वे विदाई के गीत में भी रूहानी महक छोड़ जाते हैं:

“कल तेरे सपने पराये भी होंगे, लेकिन झलक मेरी आँखों में होगी।

फूलों की डोली में होगी तू रुख़सत, लेकिन महक मेरी साँसों में होगी…”

​फिल्मों में सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने और अपार लोकप्रियता पाने के बाद भी उनका ज़मीन से जुड़ाव और फकीराना जज़्बा हमेशा बना रहा। इसी कारण वे एक आम और गरीब भारतीय की अस्मिता तथा उसके स्वाभिमान को दुनिया के सामने इन अमर शब्दों में बयां कर सके:

​”मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंग्लिस्तानी।

सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी…”

 

​निष्कर्ष: अमर बोलों के अमर शिल्पी को नमन

​१४ दिसंबर १९६६ को अपनी ही फिल्म ‘तीसरी कसम’ के सदमे और असीम संवेदनशीलता के कारण यह महान गीतकार असमय ही दुनिया छोड़ गया, लेकिन उनके लिखे गीत आज आधी सदी बाद भी हर धड़कते हुए दिल का सहारा हैं।

​लेखक विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ हिंदी और भोजपुरी सिनेमा के इस गौरव, संवेदना के अमर चितेरे और शब्दों के सच्चे जादूगर पंडित शैलेन्द्र जी के चरणों में अपना कोटि-कोटि वंदन और सादर भावांजलि अर्पित करता है।

​धन्यवाद!

 

 

 

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