April 4, 2025

फिल्म: द वैक्सीन वॉर
लेखक और निर्देशक: विवेक अग्निहोत्री
निर्माता: पल्लवी जोशी और अभिषेक अग्रवाल
कलाकार: नाना पाटेकर, पल्लवी जोशी, रायमा सेन, निवेदिता भट्टाचार्य, सप्तमी गौड़ा और गिरिजा ओक
रिलीज: २८ सितंबर २०२३
रेटिंग: ३.५/५

पूरी दुनिया जब कोरोना के खिलाफ जंग में लगी हुई थी, तो भारत ने कैसे कोरोना वैक्सीन बनाकर इस जंग को जीता, विवेक अग्निहोत्री ने तीन साइंटिस्ट के जरिए इतनी खूबसूरती से इस बात को कहा है कि कभी आप इमोशनल होंगे, तो कभी आप गर्व से भर उठेंगे, तो कभी आप स्याह सच के सामने खड़े होंगे और वो सच यह है कि चीन के वुहान लैब से निकले कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में तबाही मचाई थी।

परिचय…

कोराना महामारी की पहली लहर से कहीं ज्यादा दूसरी लहर के दौरान कई दिल दहला देने वाले मंजर सामने आए थे। उस समय हर किसी को एक वैक्‍सीन की दरकार थी, लेकिन वैक्‍सीन बनाना कोई खेल नहीं होता, इसे बनाने में वर्षों लगते हैं। इन परिस्थितियों में भारत ने अपनी वैक्‍सीन बनाने का फैसला लिया। विवेक रंजन अग्निहोत्री निर्देशित द वैक्सीन वॉर उन फ्रंटलाइन वर्कर्स और वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों को दर्शाती है, जिन्होंने भारत की स्वदेशी वैक्सीन को बनाने के लिए रात-दिन एक कर दिया। यह फिल्‍म खास तौर पर महिला वैज्ञानिकों की जिजीविषा, संघर्ष और अंततः सफलता का वर्णन करती है, जिनका मानना था कि भारत भी अपना स्वयं का टीका बना सकता है और विदेशी संगठनों पर निर्भर नहीं रह सकता।

इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के महानिर्देशक बलराम द्वारा लिखी किताब गोइंग वायरल: मेकिंग आफ कोवैक्‍सीन आत्‍मनिर्भर भारत की कहानी बयां करती है। यह फिल्‍म इसी किताब पर आधारित है।

कहानी…

वैसे तो हर कोई इस कहानी से भली भांति वाकिफ है। फिर भी यह एक फिल्म है तो लगातार प्रोपेगैंडा फिल्म का टैग झेल रही विवेक अग्निहोत्री की यह फिल्म क्या वाकई किसी मंशा से बनाई गई है? इसे जान लेते हैं। १२ अध्यायों में बंटी है फिल्म।

फिल्म की शुरुआत एक जनवरी, २०२० से होती है जब निमोनिया जैसे लक्षण पैदा करने वाले वायरस की खबरें सुर्खियों में आती हैं। १२ अध्यायों में विभाजित यह फिल्‍म प्रत्येक चुनौती को एक-एक करके दर्शाती है कि कैसे वैज्ञानिकों की टीम उन पर काबू पाने और विजयी होने में कामयाब होती है।

अपनी राय…

विवेक अग्निहोत्री ने ‘द वैक्सीन वार’ को मेडिकल थ्रिलर के रूप में बनाया है। मध्यांतर से पहले का हिस्‍सा वैज्ञानिकों की जिंदगी को दर्शाता है। तमाम मुश्किलों के बावजूद सख्‍त और काम के प्रति समर्पित बलराम भार्गव समस्‍या को सुनने के बजाय उसके हल में विश्‍वास रखते हैं। फिल्‍म में कोवैक्सीन के चरण-दर-चरण निर्माण को दर्शाया गया है जिसे भारत बायोटेक द्वारा आईसीएमआर और नेशनल वायरोलाजी इंस्टीट्यूट (एनआईवी) के सहयोग से विकसित किया गया था। इस दौरान प्रयोगशालाओं के अंदर वैज्ञानिकों की निराशा, उत्‍साह और घरेलू दिक्‍कतों को भी विवेक छूते हैं, मगर उनका मुख्य फोकस वैक्सीन बनाने पर ही है। हालांकि, फिल्म का पहला हिस्‍सा स्‍थापित करने में विवेक ने काफी समय लिया है। चुस्‍त एडिटिंग से दो घंटे ४० मिनट की इस फिल्‍म को छोटा किया जा सकता था। लम्बी होने के बावजूद फिल्‍म ने कोरोना महामारी के मानवीय त्रासदी का चित्रण समुचित तरीके से नहीं किया है। यही थोड़ा सा खल रहा था। बस इसे अखबारों की कटिंग में दिखाया है, जो कुछ हद तक सही भी है क्योंकि हमने तो इस त्रासदी को बस मीडिया के माध्यम से ही जाना था। हम घरों में बंद थे।

इंटरवल के बाद धीमी हुई रफ्तार…

मध्यांतर के बाद कहानी पर अपनी पकड़ खो देती है ऐसा नहीं कहा जा सकता मगर फिल्म डॉक्यूमेंट्री की तरफ झुकती सी लगती है। यह फिल्‍म मीडिया ट्रायल के आसपास आ जाती है। फिल्‍म में मीडिया को ‘विदेशी शक्तियों’ की कठपुतली बताया गया है, यह कहना गलत होगा। यहां सिर्फ एक एजेंसी का नाम लिया गया है, ’द डेली वायर’। हां अगर द डेली वायर के न्यूज को सच मानकर जो एजेंसियां न्यूज बनाती हैं उन्हें तो यह फिल्म पचने वाली नहीं है क्योंकि कोर्ट ने द वायर को भारत बायोटेक और कोवैक्सिन के खिलाफ १४ लेख हटाने का आदेश दिया, और कोई मानहानिकारक रिपोर्ट प्रकाशित नहीं करने का आदेश दिया है, यह दिखाया गया है।

विदेशी वैक्‍सीन को बढ़ावा देने और मौजूदा फार्मा लॉबिंग के लिए मीडिया संस्‍थानों को भेजे गए टूलकिट को बेनकाब करने का विवेक का प्रयास भी सराहनीय है।

फिल्म देखने पर साफ पता चलता है कि द डेली वायर ने वैक्सीन और इसे बनाने के लिए समर्पित वैज्ञानिकों को कमजोर करने का अपना लक्ष्‍य बना लिया है। फिल्‍म में ‘द डेली वायर’ को लेकर कहा गया है कि यह केवल गलत सूचनाएं फैलाता है। विवेक की हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी।

फिल्‍म में प्रयोगशालाओं में चूहों और बंदरों के परीक्षणों को करीब से दर्शाया गया है। हालांकि, रिसर्च को लेकर कोई कौतूहल पैदा करने की कोशिश नहीं हुई है। डा. बलराम भार्गव (डीजी-आईसीएमआर) के रूप में नाना पाटेकर अपनी भूमिका में जंचते हैं। वैक्‍सीन बनाने की दूरदृष्टि और उसे लेकर उनका समर्पण भार्गव के प्रति सम्‍मान जगाता है। निदेशक-एनआईवी डा. प्रिया अब्राहम की भूमिका में पल्लवी जोशी का अभिनय सराहनीय हैं। गिरिजा ओक और निवेदिता भट्टाचार्या किरदार में अपना प्रभाव छोड़ती हैं। पत्रकार बनीं रोहिणी सिंह धूलिया का किरदार समुचित तरीके से गढ़ा गया है या नहीं कहा नहीं जा सकता। और फिर फिल्म के अंत में बताया गया है कि भारत ने विदेशी वैक्‍सीन को क्‍यों मान्‍यता नहीं दी। यह बात जानकारी युक्‍त है।

रेटिंग कटने का कारण…

१. आधा अंक कटा चीन के वुहान लैब के षड़यंत्र की जानकारी को अधूरा छोड़ने पर।
२. आधा अंक कटा कोविड के भयावहता को बस छू कर निकल जाने पर।
३. आधा अंक कटा, वैक्सिन के बदले भारत के साथ विदेशी व्यापारियों के मोल भाव के काले चेहरे को ना दिखाने पर।

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