गदर का महानायक: कर्तार सिंह सराभा और भगत सिंह की प्रेरणा का अमिट इतिहास
”साढ़े उन्नीस साल की अलहड़ उम्र, जब युवा अपने भविष्य के सपने बुनते हैं, उस उम्र में एक नौजवान देश की आज़ादी के लिए हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लेता है। यह शौर्य-गाथा है गदर आंदोलन के लोकनायक कर्तार सिंह सराभा की, जिन्हें अमर शहीद भगत सिंह अपना आदर्श और गुरु मानते थे।”
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में २४ मई का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। इसी दिन माँ भारती के वीर सपूत कर्तार सिंह सराभा का जन्म हुआ था। वे एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने अपने प्रखर व्यक्तित्व, अद्वितीय साहस और सर्वोच्च बलिदान से देश के युवाओं में देशभक्ति की वह अलख जगाई, जो आगे चलकर भगत सिंह जैसे महानायकों की वैचारिक ऊर्जा बनी। भगत सिंह, सराभा को अपना आदर्श मानते थे, उनकी तस्वीर हमेशा अपनी जेब में रखते थे और अकेले में अक्सर सराभा की प्रिय गज़ल गुनगुनाया करते थे।
सराभा गाँव से अमेरिका-प्रवास तक का सफ़र
कर्तार सिंह का जन्म २४ मई १८९६ को पंजाब के लुधियाना ज़िले के ऐतिहासिक गाँव ‘सराभा’ में माता साहिब कौर की कोख से हुआ था। लुधियाना शहर से करीब पंद्रह मील दूर स्थित यह गाँव करीब तीन सौ वर्ष पुराना है। बचपन में ही पिता मंगल सिंह के निधन के बाद कर्तार सिंह और उनकी छोटी बहन धन्न कौर का पालन-पोषण उनके दादा बदन सिंह ने किया। उनके तीन चाचा—बिशन सिंह, वीर सिंह व बख्शीश सिंह—ऊंचे सरकारी पदों पर कार्यरत थे।
अपनी प्रारंभिक शिक्षा लुधियाना में पूरी करने के बाद वे अपने चाचा के पास ओडिशा चले गए, जो उस समय बंगाल प्रांत का हिस्सा था और राजनीतिक रूप से अत्यधिक सचेत क्षेत्र था। वहाँ सराभा के भीतर देश और दुनिया की समझ विकसित हुई। दसवीं कक्षा पास करने के बाद, उच्च शिक्षा के लिए उनके परिवार ने उन्हें अमेरिका भेजने का निर्णय लिया। १ जनवरी १९१२ को, महज़ पंद्रह वर्ष की अल्पायु में, सराभा ने अमेरिका की धरती पर कदम रखा।
राष्ट्रीय अस्मिता का जागरण
अमेरिका में कदम रखते ही सान फ्रांसिस्को की बंदरगाह पर आव्रजन अधिकारी (Immigration Officer) के सवालों का तर्कपूर्ण उत्तर देकर उन्होंने बर्कले विश्वविद्यालय में दाखिला तो ले लिया, जहाँ वे रसायन शास्त्र (Chemistry) के विद्यार्थी बने। लेकिन अमेरिका के दो-तीन महीनों के प्रवास में जगह-जगह गोरों द्वारा भारतीयों को मिले अनादर ने सराभा की सुषुप्त चेतना को जगा दिया। जब उनकी मकानमालिक अमेरिकी बुजुर्ग महिला ने अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस पर घर को फूलों और वीर नायकों के चित्रों से सजाया, तो सराभा के मन में यह तड़प पैदा हुई कि—”हमारे देश भारत की आज़ादी का भी ऐसा एक दिन होना चाहिए।”
बर्कले विश्वविद्यालय और ‘गदर’ का शंखनाद
उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी के आरंभ में ब्रिटिश औपनिवेशिक शोषण और उत्पीड़न के कारण पंजाब के किसान और मध्यवर्गीय छात्र कनाडा और अमेरिका की ओर रुख कर रहे थे। वहाँ भारतीयों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव के खिलाफ सेंट तेजा सिंह और बाबा ज्वाला सिंह ठट्ठीआं जैसे लोग संघर्ष कर रहे थे। बाबा ज्वाला सिंह ने भारतीय छात्रों को छात्रवृत्तियाँ भी दी थीं।
बर्कले विश्वविद्यालय के पंजाबी हॉस्टल में रहते हुए कर्तार सिंह सराभा दिसंबर १९१२ में महान विचारक लाला हरदयाल और भाई परमानंद के संपर्क में आए। लाला हरदयाल के जोशीले भाषणों और व्यक्तिगत संवाद ने सराभा के भीतर देशभक्ति की तीव्र अग्नि प्रज्वलित कर दी।
वैश्विक पटल पर आज़ादी की अलख
यह वह दौर था जब विदेशों में बैठे भारतीय स्वतंत्रता की मांग उठा रहे थे:
तारकनाथ दास ने ‘फ्री हिंदुस्तान’ पत्र निकाला, तो गुरुदत्त कुमार ने कनाडा में ‘यूनाइटेड इंडिया लीग’ बनाई।
इंग्लैंड और पेरिस से श्यामजी कृष्ण वर्मा, सरदार सिंह राणा और मैडम भीकाजी कामा सक्रिय थीं, जिन्होंने १९०७ में स्टटगार्ट (जर्मनी) में पहली बार भारत का झंडा फहराया।
जर्मनी में वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय और चंपक रमण पिल्लै सक्रिय थे, तो इंग्लैंड में वीर सावरकर ने ‘अभिनव भारत’ की स्थापना की थी, जिनसे प्रेरित होकर मदन लाल ढींगरा ने १९०९ में कर्ज़न वायली की हत्या कर शहादत पाई।
१९१५ का सशस्त्र गदर: एक धर्मनिरपेक्ष महासंग्राम
अमेरिका की स्वतंत्र धरती से प्रेरित होकर, १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को सम्मान देने के लिए अमेरिका में बसे देशभक्तों ने १९१३ में ‘गदर पार्टी’ की स्थापना की और अपने मुखपत्र का नाम भी ‘गदर’ रखा, जो पंजाबी, हिंदी, उर्दू और गुजराती में निकलता था।
इस सशस्त्र क्रांति के लिए लगभग आठ हज़ार भारतीय अमेरिका और कनाडा जैसी सुख-सुविधाओं भरी ज़िंदगी छोड़कर समुद्री जहाजों से भारत पहुँचे। १९ फ़रवरी १९१५ को भारत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक व्यापक सशस्त्र विद्रोह (गदर) की योजना बनाई गई थी। हालांकि गद्दारों की मुखबिरी के कारण यह योजना सफल नहीं हो सकी, लेकिन इसने अंग्रेज़ी शासन की चूलें हिला दीं।
यह आंदोलन सही मायनों में पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष था, जिसमें सभी धर्मों और समुदायों के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। बंगाल से रास बिहारी बोस और शचीन्द्रनाथ सान्याल, महाराष्ट्र से विष्णु गणेश पिंगले, दक्षिण भारत से डॉ. चेन्चय्या और भोपाल से बरकतुल्ला ने इसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप दिया।
लाहौर जेल और हँसते-हँसते शहादत
विद्रोह की असफलता के बाद चले मुकदमों में २०० से अधिक लोग शहीद हुए और सैकड़ों को काले पानी की सज़ा हुई। १६ नवंबर १९१५ को, महज़ साढ़े उन्नीस साल के कर्तार सिंह सराभा को उनके छह अन्य साथियों के साथ लाहौर जेल में फाँसी दे दी गई। ये साथी थे:
१. बख्शीश सिंह (ज़िला अमृतसर)
२. हरनाम सिंह (ज़िला स्यालकोट)
३. जगत सिंह (ज़िला लाहौर)
४. सुरैण सिंह (ज़िला अमृतसर – गाँव गिलवाली)
५. सुरैण सिंह द्वितीय (ज़िला अमृतसर – गाँव गिलवाली)
६. विष्णु गणेश पिंगले (ज़िला पूना, महाराष्ट्र)
अदालत में जब न्यायाधीश ने सराभा को उनका बयान हल्का करने का मौका दिया ताकि उनकी जान बच सके, तो इस वीर नायक ने अपना बयान और सख्त कर दिया। फाँसी की सज़ा सुनकर खुशी में उनका वज़न बढ़ गया और वे हँसते-हँसते फंदे पर झूल गए।
भगत सिंह के चिंतन और ‘नौजवान भारत सभा’ के महानायक
विद्रोह असफल रहा, लेकिन गदर पार्टी का अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ। आगे चलकर १९२५-२६ में जब पंजाब के युवाओं के बीच वैचारिक क्रांति की शुरुआत हुई, जिसके नायक भगत सिंह बने, तो वे गदर पार्टी की परंपरा और कर्तार सिंह सराभा से गहरे प्रभावित थे।
भगत सिंह ने अपनी संस्था ‘नौजवान भारत सभा’ के माध्यम से सराभा के जीवन और उनके क्रांतिकारी संघर्ष को स्लाइड शो (मैजिक लालटेन) द्वारा पंजाब के कोने-कोने में युवाओं को दिखाया। सभा की हर जनसभा में मंच पर कर्तार सिंह सराभा के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करना अनिवार्य था। सराभा ने महज़ दो-तीन साल के राजनीतिक जीवन में राष्ट्र-चेतना की ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि वे आने वाली कई पीढ़ियों के मार्गदर्शक बन गए।
निष्कर्ष: कोटि-कोटि वंदन
२४ मई को उनके जन्मदिन के इस पावन अवसर पर, इतिहास के इस स्वर्णिम पृष्ठ को याद करते हुए, लेखक विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ भारत माता के इस अनमोल, निर्भीक और महान वीर नायक कर्तार सिंह सराभा के चरणों में अपना कोटि-कोटि वंदन निवेदिता करता है। तुम्हारा यह बलिदान और तुम्हारी राष्ट्रभक्ति देश के मानस में सदा अमर रहेगी।
धन्यवाद!
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