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इतिहास को बदलने वाला इतिहासकार: वीर सावरकर और ‘१८५७ के स्वातंत्र्य समर’ की अनकही गाथा

 

​”जिस पुस्तक को जनमानस तक पहुँचने से पहले ही गोरी हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया, उसी पुस्तक ने आज़ाद हिंद फ़ौज और भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों की पिस्तौल में बारूद भरने का काम किया। यह महागाथा है वीर सावरकर और उनकी कालजयी कृति की।”

​भारतीय इतिहास के आकाश पर विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसा नाम है, जिसे समझे बिना भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अधूरा ही रहेगा। उनका जन्म २८ मई १८८३ को महाराष्ट्र के नासिक जिले के अंतर्गत आने वाले छोटे से गाँव ‘भगूर’ में हुआ था। सावरकर केवल एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे इतिहासकार थे जिन्होंने इतिहास को केवल लिखा नहीं, बल्कि इतिहास की दिशा को बदल दिया।

​इसका सबसे बड़ा साक्ष्य है उनकी अमर पुस्तक—”१८५७ का स्वातंत्र्य समर”। इस ग्रंथ में उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत द्वारा प्रचारित तथाकथित ‘सिपाही विद्रोह’ का ऐसा सनसनीखेज, तथ्यपरक और खोजपूर्ण इतिहास लिखा कि गोरी सरकार के सिंहासन के पाए हिल गए। यह दुनिया की संभवतः पहली ऐसी पुस्तक है, जिसे इसके प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबंधित होने का अनूठा और गौरवशाली इतिहास प्राप्त है।

 

इतिहास की खोज: छह ज्वलंत प्रश्न और ‘इंडिया ऑफिस’ का शोध

​सावरकर से पूर्व अधिकांश ब्रिटिश और कुछ दरबारी इतिहासकारों ने १८५७ की महान क्रांति को महज़ एक ‘सिपाही विद्रोह’ या अधिक से अधिक एक स्थानीय भारतीय गदर कहा था। दूसरी ओर, भारतीय विश्लेषक भी इसे तब तक एक तात्कालिक असंतोष मान रहे थे। लेकिन सावरकर के मन में इस पुस्तक को लिखने से पूर्व छह ऐसे ज्वलंत प्रश्न थे, जिनके उत्तर ढूँढ़ने की परिणति ही यह कालजयी पुस्तक बनी:

​१. सन् १८५७ का यथार्थ क्या है?

२. क्या वह मात्र एक आकस्मिक और मामूली सिपाही विद्रोह था?

३. क्या उसके नेता अपने तुच्छ स्वार्थों और रियासतों की रक्षा के लिए अलग-अलग इस विद्रोह में कूद पड़े थे, या यह किसी बड़े लक्ष्य (स्वधर्म और स्वराज्य) की प्राप्ति के लिए एक सुनियोजित प्रयास था?

४. इस महासंग्राम की गुप्त योजना का वास्तविक स्वरूप क्या था?

५. क्या सन् १८५७ एक बीता हुआ बंद अध्याय है या भविष्य की क्रांतियों के लिए एक प्रेरणादायी जीवंत यात्रा?

६. भारत की भावी पीढ़ियों के लिए १८५७ का वास्तविक संदेश क्या है?

​इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए सावरकर ने लंदन के ‘इंडिया ऑफिस पुस्तकालय’ (India Office Library) में कई महीनों तक दिन-रात एक करके गहन अध्ययन किया। उन्होंने मूल प्रति को मराठी में लिखकर साल १९०८ में पूर्ण किया।

 

​हॉलैंड से भारत तक: पुस्तक के सफ़र की रोमांचक दास्तान

​चूँकि उस समय इस पुस्तक का भारत में मुद्रण होना सर्वथा असंभव था, इसकी मूल पांडुलिपि को ब्रिटेन से बाहर भेजना पड़ा। ब्रिटिश खुफिया तंत्र के डर से इसका मुद्रण इंग्लैंड और जर्मनी में भी असफल रहा। अंततः, इंडिया हाउस में रह रहे कुछ देशभक्त छात्रों ने इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया और साल १९०९ में यह पुस्तक हॉलैंड (नेदरलैंड्स) में गुप्त रूप से मुद्रित हुई, जिसका शीर्षक था—’द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस – १८५७’।

 

इस पुस्तक का सफ़र किसी रहस्यमयी फिल्म की तरह रोमांचक है:

​क्रांतिकारियों की गीता: इसका दूसरा संस्करण गदर पार्टी की ओर से लाला हरदयाल ने अमेरिका में निकाला। इसका तीसरा संस्करण महान शहीद सरदार भगत सिंह ने अपनी संस्था की ओर से छपवाया, और चौथा संस्करण नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सुदूर-पूर्व (साउथ-ईस्ट एशिया) में आज़ाद हिंद फ़ौज के सैनिकों के लिए निकाला।

४० वर्षों की गुप्त साधना: इसकी मूल पांडुलिपि पेरिस में महान क्रांतिकारी मैडम भीकाजी कामा के पास सुरक्षित थी। प्रथम विश्वयुद्ध के संकट के दौरान इसे ‘अभिनव भारत’ के डॉ. क्युतिन्हो को सौंपा गया, जिन्होंने इसे किसी पवित्र धार्मिक ग्रंथ की भाँति ४० वर्षों तक छिपाकर सुरक्षित रखा। स्वतंत्रता के उपरांत उन्होंने इसे रामलाल वाजपेयी और डॉ. मूंजे के माध्यम से सावरकर को लौटाया। इस पुस्तक पर लगा प्रतिबंध अंततः मई १९४६ में बॉम्बे सरकार द्वारा हटाया गया।

 

​आज़ाद हिंद फ़ौज से गदर आंदोलन तक की प्रेरणा

​एक तरफ जहाँ ब्रिटिश सरकार इस पुस्तक पर प्रतिबंध लगा रही थी, वहीं दूसरी तरफ पूरा विश्व और भारत के क्रांतिकारी इसके एक-एक पन्ने के इंतजार में बैठे थे। इस महान रचना ने १९१४ के गदर आंदोलन से लेकर १९४३-४५ की आज़ाद हिंद फ़ौज तक, कम से कम दो पीढ़ियों को मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की प्रेरणा दी।

​मुंबई की ‘फ्री हिंदुस्तान’ साप्ताहिक पत्रिका ने मई १९४६ में जब ‘सावरकर विशेषांक’ प्रकाशित किया, तब प्रसिद्ध नेता के.एफ. नरीमन ने अपने लेख में खुलकर स्वीकार किया था कि—”आज़ाद हिंद फ़ौज की कल्पना और विशेषकर ‘रानी झाँसी रेजिमेंट’ के नामकरण की मूल प्रेरणा सन् १८५७ की महान क्रांति पर लिखी वीर सावरकर की इसी ज़ब्तशुदा रचना में साक्षात दिखाई देती है।”

​उसी अंक में ‘वेजवाडा की गोष्ठी’ पत्रिका के संपादक जी.वी. सुब्बाराव ने लिखा: “यदि सावरकर ने १८५७ और १९४३ के बीच (वैचारिक) हस्तक्षेप न किया होता, तो मुझे पूरा विश्वास है कि ‘गदर’ शब्द का अर्थ ही बदल गया होता। यहाँ तक कि अब ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड वावेल भी इसे एक मामूली गदर कहने का साहस नहीं कर सकता। इस मानसिक और ऐतिहासिक परिवर्तन का पूरा श्रेय सावरकर और केवल सावरकर को ही जाता है।”

 

स्वतंत्रता के बाद का यक्ष प्रश्न: जेल और शक का साया

​यहाँ इतिहास का सबसे दर्दनाक और कड़वा मोड़ आता है। जिस व्यक्ति ने अपनी जवानी के बहुमूल्य दशक अंडमान की सेल्युलर जेल (काला पानी) की अमानवीय यातनाओं में काट दिए, जिसने देश को ‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’ जैसा राष्ट्रीय विज़न दिया; यदि वे एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे, तो आज़ादी के बाद भी उन्हें अपने ही देश की सरकार द्वारा महज़ एक ‘शक’ के आधार पर जेल में क्यों डाल दिया गया? यह एक ऐसा ऐतिहासिक प्रश्न है, जिसके पन्ने आज भी पूरी तरह खुलने बाकी हैं, और इतिहास की अदालत में इस पर विमर्श चलता रहेगा।

 

​निष्कर्ष: राष्ट्र-चेतना के अमर सेनानी

​विचारधाराओं के मतभेद और राजनीतिक चश्मे अपनी जगह हो सकते हैं, लेकिन तथ्यों और इतिहास के साक्ष्यों के आलोक में वीर सावरकर एक ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी और इतिहासकार थे, जो राष्ट्र के मानस में सदा अमर रहेंगे। इतिहास का यह स्वर्णिम पन्ना आने वाली पीढ़ियों को हमेशा यह याद दिलाता रहेगा कि आज़ादी की कीमत क्या थी। लेखक विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’ भारत माता के इस अनमोल और जुझारू पूत के चरणों में अपना कोटि-कोटि वंदन निवेदित करता है।

​धन्यवाद!

 

 

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