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छायावाद की प्राण-प्रतिष्ठात्री महादेवी वर्मा: भाषा, दर्शन और गद्य का अनूठा वैभव

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: छायावाद के चतुष्टय का चतुर्थ महनीय स्तंभ

​हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा को छायावाद का सुदृढ़ स्तंभ माना जाता है। यदि प्रसाद ने इस काव्य-आंदोलन को विराट प्रकृतितत्त्व दिया, निराला ने उसमें मुक्तछंद की क्रांतिकारी अवतारणा की और पंत ने उसे सुकोमल कलात्मकता प्रदान की, तो छायावाद के उस पूरे कलेवर में अपनी गहन अनुभूतियों से प्राण-प्रतिष्ठा करने का गौरव अकेले महादेवी वर्मा जी को ही प्राप्त है। हृदय की सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाव-हिलोरों का ऐसा सजीव, मूर्त और कारुणिक अभिव्यंजन ही उन्हें छायावादी कवियों के बीच वास्तविक अर्थों में ‘महादेवी’ बनाता है।

 

​जन्म, आज़ाद ख्याल परिवार और काव्य-जीवन का उदय

​श्रीमती महादेवी वर्मा जी का जन्म २६ मई, १९०७ को प्रातः ८ बजे उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद शहर में हुआ था। वह एक ऐसा दौर था जब समाज में बेटियों को बोझ माना जाता था, परंतु महादेवी जी का यह परम सौभाग्य था कि उनका जन्म एक अत्यंत उदार और आज़ाद ख्याल परिवार में हुआ। उनके दादाजी उन्हें विदुषी बनाना चाहते थे, तो वहीं उनकी माताजी संस्कृत और हिंदी की प्रकांड ज्ञाता होने के साथ-साथ गहरी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। माँ ने ही बचपन में महादेवी जी को कविता लिखने और उच्च साहित्य में रुचि लेने के लिए भीतर से प्रेरित किया था। उनके बचपन के संस्मरण “मेरे बचपन के दिन” में इस पारिवारिक पृष्ठभूमि का अत्यंत सुंदर और सजीव वर्णन मिलता है।

​महादेवी जी की मेधा बचपन से ही विलक्षण थी। जब उन्होंने आठवीं कक्षा में पूरे प्रांत (स्टेट) में प्रथम स्थान प्राप्त किया, तब अपने खाली वक्त को रचनात्मक रूप से गुजारने के लिए उन्होंने कलम को अपना सच्चा साथी बनाया। यही वह निर्णायक मोड़ था जहाँ से उनके ऐतिहासिक काव्य-जीवन की शुरुआत हुई। वे मात्र सात वर्ष की अल्पायु से ही कविताएँ रचने लगी थीं। सन १९२५ तक, जब उन्होंने अपनी मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की, वे एक सफल और स्थापित कवयित्री के रूप में देश भर में प्रसिद्ध हो चुकी थीं। देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताओं का नियमित प्रकाशन होने लगा था।

​क्रॉस्थवेट कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही उनकी घनिष्ठ मित्रता सुप्रसिद्ध कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान से हुई, जो महादेवी जी की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें हाथ पकड़कर अपनी सखियों के बीच ले जातीं और गर्व से कहतीं—“सुनो, ये कविता भी लिखती हैं!” आगे चलकर जब महादेवी जी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत भाषा में एम॰ए॰ की उपाधि प्राप्त की, तब तक उनके दो अमर कविता संग्रह ‘नीहार’ तथा ‘रश्मि’ प्रकाशित होकर हिंदी जगत् में तहलका मचा चुके थे।

 

​भाषा, दर्शन और साहित्य में युगांतरकारी अवदान

​साहित्य के मंच पर महादेवी वर्मा का आविर्भाव उस संधि-काल में हुआ था जब खड़ीबोली का स्वरूप परिष्कृत और संस्कारित हो रहा था। उन्होंने अपनी लेखनी से खड़ीबोली की हिंदी कविता को ब्रजभाषा जैसी तरलता और कोमलता प्रदान की। छंदों के नए दौर को उन्होंने अपने गीतों का अटूट भंडार दिया और भारतीय दर्शन (विशेषकर बौद्ध दर्शन और वेदांत) को वेदना की हार्दिक व रूहानी स्वीकृति दी। इस प्रकार उन्होंने भाषा, साहित्य और दर्शन—तीनों ही क्षेत्रों में ऐसा युगांतरकारी कार्य किया, जिसने आने वाली कई पीढ़ियों के रचनाकारों को गहराई से प्रभावित किया।

​प्रसिद्ध आलोचक शचीरानी गुर्टू ने भी महादेवी जी की कविता को सुसज्जित और परिमार्जित भाषा का सबसे अनुपम उदाहरण स्वीकार किया है। महादेवी जी ने अपने गीतों की रचना शैली और भाषा में एक अनोखी गत्यात्मक लय और सहज सरलता भरी है। इसके साथ ही, उनकी कविताओं में प्रतीकों और बिंबों का ऐसा स्वाभाविक व सटीक प्रयोग मिलता है, जो पाठक के मानस-पटल पर शब्दों के माध्यम से एक जीवंत चित्र खींच देता है। भावात्मकता एवं अनुभूति की सघनता उनके संपूर्ण काव्य की सर्वाधिक प्रमुख विशेषता है।

 

​गद्य साहित्य का उत्कृष्ट शिखर और सामाजिक चेतना

​यह हिंदी साहित्य का एक अत्यंत विस्मयकारी और अनूठा तथ्य है कि महादेवी जी ने अपने पूरे जीवन में कोई परंपरागत उपन्यास, कहानी या नाटक नहीं लिखा; तथापि उनके द्वारा लिखे गए संस्मरण, रेखाचित्र, निबंध, आलोचनात्मक भूमिकाओं और ललित निबंधों में जो गद्य सामने आया, वह आधुनिक हिंदी साहित्य में श्रेष्ठतम गद्य का सबसे उत्कृष्ट पैमाना है। उनके गद्य में जीवन का संपूर्ण वैविध्य, यथार्थ और धड़कनें समाई हुई हैं। बिना किसी काल्पनिक ताने-बाने या काव्यरूपों का सहारा लिए एक रचनाकार केवल गद्य के बल पर वैचारिक रूप से कितना कुछ अर्जित कर सकता है, यह महादेवी जी के रेखाचित्रों को पढ़कर ही समझा जा सकता है।

​उनके गद्य में जो वैचारिक परिपक्वता और तर्कशीलता है, वह आज के आधुनिक समय में भी उतनी ही प्रासंगिक है। समाज सुधार और नारी स्वतंत्रता से संबंधित उनके विचारों में अद्भुत दृढ़ता और क्रमिक विकास का अनुपम सामंजस्य दिखाई देता है। सामाजिक जीवन की विसंगतियों को भेदने वाली इतनी गहरी और तीखी दृष्टि, नारी जीवन के वैषम्य, रूढ़ियों और शोषण को पूरी तार्किकता से आंकने वाली जागरूक प्रतिभा, तथा समाज के सबसे निचले वर्ग के निरीह, साधनहीन, उपेक्षित प्राणियों (जैसे घीसा, रामा, बदलू आदि) के ऐसे मर्मस्पर्शी और अनूठे रेखाचित्र हिंदी साहित्य को पहली बार अकेले महादेवी वर्मा ने ही प्रदान किए।

 

​एक अनूठा और अज्ञात रूप: सृजनात्मक अनुवादक (सप्तपर्णा)

​एक कालजयी मौलिक रचनाकार होने के अतिरिक्त महादेवी जी का एक अत्यंत गरिमामयी रूप एक ‘सृजनात्मक अनुवादक’ का भी है, जिसके दिव्य दर्शन उनकी अनूठी अनुवाद-कृति ‘सप्तपर्णा’ में होते हैं। अपनी गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना के बल पर उन्होंने भारतीय मनीषा के मूल स्रोतों—वेद, रामायण, थेरगाथा तथा महाकवि अश्वघोष, कालिदास, भवभूति एवं जयदेव की अमर कृतियों से एक अगाध वैचारिक तारतम्य स्थापित किया। उन्होंने इन महान ग्रंथों से ३९ चयनित महत्वपूर्ण अंशों का अत्यंत काव्यात्मक और रसात्मक हिंदी अनुवाद इस कृति में प्रस्तुत किया है।

​इस पुस्तक के आरंभ में लिखी गई उनकी ६१ पृष्ठों की विस्तृत भूमिका—‘अपनी बात’—भारतीय मनीषा, दर्शन और साहित्यायन की अमूल्य धरोहर है। इस भूमिका में उन्होंने जो गहन, शोधपूर्ण और तार्किक विमर्श किया है, वह न केवल स्त्री-लेखन की सीमाओं को तोड़ता है, बल्कि हिंदी के समग्र चिंतनपरक, दार्शनिक और ललित लेखन को एक नई वैचारिक समृद्धि प्रदान करता है।

 

​ओजस्वी वक्ता और वैश्विक मंच पर नेतृत्व

​कवित्व और गद्य-लेखन के साथ-साथ महादेवी जी अपनी प्रखर और ओजस्वी वक्तृत्व कला के लिए भी हिंदी समाज में अत्यंत सम्मान के साथ याद की जाती हैं। उनके भाषण जन-सामान्य के प्रति गहरी मानवीय संवेदना और सत्य के प्रति एक अटूट दृढ़ता से परिपूर्ण होते थे। जब वे बोलती थीं, तो उनकी भाषा की गरिमा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देती थी। सन १९८३ में दिल्ली में आयोजित ‘तीसरे विश्व हिंदी सम्मेलन’ के समापन समारोह में वे मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुई थीं। इस वैश्विक ऐतिहासिक अवसर पर दिया गया उनका विद्वतापूर्ण भाषण उनके इसी अद्भुत वक्तृत्व गुण, राष्ट्रभाषा के प्रति उनकी चिंता और वैश्विक दृष्टि का एक ज्वलंत प्रमाण है।

 

​उपसंहार: आधुनिक युग की मीरा

​वेदनामयी गीतों की अमर साधिका और गद्य की प्रखर शिल्पी महादेवी वर्मा का संपूर्ण जीवन और साहित्य इस बात का साक्ष्य है कि नारी हृदय की करुणा जब बौद्धिक दृढ़ता से मिलती है, तो वह युगप्रवर्तक बन जाती है। भाषा को परिमार्जन, दर्शन को आत्मिक स्वीकृति और समाज के वंचितों को साहित्य के केंद्र में प्रतिष्ठित करने वाली महादेवी जी हिंदी वांग्मय में सदैव एक मार्गदर्शक प्रकाश-स्तंभ के रूप में जाज्वल्यमान रहेंगी।

 

 

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

 

 

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