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हिसाब ‘राम-भरोसे’

 

अयोध्या है प्रभु राम की,

और मंदिर भी उन्हीं का है।

कण-कण में गूँजता नाम,

केवल उस घनश्याम का है।

 

चंदे की ऐसी नदी बही,

कि आया था बड़ा सैलाब।

पर गायब है अचानक ही,

कई सौ करोड़ का हिसाब!

 

दो सौ करोड़ की माया का,

कैसा यह खेल रचाया है?

जो आई तो थी भक्तों से,

पर ‘राम-भरोसे’ खाया है।

 

रुपए भी हैं प्रभु राम के,

और भक्त भी राम के।

फिर ये गायब करने वाले,

चोर हैं किस काम के?

 

बैठे हैं हर एक कोने पर,

जब पहरेदार बड़े नामी।

फिर कैसे हो गई वहाँ,

पैसों की ऐसी बदनामी?

 

तो क्या अब यह मान लें,

हम सब खुले सरेआम से?

कि चोरी करने वाले भी,

लगे हुए हैं राम से?

 

या फिर वो सब सो रहे थे,

जो चौकीदार थे काम के?

या पहरे ही बेकाम हुए,

प्रभु राघव के इस धाम के?

 

भक्ति की ओट में छिपकर जो,

यह गबन का खेल रचाते हैं।

वो भूल गए कि राघव सब,

देख-देख मुस्कुराते हैं!

 

 

 

 

अस्वीकरण (Disclaimer):

यह रचना पूर्णतः एक साहित्यिक विधा ‘व्यंग्य’ (Satire) पर आधारित है। कविता का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संस्था, समुदाय, राजनीतिक दल या धार्मिक आस्था को ठेस पहुँचाना या आहत करना बिल्कुल नहीं है। यह रचना केवल व्यवस्था की पारदर्शिता, सामाजिक प्रवृत्तियों और समसामयिक विषयों पर एक रचनात्मक व कलात्मक टिप्पणी है। इसे केवल एक कवि की कल्पना और साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

 

 

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