संस्कृत के प्रथम बौद्ध महाकवि अश्वघोष: जीवन, काल-निर्धारण और कालिदास का प्रभाव
लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’
प्रस्तावना: मगध से पुरुषपुर तक का ऐतिहासिक सफर
भारतीय वांग्मय और संस्कृत साहित्य के इतिहास में महाकवि अश्वघोष एक ऐसे युगांतरकारी मनीषी हैं, जिन्होंने संस्कृत भाषा में बौद्ध महाकाव्यों की रचना का सूत्रपात किया। वे न केवल एक उत्कृष्ट कोटि के कवि थे, बल्कि परमत को परास्त करने वाले ‘महावादी’ दार्शनिक और सर्वास्तिवादी बौद्ध आचार्य भी थे। इतिहास की एक अत्यंत प्रसिद्ध और विस्मयकारी घटना के अनुसार, महाकवि अश्वघोष सर्वप्रथम मगध नरेश के राजगुरु थे। परंतु, उनकी अगाध मेधा और दार्शनिक ख्याति से प्रभावित होकर कुषाण नरेश कनिष्क ने मगध पर आक्रमण किया और हर्जाने के रूप में अश्वघोष तथा बुद्ध का भिक्षापात्र अपने साथ पुरुषपुर (वर्तमान पेशावर) ले गया। इस प्रकार, मगध दरबार का यह दर्शनीय रत्न उत्तर-पश्चिम भारत के कुषाण साम्राज्य का मार्गदर्शक बना।
जन्म, परिचय और कनिष्क से संबंध
महाकवि अश्वघोष का जन्म साकेत (वर्तमान अयोध्या) की पावन भूमि पर हुआ था। उनकी माता का नाम सुवर्णाक्षी था। इतिहास और साहित्यिक परंपराओं में दो कनिष्कों का उल्लेख मिलता है—प्रथम कनिष्क और उनके पौत्र द्वितीय कनिष्क। इन दो शासकों के कारण अश्वघोष के समय को लेकर विद्वानों में थोड़ा मतभेद रहता है।
परंतु, यदि चीनी अनुश्रुतियों और साहित्यिक परंपराओं को आधार बनाया जाए, तो यह बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि प्रथम कनिष्क ने महाकवि अश्वघोष को मगध शासक से प्राप्त कर अपने पौत्र द्वितीय कनिष्क का गुरु नियुक्त किया होगा। चीनी परंपराओं के अनुसार वे कनिष्क के राजगुरु और राजकवि सिद्ध होते हैं। कनिष्क द्वारा कश्मीर के कुंडलवन में आयोजित की गई ‘चतुर्थ बौद्ध संगीति’ की अध्यक्षता का गौरव जहाँ एक परंपरा महास्थविर पार्श्व को देती है, वहीं दूसरी परंपरा महावादी अश्वघोष को प्रदान करती है। वे बौद्ध धर्म के ‘विभाषा’ (अभिधर्मपिटक की व्याख्या) की रचना में भी एक मुख्य प्रायोजक रहे। साधारण जनता को बौद्ध धर्म के प्रति आकृष्ट करने के लिए उन्होंने ‘काव्योपचार’ (काव्य को माध्यम बनाना) का अत्यंत सुंदर प्रयोग किया।
शोधकार्य: काल-निर्धारण और ऐतिहासिक साक्ष्य
अश्वघोष के स्थितिकाल को लेकर इतिहासकारों और प्राच्यविदों ने व्यापक शोध किए हैं, जो इस प्रकार हैं:
विण्टरनित्स और कीथ का मत: प्रसिद्ध विद्वान विण्टरनित्स के अनुसार कनिष्क १२५ ई. में सिंहासन पर आसीन हुआ था, जिसके अनुसार अश्वघोष का काल द्वितीय शताब्दी ईस्वी माना जा सकता है। परंतु अधिकांश विद्वानों की सुदृढ़ मान्यता है कि कनिष्क ‘शक संवत’ का प्रवर्तक है, जो ७८ ई. से प्रारंभ हुआ था। इसी आधार पर प्रोफेसर कीथ अश्वघोष का समय १०० ई. के लगभग मानते हैं। यदि कनिष्क का राज्यकाल ७८ ई. से १२५ ई. तक मान लिया जाए, तो महाकवि अश्वघोष का स्थितिकाल प्रथम शताब्दी ईस्वी निश्चित होता है।
चीनी अनुवाद और अशोक का उल्लेख: अश्वघोष कृत कालजयी महाकाव्य ‘बुद्धचरितम्’ का चीनी अनुवाद ईसा की पाँचवीं शताब्दी में उपलब्ध होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि भारत में पर्याप्त रूप से प्रचारित और प्रतिष्ठित होने के बाद ही इसका चीनी अनुवाद हुआ होगा। इसके अतिरिक्त, ‘बुद्धचरितम्’ के अंत में मौर्य सम्राट अशोक (राज्यकाल ई.पू. २६९ से २३२ ई.पू.) का उल्लेख होने के कारण यह पूर्णतः प्रमाणित है कि अश्वघोष सम्राट अशोक के परवर्ती (बाद के) थे।
हुविष्क के दरबार का खंडन: प्रो. ल्यूडर्स ने अश्वघोष रचित ‘शारिपुत्रप्रकरणम्’ के आधार पर उनका रचनाकाल कनिष्क के उत्तराधिकारी हुविष्क का शासनकाल स्वीकार किया है। परंतु ऐतिहासिक दृष्टि से यह अप्रमाणिक है। हुविष्क का राज्यारोहण कनिष्क की मृत्यु के बीस वर्ष बाद हुआ। कनिष्क के सिक्कों पर जहाँ बुद्ध का नाम और आकृति अंकित है (जो उनके बौद्ध होने का प्रमाण है), वहीं हुविष्क के सिक्कों पर बुद्ध का नाम नहीं मिलता क्योंकि वे ब्राह्मण धर्म के अनुयायी थे। अतः अश्वघोष का हुविष्क के दरबार में होना सिद्ध नहीं होता; वे कनिष्क के ही समकालीन थे।
महाकवि कालिदास का प्रभाव: काल-निर्णय का अकाट्य साक्ष्य
कालिदास तथा अश्वघोष की रचनाओं का तुलनात्मक अध्ययन करने के पश्चात यह निष्कर्ष निकलता है कि अश्वघोष महाकवि कालिदास के परवर्ती (बाद के) थे। कालिदास की तिथि प्रथम शताब्दी ई.पू. स्वीकार करने से यह स्पष्ट होता है कि दोनों की रचनाओं में जो अद्भुत भाव-साम्य परिलक्षित होता है, वह कालिदास का अश्वघोष पर प्रभूत प्रभाव था।
कालिदास ने ‘कुमारसंभवम्’ और ‘रघुवंशम्’ में जिन उत्कृष्ट श्लोकों और भावों की सृष्टि की, उन्हीं का अनुकरण अश्वघोष ने ‘बुद्धचरितम्’ में किया है। कालिदास ने विवाह के बाद लौटते हुए शिव-पार्वती को देखने के लिए उत्सुक कैलास की ललनाओं का (कुमारसंभवम् में) तथा स्वयंवर के बाद अज और इन्दुमती को देखने के लिए लालायित विदर्भ की रमणियों का (रघुवंशम् में) जिन श्लोकों द्वारा वर्णन किया है, ठीक उन्हीं भावों के माध्यम से अश्वघोष ने राजकुमार सिद्धार्थ को देखने के लिए उत्सुक कपिलवस्तु की सुंदरियों का वर्णन किया है।
श्लोकों का तुलनात्मक सौंदर्य:
अश्वघोष कृत ‘बुद्धचरितम्’ का श्लोक:
वातायनेभ्यस्तु विनिःसृतानि परस्परायासितकुण्डलानि।
स्त्रीणां विरेजुर्मुखपङ्कजाणि सक्तानि हर्म्येष्विव पङ्कजानि॥
कालिदास कृत ‘कुमारसंभवम्’ तथा ‘रघुवंशम्’ का श्लोक:
तासां मुखैरासवगन्धगर्भैर्व्याप्तान्तरा सान्द्रकुतूहलानाम्।
विलोलनेत्रभ्रमरैर्गवाक्षाः सहस्रपत्राभरणा इवासन्॥
समीक्षा: इन दोनों श्लोकों के गहन अध्ययन से यह सिद्ध होता है कि अश्वघोष महाकवि कालिदास के ऋणी थे। जो मूल शिल्पी या कवि होता है, वह अपने मौलिक और सुंदर भाव को अपनी कृतियों में अनेक जगह व्यक्त करता है क्योंकि वह उस भाव का विस्तार चाहता है; इसीलिए कालिदास ने इस भाव को कुमारसंभवम् और रघुवंशम् दोनों में दुहराया है। इसके विपरीत, अश्वघोष ने कालिदास के उस सुंदर भाव का अनुकरण किया है, इसलिए उन्होंने अपनी कृति में इसे केवल एक ही बार स्थान दिया है। यह साहित्यिक साक्ष्य अश्वघोष को कालिदास का परवर्ती सिद्ध करने के लिए अकाट्य है।
प्रमुख प्रामाणिक रचनाएँ
यद्यपि अश्वघोष के नाम से अनेक ग्रंथ ख्यात हैं, परंतु विद्वानों और समीक्षकों की मंडली द्वारा प्रामाणिक रूप से उनकी केवल चार साहित्यिक कृतियाँ ही स्वीकार की जाती हैं (वे ‘सूत्रालङ्कारशास्त्रम्’ के रचयिता संभवतः नहीं हैं):
१. बुद्धचरितम्: यह तथागत बुद्ध के जीवन और उपदेशों पर आधारित संस्कृत का प्रथम बौद्ध महाकाव्य है। चीनी तथा तिब्बती अनुवादों में यह पूरा २८ सर्गों में उपलब्ध है, परंतु मूल संस्कृत में हमें इसके केवल १४ सर्ग ही प्राप्त होते हैं। इसकी रचना बड़ी ही सरस वैदर्भी रीति और नाना छंदों में की गई है।
२. सौन्दरानंदकाव्यम्: १८ सर्गों का यह महाकाव्य महात्मा बुद्ध के सौतेले भाई ‘नन्द’ को सांसारिक काम-मोह से विमुख कर बौद्ध संघ में दीक्षित करने का भव्य वर्णन करता है। काव्य-सौष्ठव और कलात्मक स्निग्धता की दृष्टि से कई विद्वान इसे बुद्धचरितम् से भी अधिक सुंदर मानते हैं।
३. गंडीस्तोत्रगाथा: यह अनुपम ग्रंथ गीतकाव्य की अनुपम रसात्मकता और काव्यात्मक सुषमा से मंडित है।
४. शारिपुत्रप्रकरणम्: यह संस्कृत साहित्य का एक अत्यंत महनीय रूपक (नाटक) है। यद्यपि यह अधूरा प्राप्त हुआ है, तथापि यह नाट्य कला का एक रमणीय प्रतिनिधि ग्रंथ है।
उपसंहार: काव्य-कला के महान प्रेरक
महाकवि अश्वघोष का संपूर्ण जीवन और उनका साहित्य इस बात का गवाह है कि दर्शन की शुष्कता को जब काव्य के अमृत से सींचा जाता है, तो वह जन-जन के हृदय को छू लेता है। भले ही वे कालिदास की काव्य-कला से अनुप्राणित थे, परंतु संस्कृत वांग्मय में बौद्ध दर्शन को महाकाव्य का जामा पहनाने वाले वे अद्वितीय युगपुरुष हैं। इतिहास और साहित्य में उनका अवदान सदैव अमिट रहेगा।
धन्यवाद!