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तथ्यों के आलोक में आर्यभट का इतिहास: ‘कुसुमपुर’ बनाम इतिहास को उलझाने की कूटनीतिक साजिशें

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: मगध के गौरव को मिटाने का कुत्सित प्रयास

​प्राचीन भारत का इतिहास केवल ज्ञान-विज्ञान की गाथा नहीं है, बल्कि यह उन युगप्रवर्तक मनीषियों का भी साक्षी है जिन्होंने शून्य से लेकर अनंत ब्रह्मांड के रहस्यों को अपनी मुट्ठी में बांधा। ऐसे ही एक अद्वितीय नक्षत्र-विद् और गणितज्ञ थे—आर्यभट। उन्होंने अपने अमर ग्रंथ ‘आर्यभटीय’ में स्वयं अपने जन्मस्थान को ‘कुसुमपुर’ और जन्म काल को ‘शक संवत ३९८’ (सन ४७६ ईस्वी) अंकित किया है। सर्वविदित है कि कुसुमपुर, बिहार की वर्तमान राजधानी पटना (प्राचीन पाटलिपुत्र) का ही ऐतिहासिक नाम है।

​परंतु, अत्यंत क्षोभ का विषय है कि वर्तमान में तथाकथित आधुनिक ‘कूटनीतिक खोज’ और छद्म बौद्धिक विमर्श के माध्यम से आर्यभट के इस जन्मस्थान को बिहार की माटी से हटाकर दक्षिण भारत में सिद्ध करने की एक सोची-समझी साजिश शुरू हो चुकी है। यह ठीक वैसी ही कुचेष्टा है, जैसी आचार्य चाणक्य, मंडन मिश्र, महर्षि वात्स्यायन, पंडित विष्णु शर्मा, महाकवि बाणभट्ट और अश्वघोष जैसे मगध-मिथिला के महान महानायकों के इतिहास को विकृत करने के लिए अक्सर की जाती रही है।

 

​ऐतिहासिक साक्ष्य: वराहमिहिर और भास्कर प्रथम की गवाही

​इतिहास को किसी कपोल-कल्पना या कूटनीतिक साजिश से नहीं, बल्कि समकालीन और परवर्ती विद्वानों के प्रामाणिक साक्ष्यों से समझा जाता है। आर्यभट के ‘कुसुमपुर’ (पटना) के संबंध में तीन अत्यंत मजबूत स्तंभ हैं:

स्वयं आर्यभट का घोषणा-पत्र: उन्होंने अपनी कृति ‘आर्यभटीय’ में स्पष्ट और निर्भ्रांत शब्दों में लिखा है कि उनका जन्मस्थान कुसुमपुर है और रचनाकाल के समय उनकी आयु २३ वर्ष थी, जो शक संवत ३९८ बैठती है।

​भास्कर प्रथम की गवाही: सातवीं शताब्दी के महान गणितज्ञ भास्कर प्रथम (जिन्होंने सबसे पहले संख्याओं को हिंदू दाशमिक पद्धति में लिखना आरंभ किया था) ने सन ६२९ में जब आर्यभटीय पर अपना सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘आर्यभटीयभाष्य’ लिखा, तो उन्होंने बिना किसी संशय के स्पष्ट किया कि ‘कुसुमपुर’ की वास्तविक पहचान ‘पाटलिपुत्र’ यानी आधुनिक पटना के रूप में ही है।

वराहमिहिर की जीवनी का अकाट्य साक्ष्य: पाँचवीं-छठी शताब्दी के महान खगोलज्ञ और गणितज्ञ वराहमिहिर के जीवन की ऐतिहासिक घटना इस सत्य को पूरी तरह खोलकर सामने रखती है। वराहमिहिर के पिता आदित्यदास ने उन्हें खगोल विज्ञान और उच्च गणित की शिक्षा लेने के लिए विशेष रूप से ‘कुसुमपुर’ (पटना) भेजा था, जहाँ मिहिर की मुलाकात महान आचार्य आर्यभट से हुई। इसी ऐतिहासिक भेंट से प्रेरित होकर वराहमिहिर ने खगोल ज्ञान को अपने जीवन का ध्येय बनाया था। यदि कुसुमपुर पटना न होकर सुदूर दक्षिण में होता, तो उत्तर-मध्य भारत की ज्ञान-परंपरा का केंद्र इस तरह मगध से न जुड़ता।

 

जन्म से संबंधित अजीबोगरीब और भ्रामक तर्कों का खंडन

​इतिहास को उलझाने के लिए तथाकथित आधुनिक ज्ञानियों द्वारा तीन अत्यंत हास्यास्पद और विरोधाभासी तर्क दिए जाते हैं, जिनका खंडन तार्किक आधार पर होना आवश्यक है:

​भ्रम संख्या १: अश्मक क्षेत्र का भ्रामक दावा

​कुछ विचारकों का तर्क है कि आर्यभट नर्मदा और गोदावरी नदियों के मध्य स्थित ‘अश्मक’ क्षेत्र में पैदा हुए थे और वे अश्मक की पहचान महाराष्ट्र या मध्य भारत से करते हैं। परंतु विरोधाभास देखिए—आरंभिक बौद्ध ग्रंथ अश्मक को सुदूर दक्षिण में यानी ‘दक्षिणापथ’ या दक्खन के रूप में वर्णित करते हैं, जबकि कुछ अन्य ऐतिहासिक ग्रंथ कहते हैं कि अश्मक के लोग सिकंदर (अलेक्जेंडर) से लड़े थे (जिसका अर्थ है कि अश्मक उत्तर-पश्चिम सीमांत की तरफ होना चाहिए)। जो तथाकथित विद्वान स्वयं अपने भौगोलिक तर्कों के जाल में फँसे हुए हैं, उनका आर्यभट के जन्मस्थान को बदलना केवल एक कुचेष्टा मात्र है।

भ्रम संख्या २: केरल का ‘चाम्रवत्तम’ सिद्धांत

​एक अन्य अजीब अध्ययन में दावा किया गया कि आर्यभट केरल के ‘चाम्रवत्तम’ के निवासी थे, क्योंकि ‘अश्मक’ एक जैन प्रदेश था जो श्रवणबेलगोल के चारों तरफ फैला था और वहाँ की ‘भारतापुझा’ नदी का नाम जैन पौराणिक राजा भरत के नाम पर था। चूँकि आर्यभट ने अपने ग्रंथ ‘दशगीतिका’ के पाँचवें छंद में राजा भरत के कालखंड का जिक्र किया है, इसलिए उन्हें केरल का मान लिया गया! यह तर्क अत्यंत हास्यास्पद है। किसी रचनाकार की कृति में किसी भी महान पौराणिक राजा या स्थान का नाम आ सकता है।

​खगोलीय और ज्योतिषीय खोज के लिए कोई भी वैज्ञानिक अपने जीवन में कई बार स्थान परिवर्तन करता है; क्योंकि ज्योतिषीय दृष्टि से पृथ्वी का हर अक्षांश और देशांतर अपना अलग महत्व रखता है। यह निश्चित है कि आर्यभट अपनी वैज्ञानिक खोजों के लिए अन्य राज्यों में गए होंगे, लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं कि उनका जन्मस्थान बदल दिया जाए।

​भ्रम संख्या ३: श्रीलंका का सन्दर्भ

​आर्यभट ने अपनी खगोलीय गणनाओं और प्रणालियों के लिए सन्दर्भ (Reference) के रूप में ‘श्रीलंका’ का अनेक अवसरों पर उल्लेख किया है। तो क्या इन तथाकथित ज्ञानियों के कुतर्क के अनुसार आर्यभट को श्रीलंका का निवासी मान लिया जाना चाहिए? सन्दर्भ बिंदु (Reference Point) कभी जन्मस्थान नहीं होता।

 

कृतियाँ: विज्ञान और गणित का कालजयी खजाना

​आर्यभट द्वारा रचित तीन अमूल्य ग्रंथ आज भी हमारे पास उपलब्ध हैं: ‘दशगीतिका’, ‘आर्यभटीय’ और ‘तंत्र’। इसके अतिरिक्त उनके एक और अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘आर्यभट सिद्धांत’ की जानकारी मिलती है, जो दुर्भाग्यवश अब पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं है; वर्तमान में उसके केवल ३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। सातवीं शताब्दी तक इस ग्रंथ का भारत में व्यापक उपयोग होता था, परंतु यह अमूल्य निधि कैसे लुप्त हुई, इसका कोई प्रामाणिक इतिहास नहीं मिलता।

​आर्यभटीय का गणितीय वैभव: इस ग्रंथ के मात्र ३ पृष्ठों में समाए ३३ श्लोकों में उन्होंने वर्गमूल, घनमूल, समांतर श्रेणी, सतत भिन्न (Continued Fractions), द्विघात समीकरण (Quadratic Equations) और घात शृंखला के योग जैसी क्रांतिकारी गणितीय अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं। इसके साथ ही उन्होंने ‘ज्याओं की तालिका’ (Table of Sines) भी तैयार की, जो आधुनिक त्रिकोणमिति का आधार है।

खगोल विज्ञान और यंत्र निरूपण: ग्रंथ के ५ पृष्ठों के ७५ श्लोकों में उन्होंने खगोल-विज्ञान के ऐसे सिद्धांत दिए जो तत्कालीन विश्व के लिए पूरी तरह नए थे। उनके समकालीन व शिष्य वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कर प्रथम के लेखनों से पता चलता है कि लुप्त हो चुके ‘आर्य-सिद्धांत’ में मध्यरात्रि से दिवस की गणना की जाती थी और उसमें शंकु-यंत्र (Nomon), छाया-यंत्र, धनुर्-यंत्र/चक्र-यंत्र (कोण मापी उपकरण), यस्ती-यन्त्र (बेलनाकार छड़ी), छत्र-यंत्र और दो प्रकार की जल-घड़ियों (धनुषाकार और बेलनाकार) जैसे आधुनिक खगोलीय उपकरणों का विस्तृत वर्णन था।

​अल न्त्फ़ (अरबी अनुवाद): ९वीं सदी के फारसी विद्वान और प्रसिद्ध इतिहासकार अबू रेहान अल-बिरूनी के लेखों के अनुसार, आर्यभट का एक ग्रंथ अरबी अनुवाद के रूप में ‘अल न्त्फ़’ या ‘अल नन्फ़’ नाम से भी अरब जगत् में गूँजा, जिसका मूल संस्कृत नाम अभी अज्ञात है।

 

संक्षेप में: युगप्रवर्तक का जीवन-वृत्त

जन्म वर्ष: ४७६ ईस्वी (शक संवत ३९८)

जन्म स्थान: कुसुमपुर (पाटलिपुत्र), आधुनिक पटना, बिहार।

देहांत: ५५० ईस्वी (आयु लगभग ७३-७४ वर्ष)

​युग: गुप्त काल (स्वर्ण युग)

​मुख्य रुचियाँ: गणित, खगोलशास्त्र (Astronomy)

मुख्य कृतियाँ: आर्यभटीय, आर्यभट्ट सिद्धांत, तंत्र, दशगीतिका।

वैश्विक प्रभाव: आर्यभट की मेधा से वराहमिहिर और भास्कराचार्य ही नहीं, बल्कि अरबी विद्वान अल-ख्वारिज्मी, अल-बिरूनी, अल-झर्काली, उमर खय्याम, आधुनिक खगोलविद् कोपर्निकस, फ्रांसीसी गणितज्ञ जॉर्ज इफरा, वैज्ञानिक गुइलौम ले जेंटिल और यूनानी गणितज्ञ एराटोस्थनीज जैसे वैश्विक मनीषी प्रभावित और अनुप्राणित हुए।

 

​काव्यात्मक प्रवाह

मगध का नक्षत्र-पुत्र: आर्यभट

​- विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​गंगा की लहरों ने देखा,

वह अद्भुत तेज अनोखा था,

कुसुमपुर की पावन माटी पर,

जिसने अम्बर को नापा था।

 

शून्य को जिसने अर्थ दिया,

और पाई (\pi) का मान निकाला था,

वह साकेत-मगध का गौरव था,

जिसने खगोल को संभाला था।

 

​लिख दिया स्वयं ‘आर्यभटीय’ में,

“मैं कुसुमपुर का वासी हूँ”,

शक संवत तीन सौ अठासी का,

मैं काल-पुरुष अविनाशी हूँ।

 

भास्कर ने माना पटना को,

मिहिर भी दर्शन करने आए,

फिर क्यों इतिहास चुराने को,

छद्मों ने ये जाल बिछाए?

 

​अश्मक का झूठा तर्क गढ़ो,

या केरल का चाम्रवत्तम,

इतिहास नहीं झुक सकता है,

चाहे तुम रच लो छल हरदम!

 

श्रीलंका सन्दर्भ बिंदु था,

वह जन्मभूमि कैसे होगी?

विज्ञान चुराने वालों की,

यह कूटनीति कैसे होगी?

 

​दशगीतिका, तंत्र, सिद्धांत दिए,

जिसने जग को विज्ञान दिया,

कोपर्निकस और बिरूनी ने भी,

जिसके आगे सिर झुका दिया।

 

गुप्त काल के स्वर्ण-मुकुट का,

वह अनुपम अनमोल रतन,

‘अरुण’ मगध के उस सूरज को,

करता है शत-शत नमन!

 

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