images-33-1

हिंदी सूफ़ी प्रेमाख्यान परंपरा के आदि-शिल्पी: मुल्ला दाउद और उनका अमर महाकाव्य ‘चन्दायन’

​लेखक: विद्यावाचस्पति अश्विनी राय ‘अरुण’

 

​प्रस्तावना: इतिहास के मौन में गूँजती अमर आवाज़

​हिंदी भाषा और साहित्य में जब भी सूफ़ी प्रेमाख्यानों या प्रेममार्गी काव्य-परंपरा की बात आती है, तो अमूमन लोगों के जेहन में मलिक मुहम्मद जायसी का नाम सबसे पहले उभरता है। परंतु, इस विहंगम और आध्यात्मिक परंपरा की नींव जायसी से सदियों पहले जिसने रखी, वे थे—मुल्ला दाउद। मुल्ला दाउद ने वर्ष १३७९ (सन १३७९ ई.) में ‘चन्दायन’ महाकाव्य की रचना की, जो न केवल उनकी अमिट पहचान बना, बल्कि हिंदी का प्रथम ज्ञात सूफ़ी प्रेमकाव्य भी स्वीकार किया गया। वैसे तो इतिहास के पन्नों में उनके व्यक्तिगत जीवन को लेकर एक गहरा मौन है, जिससे उनके बारे में बहुत अधिक विवरण उपलब्ध नहीं होते; परंतु साहित्यिक साक्ष्यों और लोक-परंपराओं के संधान से जितनी भी महत्वपूर्ण जानकारियाँ एकत्र हो पाई हैं, वे उनके विराट व्यक्तित्व को समझने के लिए पर्याप्त हैं।

 

​जीवन परिचय: जन्म काल और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

​मुल्ला दाउद के काल-निर्धारण और जन्म के संबंध में प्रामाणिक तथ्य जुटाने के लिए हमें प्रसिद्ध मध्यकालीन इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूनी (अल् बदायूनी) के ऐतिहासिक ग्रंथों को आधार बनाना होगा।

​जन्म काल का अनुमान: बदायूनी के साक्ष्यों के अनुसार, सन् ७७२ हिजरी के आसपास मुल्ला दाउद की साहित्यिक प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस आधार पर विद्वानों का मत है कि ईस्वी सन् की चौदहवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों, यानी सन १३२० से १३२५ के मध्य में कभी उनका जन्म हुआ होगा। चूंकि वर्ष १३७९ ई. में उनकी इस महान रचना के पूर्ण होने का प्रामाणिक अनुमान है, अतः यह काल-गणना तार्किक सिद्ध होती है।

जन्म स्थान (माटी से जुड़ाव): यदि मुल्ला दाउद के जन्म स्थान या निवास की बात की जाए, तो समस्त शोधार्थियों और विद्वानों में एकमत है कि वे ‘डलमऊ’ के रहने वाले थे। उत्तर प्रदेश के रायबरेली ज़िले में स्थित ‘डलमऊ’ कोई साधारण कस्बा नहीं, बल्कि पतित-पावनी गंगा नदी के तट पर बसा हुआ एक अत्यंत प्राचीन, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नगर है। गंगा की लहरों और डलमऊ के शांत वातावरण ने निश्चित ही उनकी लेखनी को वह रूहानी गहराई दी होगी, जो सूफ़ी काव्यों की मूल आत्मा है।

 

​’चन्दायन’: लोकगाथा और साहित्यिक कृति का अनूठा संगम

​’चन्दायन’ केवल एक लिखित ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह लोक के कंठ में बसी एक अमर गाथा है। इसमें नायक ‘लोर’ और नायिका ‘चाँदा’ (चंदा) की उन्मुक्त, अलौकिक और मर्मस्पर्शी प्रेमकथा का वर्णन है।

नामकरण और विविधता: इस कालजयी काव्य के नामकरण तथा प्राप्त पाठों में प्राचीन काल से ही विविधता रही है। पुराने उल्लेखों में इसका नाम विशेष रूप से ‘चन्दायन’ और सामान्य तौर पर ‘नूरक चंदा’ मिलता है। सुप्रसिद्ध विद्वान डॉ. माताप्रसाद गुप्त इसके मूल नाम को ‘लोर कहा’ या ‘लोर कथा’ (लोरिक की कहानी) मानते हैं। आज के साहित्यिक संसार में यह कृति ‘चन्दायन (संपादक: माताप्रसाद गुप्त)’ या ‘चन्दायन (संपादक: परमेश्वरी लाल गुप्त)’ के नाम से अत्यंत विख्यात है।

​मौखिक परंपरा और लोक संस्करण: इस काव्य की जड़ें लोकगाथा की मौखिक परंपरा में इतनी गहरी हैं कि आज भी उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण अंचलों में यह कथावस्तु थोड़े-बहुत स्थानीय हेरफेर के साथ लोकप्रचलित छंदों में गाई जाती है। इसे अंचलों के अनुसार ‘लोरिकायन’, ‘लोरिकी’ या ‘चनैनी’ के नाम से जाना जाता है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में इसके अनेक आंचलिक संस्करण आज भी लोक-संगीत का हिस्सा हैं।

भाषा और शिल्प शैली: चन्दायन की भाषा को लेकर विद्वानों में थोड़ा मतभेद है। कुछ विद्वान इसे ठेठ और शुद्ध ‘अवधी’ मानते हैं, तो कुछ इतिहासकार इसे हिंदी की विभिन्न बोलियों (विशेषकर भोजपुरी) के मिश्रण से बनी एक विशिष्ट ‘सांस्कृतिक भाषा’ के रूप में देखते हैं। शिल्प की दृष्टि से यह संपूर्ण कथा ‘दोहा-चौपाई शैली’ में वर्णित है—यही वह शैली है जिसे आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘रामचरितमानस’ के लिए अपनाया था।

 

कथा का मूल कथ्य और सूफ़ियाना रहस्यभावना

​अन्य उत्तरवर्ती सूफ़ी काव्यों (जैसे पदमावत, मृगावती) की भाँति ‘चन्दायन’ में भी लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक यानी ईश्वर (हकीकत) से मिलन की रहस्यभावना की प्रतिष्ठा की गई है। इसमें आए सौंदर्य-चित्र, विरह के प्रसंग और मानवीय भावनाएँ अत्यंत मर्मस्पर्शी हैं। यह महाकाव्य आलोच्य मध्यकाल के बिल्कुल संधि-स्थल पर आता है और दक्खिनी हिंदी के प्रेमाख्यानों (जैसे: कुतुबमुश्तरी, सबरस, सैफुलमुलूक व वदीउलजमाल, चंदरबदन-माहियार, गुलशने इश्क़, फूलबदन आदि) का मार्ग प्रशस्त करता है।

काव्य के मुख्य पात्र (चरित्र-चित्रण):

​इस प्रेमाख्यान की पूरी कथा निम्नलिखित पात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो इसके कथ्य को जीवंत बनाते हैं:

​नायिका: चंदा (अलौकिक सौंदर्य और प्रेम की प्रतिमूर्ति)

नायक: लोर (या लोरिक/नूरक – पराक्रमी और प्रेमी नायक)

उपनायिका: मैना (लोरिक की पहली और परित्यक्ता पत्नी, जिसके विरह की व्याकुलता मर्मस्पर्शी है)

अन्य सहायक पात्र:

​गोवरगढ़ के राजा सहदेव (नायिका चंदा के पिता)

​बाबन (जिससे चंदा का मात्र ४ वर्ष की अल्पायु में बाल-विवाह हुआ था)

​बाजुर (एक भिक्षुक जो चंदा के रूप पर मोहित हो जाता है)

​राव रूपचंद (राजापुर के राव, जो कथा में द्वंद्व उत्पन्न करते हैं)

​वृहस्पति (चंदा की अंतरंग सखी और चंदा-लोर के प्रेम की धागा)

 

उपसंहार: भारतीय लोक-चेतना के आदि-गायक

​मुल्ला दाउद का ‘चन्दायन’ इस बात का साक्ष्य है कि भारत में सूफ़ियाना संतों ने यहाँ की माटी, यहाँ की लोकभाषा (अवधी-भोजपुरी) और यहीं की लोकगाथाओं (लोरिक-चंदा) को अपनाकर ईश्वर और बंदे के बीच प्रेम का एक ऐसा अमर सेतु तैयार किया, जो मजहबी सीमाओं से बहुत ऊपर था। मुल्ला दाउद हिंदी साहित्य के आकाश पर वह ध्रुवतारा हैं, जिनकी रोशनी से आगे चलकर पूरी सूफ़ी काव्य-परंपरा जगमगा उठी।

​धन्यवाद!

 

About The Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *